उत्तर प्रदेश चुनाव पांचवां चरण: 'धर्म नगरियों' में कितनी सधेगी चुनावी टोन, डिप्टी सीएम समेत आधा दर्जन मंत्रियों की परीक्षा
राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर ओम प्रकाश मिश्र कहते हैं कि निश्चित तौर पर पांच साल जब सरकार रहती है, तो जनता के पास उसका आकलन करने का एक पैरामीटर बन जाता है। इस लिहाज से सिर्फ इसी पैरामीटर पर ही नहीं बल्कि सियासी समीकरणों के बदले माहौल में पांचवें चरण में परीक्षाएं सभी राजनीतिक दलों के लिए कठिन है...
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उत्तर प्रदेश में चार चरण के तो चुनाव हो गए हैं। अब बारी है पांचवें चरण की। पांचवें चरण में उन धार्मिक नगरों में चुनाव होना है जहां से भाजपा पूरे देश में चुनावी टोन सेट करती आई है। वही इसी चरण में कुछ ऐसे भी शहर है जहां पर गांधी परिवार को अपनी मजबूती दिखा कर अगले चुनावों में राजनीतिक दिशा और दशा तय करनी है। इन्हीं चरणों में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के साथ उन छोटे-छोटे दलों की भी परीक्षा है जो उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपना कद साबित करने की होड़ में लगे हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पांचवें चरण के चुनाव 2024 की चुनावी टोन को सेट करेंगे।
27 फरवरी को उत्तर प्रदेश के पांचवें चरण में 12 जिलों की 61 विधानसभा सीटों पर मतदान होना है। इस चरण में सबसे महत्वपूर्ण जिले में अयोध्या, प्रयागराज, चित्रकूट, अमेठी, प्रतापगढ़ जैसे इलाके शामिल हैं। राजनीतिक विश्लेषक जीडी शुक्ला कहते हैं जिस तरीके से भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या और वहां बनने वाले राम मंदिर को लेकर भाजपा आस्था के साथ पूरे देश में प्रचार-प्रसार करती आई है, इस लिहाज से अयोध्या जैसे जिले में चुनाव और उसके परिणाम न सिर्फ 2022 बल्कि 2024 में चुनावी पिच पर एक टोन सेट करेंगे। शुक्ला कहते हैं अयोध्या प्रयागराज चित्रकूट वो शहर है जिनको भाजपा ने ना सिर्फ धर्म नगरी का दर्जा दिया है बल्कि राजनीतिक लिहाज से भी यह शहर पार्टी के चुनावी एजेंडे को भी धार देते आए हैं। इसलिए इन शहरों में भाजपा अपनी पूरी ताकत के साथ मैदान में है। क्योंकि कभी इसी इलाके में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का भी परचम लहराता था इसलिए विपक्षी दलों को भी इन्हीं शहरों से बहुत उम्मीदें दिख रही है।
अमेठी में भी है मतदान
पांचवें चरण में सिर्फ अयोध्या, प्रयागराज और चित्रकूट जैसे धर्मनगरी ही नहीं है, बल्कि राजनीति की गहरी पाठशाला के तौर पर पहचाने जाने वाले अमेठी की सीटों पर भी सभी राजनीतिक दलों की परीक्षा होनी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में जिस तरीके से कांग्रेस के गढ़ अमेठी में राहुल गांधी को हार का सामना करना पड़ा था। इसलिए पांचवें चरण में होने वाले विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस को अपना किला वापस पाने के लिए न सिर्फ जी तोड़ मेहनत करनी पड़ रही है बल्कि सकारात्मक परिणामों के लिए उम्मीद भी कांग्रेसी लगाए हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर ओम प्रकाश मिश्र कहते हैं कि निश्चित तौर पर पांच साल जब सरकार रहती है, तो जनता के पास उसका आकलन करने का एक पैरामीटर बन जाता है। इस लिहाज से सिर्फ इसी पैरामीटर पर ही नहीं बल्कि सियासी समीकरणों के बदले माहौल में पांचवें चरण में परीक्षाएं सभी राजनीतिक दलों के लिए कठिन है।
सरकार के आधा दर्जन मंत्रियों का टेस्ट
पांचवें चरण में योगी सरकार के आधा दर्जन मंत्रियों की परीक्षा भी होनी है। इसमें सिराथू से उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य चुनावी मैदान में हैं तो प्रतापगढ़ से राजेंद्र प्रताप सिंह उर्फ मोती सिंह भी चुनावी समर में किस्मत आजमा रहे हैं। कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह, कैबिनेट मंत्री नंद गोपाल नंदी, कैबिनेट मंत्री रमापति शास्त्री और राज्य मंत्री चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय चुनावी समर में है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इनमें से कई मंत्रियों को चुनाव के दौरान स्थानीय स्तर पर विरोध का भी सामना करना पड़ा था हालांकि भाजपा पूरी तरीके से अपने सभी मंत्रियों की जीत के लिए आश्वस्त है। इसी चरण में प्रतापगढ़ की कुंडा विधानसभा सीट से निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया पहली बार अपनी जनसत्ता पार्टी से चुनावी मैदान में उतरे हैं। इस बार कुंडा में समाजवादी पार्टी ने उनके खिलाफ प्रत्याशी भी मैदान में उतारा है। इस लिहाज से कुंडा का चुनाव न सिर्फ रोचक है बल्कि प्रतापगढ़ की विधानसभा बाबागंज सीट भी राजा भैया के लिए प्रतिष्ठा की सीट बनी हुई है।
केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल की मां और बहन भी मैदान में
पांचवें चरण में परीक्षा केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल की भी है। अनुप्रिया पटेल की मां कृष्णा पटेल और बहन पल्लवी पटेल समाजवादी पार्टी के साथ हुए गठबंधन से चुनावी मैदान में है। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि पांचवें चरण में होने वाला मतदान बहुत रोचक है। कई तरह की राजनीति गुणा भाग के सहारे समाजवादी पार्टी बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस समेत अपना दल अपनी राजनैतिक सक्रियता को साबित करने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं।
पांचवें चरण की जिन 61 विधानसभा सीटों पर चुनाव हो रहे हैं, उनमें 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सबसे ज्यादा सीटें जीती थीं। भाजपा के खाते में 51 सीटें आई थीं जबकि भाजपा की सहयोगी पार्टी अपना दल को दो सीटें मिली थीं। समाजवादी पार्टी को पांच सीटें मिली थीं, जबकि कांग्रेस को एक सीट पर संतोष करना पड़ा था। इसके अलावा दो सीटें निर्दलीय प्रत्याशी के खाते में गई थीं। इस चरण में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली थी।