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ईडी: 260 करोड़ रुपये के बदले 120 करोड़ रुपये की कीमत के दिए प्लॉट, 14 साल बाद भी नहीं मिली 140 करोड़ की जमीन

Thu, 27 Aug 2026 04:45 PM IST
राहुल कुमार डिजिटल ब्यूरो अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: राहुल कुमार Updated Thu, 27 Aug 2026 04:45 PM IST
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ED: Cash Worth Rs 43 Lakh, Jewellery Valued at Rs 12 Crore Seized; Two Bank Accounts with Rs 27 Lakh
ईडी ने जब्त की कारें। - फोटो : अमर उजाला

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के गुरुग्राम जोनल ऑफिस ने 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट' (पीएमएलए), 2002 के तहत 25 अगस्त को दिल्ली-एनसीआर में वाटिका लिमिटेड और उसके प्रमोटर-डायरेक्टर से जुड़ी सात रिहायशी और कमर्शियल जगहों पर तलाशी अभियान चलाया। इस दौरान, ईडी ने कई ऐसे दस्तावेज और डिजिटल डिवाइस बरामद किए हैं। इनमें वाटिका लिमिटेड के प्रमोटरों और डायरेक्टरों से जुड़े प्रॉपर्टी के दस्तावेज, ऑडिट किए गए फाइनेंशियल स्टेटमेंट, टैली डेटा, फंड के लेन-देन/डायवर्जन से जुड़े रिकॉर्ड और शिकायतकर्ताओं से मिले फंड की जानकारी शामिल है। इसके अलावा, तीन महंगी लग्जरी गाड़ियां, गहने और बैंक अकाउंट/सिक्योरिटीज भी जब्त/फ़्रीज की गईं,  जिनकी कुल कीमत लगभग 33 करोड़ रुपये है।

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ईडी ने वाटिका लिमिटेड, उसके प्रमोटर-डायरेक्टर (अनिल भल्ला, गौतम भल्ला और गौरव भल्ला) और अन्य लोगों के खिलाफ ईसीआईआर दर्ज की थी। यह ईसीआईआर, दिल्ली पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग द्वारा आईपीसी, 1860 की अलग-अलग धाराओं के तहत दर्ज कई केसों पर आधारित है। इन केसों में धोखाधड़ी से बहला-फुसलाकर पैसे लेने, रिहायशी प्लॉट न देने और दूसरे संबंधित अपराधों का आरोप लगाया गया है।
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अब तक हुई जांच से 'वाटिका इंडिया नेक्स्ट' और 'वाटिका इंडिया नेक्स्ट-2' प्रोजेक्ट से जुड़े लेन-देन में एक जैसा पैटर्न सामने आया है। इसमें शिकायत करने वालों से रिहायशी प्लॉट के अलॉटमेंट और बिक्री के लिए पहले ही बड़ी रकम ले ली गई थी, लेकिन कई डेडलाइन बीत जाने के बाद भी वादे के मुताबिक प्लॉट का एक बड़ा हिस्सा नहीं दिया गया। 2010 और 2012 के बीच पीड़ित पार्टियों से मिली लगभग 260.30 करोड़ रुपये की रकम के बदले लगभग 120 करोड़ रुपये कीमत के प्लॉट दिए गए। 
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पीड़ित लोगों की कई कोशिशों के बावजूद, 14 साल बाद भी बाकी प्लॉट नहीं दिए गए। जांच में वाटिका ग्रुप से जुड़ी अलग-अलग जमीन की मालिक/ग्रुप कंपनियों और मुख्य लोगों की भूमिका भी सामने आई है। इसके अलावा, इसी प्रोजेक्ट में आरोपी लोगों ने पीड़ित कंपनी की मंजूरी लिए बिना चुपके से तीसरे पक्ष को 14 प्लॉट बेच दिए। 

