बंगाल: ममता बनर्जी की जीत से विपक्ष को मिलेगी ऑक्सीजन, जानें कांग्रेस क्यों इतनी खुश
पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम से भाजपा हैरान है, तो कांग्रेस काफी खुश नजर आ रही है। कांग्रेस के हाथ भले ही बंगाल में एक भी सीट नहीं लगी है, लेकिन भाजपा की हार कांग्रेस की खुशी की वजह बन गई।
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पश्चिम बंगाल के परिणाम से भाजपा भले ही हतप्रभ हो, लेकिन कांग्रेस काफी खुश नजर आ रही है। कांग्रेस के हाथ भले ही बंगाल में एक भी सीट नहीं लगी है, लेकिन उसकी खुशी की वजह भाजपा की हार बनी है। जानकार तृणमूल कांग्रेस की बेहतरीन जीत के पीछे कांग्रेस के मौन साथ को भी एक वजह मान रहे है। चुनाव के दौरान राहुल और प्रियंका गांधी ने बंगाल से दूरी बना रखी थी। भाजपा वाले चुनौती देते देते रहे। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता पश्चिम बंगाल को छोड़कर दक्षिण भारत और उत्तर प्रदेश में घूम रहे है।
दरअसल, भाजपा चाहती थी कि कांग्रेस बंगाल की सीटों से थोड़े थोड़े वोट भी ले, तो टीमएसी को नुकसान होगा और भाजपा को इसका सीधा फायदा। कांग्रेस ने सुस्ती भरे चुनावी प्रचार के जरिए भाजपा की उम्मीदों को पलीता लगा दिया और खामोशी से बिना वोट काटे दीदी को मजबूत कर दिया। अब कांग्रेस खुश है कि उसके दुश्मन की हार हुई है। भले ही जीत का सेहरा ममता बनर्जी के सिर पर सज रहा है।
कांग्रेस की राजनीति को करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई ने अमर उजाला से कहा, आज देश में नरेंद्र मोदी और अमित शाह का बोलबाला है। भाजपा कैसे कमजोर हो या मोदी शाह की जोड़ी को कैसे परास्त किया जा सकता है, इस दिशा में राहुल गांधी और गांधी परिवार के सदस्य काम कर रहे है। हालांकि, देश में कांग्रेस को दोबारा कैसे खड़ा किया जाए इस दिशा में कोई रोडमैप तैयार नहीं हैं। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस की रणनीति थी कि किस तरह से भाजपा को घेरा जाए और विपक्ष में भी ये आत्मविश्वास बढ़े कि भाजपा को हराया जा सकता है। अगर बंगाल चुनाव भाजपा जीत जाती, तो कांग्रेस पार्टी के लिए बहुत बड़ी चुनौती होती है।
किदवई ने आगे कहा कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की जीत बेहद महत्वपूर्ण है। तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके गठबंधन जीत रहा है। इससे पूरे देश में विपक्ष को बल मिलेगा। आज संपूर्ण विपक्ष यही चाहता है कि कैसे भी मोदी को परास्त किया जाए। ऐसे में भाजपा के खिलाफ कोई एकजुट गठबंधन बनता है, तो उसमें कांग्रेस पार्टी की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। हालांकि, ये चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए बहुत ही निराशाजनक हैं, लेकिन हताशाजनक बिल्कुल नहीं है। कांग्रेस को अपने सब कुछ लूट जाने के गम से ज्यादा खुशी दुश्मन के कमजोर होने में है।
असम में प्रियंका और केरल में नहीं चला राहुल का जादू
असम के विधानसभा चुनाव में भाजपा दोबारा सत्ता पर काबिज हो रही है। कांग्रेस गठबंधन अपने पुराने आंकड़े पर आकर ही सिमट रहा है। ऐसे में असम में न तो प्रियंका का चेहरा चला न भूपेश बघेल की कोई रणनीति। असम में प्रियंका के फेल होने के सवाल पर किदवई का कहना है कि असम के चुनाव में पार्टी ने एक प्रयोग किया था, जिसमें किसी राज्य के सीएम को चुनाव मैनजमेंट की जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन पार्टी वहां कभी भी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं थी। उनके गठबंधन सहयोगियों ने भी चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया। कांग्रेस कद्दावर नेता तरुण गोगोई के देहांत के बाद पार्टी के पास राज्य में कोई चेहरा ही नहीं था, जो भाजपा के सर्बानंद सोनोवाल और हेमंत बिस्वा सरमा की काट बन सके।
इधर, केरल में वामदलों की अगुवाई वाले गठबंधन लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) एक बार फिर सत्ता में वापसी करती हुई दिख रही है। रुझान में एलडीएफ को 140 में 96 सीटें मिलती दिख रही हैं। वहीं, कांग्रेस की अगुवाई वाली यूडीएफ के पास सिर्फ 44 सीटें जाती दिख रही है। केरल पर राजनीतिक विशलेषक किदवई का कहना है कि कोविड के दौरान केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के कामों को जनता ने सराहा हैं। लेकिन कांग्रेस वहां के भ्रष्टाचार और परिस्थितियों को ठीक से जनता के बीच उठा नहीं सकी। राहुल गांधी को केरल में अच्छा रिस्पांस मिला लेकिन वो इसे सीटों में नहीं बदल सकने में नाकाम रहे।
तमिलनाडु में डीएमके कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनती दिख रही है। डीएमके गठबंधन 152 सीटों पर आगे है, जबकि एआईएडीएमके और भाजपा गठबंधन 97 सीटों पर आगे है। डीएमके बहुमत के आंकड़े को पार कर गई है। किदवई ने आगे बताया कि, तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके ने अच्छा मिलकर चुनाव लड़ा। सीएम के दावेदर एमके स्टालिन कांग्रेस के लोगों का अपनी सरकार में ध्यान रखेंगे तो कांग्रेस के लिए ये थोड़ा सुखद होगा।