ED: Cash Worth Rs 43 Lakh, Jewellery Valued at Rs 12 Crore Seized; Two Bank Accounts with Rs 27 Lakh
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) - फोटो : अमर उजाला
ED: ईडी ने 43 लाख रुपये नकद तो 12 करोड़ के गहने किए जब्त, 27 लाख वाले दो बैंक खाते और तीन बैंक लॉकर्स फ्रीज
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के मुंबई जोनल कार्यालय ने पीएमएलए के तहत की गई कार्रवाई में मुंबई और वडोदरा में सात रिहायशी/बिजनेस ठिकानों पर छापेमारी की है। तीन बैंक लॉकरों की तलाशी ली गई। जांच एजेंसी ने 'बिलपावर लिमिटेड' द्वारा किए गए लोन फ्रॉड के मामले में यह कार्रवाई की है। इस दौरान ईडी ने 43 लाख रुपये नकद तो 12 करोड़ रुपये के गहने जब्त किए हैं, जबकि 27 लाख रुपये वाले दो बैंक खाते और तीन बैंक लॉकर्स फ्रीज कर दिए हैं।  

 बैंक को 160.55 करोड़ रुपये का नुकसान
ईडी ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की शिकायत पर सीबीआई दिल्ली द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर इस मामले की जांच शुरू की थी। इससे पहले सीबीआई ने बिलपावर लिमिटेड, उसके डायरेक्टरों और सहयोगी कंपनियों के ख़िलाफ 30.सितंबर 2024 को चार्जशीट दायर की थी। आरोप है कि बिलपावर लिमिटेड ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से लोन लिया। बाद में धोखाधड़ी से लोन की रकम को दूसरी जगह ट्रांसफर कर दिया। अकाउंट्स के दस्तावेजों में हेरफेर की गई, जिससे बैंक को 160.55 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

ट्रांसफ़ॉर्मर लैमिनेशन और कोर बनाने वाली कंपनी बिलपावर लिमिटेड का मैनेजमेंट राजेंद्र कुमार चौधरी, सुरेश कुमार चौधरी और नरेश कुमार चौधरी संभालते थे। 2005 से कंपनी के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के साथ बैंकिंग संबंध थे, जिसमें कैश क्रेडिट, वर्किंग कैपिटल टर्म लोन, फंडेड इंटरेस्ट टर्म लोन, कॉर्पोरेट लोन और नॉन-फंड आधारित सुविधाएं जैसे बैंक गारंटी, लेटर ऑफ़ क्रेडिट और फ़ॉरेन करेंसी एक्सपोजर शामिल थे। 18 अप्रैल 2012 को लोन अकाउंट एनपीए में तबदील हो गया। उस समय 160.55 करोड़ रुपये का मूल बकाया था।

फर्जी कंपनियों के साथ लेन-देन
जांच से पता चला कि बिलपावर लिमिटेड कुछ शेल/फर्जी कंपनियों के साथ लेन-देन में शामिल थी। इन कंपनियों का इस्तेमाल कथित तौर पर बैंक फंड को इधर-उधर करने और राउंड-ट्रिपिंग के लिए किया जाता था। इन कंपनियों के पक्ष में कथित तौर पर लेटर ऑफ क्रेडिट जारी किए गए थे, जिसके लिए जाली दस्तावेजों को असली बताकर जमा किया गया था। इसके बाद फंड को चौधरी परिवार के सदस्यों या उनके सहयोगियों द्वारा नियंत्रित अलग-अलग कंपनियों में ट्रांसफर कर दिया गया। तलाशी के दौरान अचल संपत्ति, जमीन और मशीनरी जैसी संपत्तियों से जुड़े दस्तावेज भी मिले हैं। इनके अलावा, हिसाब-किताब की किताबों (बुक्स ऑफ अकाउंट्स), लेजर और डिजिटल डिवाइस जैसे अन्य आपत्तिजनक दस्तावेज भी बरामद किए गए हैं। 
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