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ED: बंगाल की इस कंपनी ने किया 280 करोड़ का फ्रॉड; बैंकों को 97 फीसदी नुकसान, 100 शेल कंपनियों में लगा पैसा

Mon, 07 Sep 2026 07:56 PM IST
राहुल कुमार डिजिटल ब्यूरो अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: राहुल कुमार Updated Mon, 07 Sep 2026 07:56 PM IST
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ED: Bengal-based company committed a fraud of rs280 crore funds routed through 100 shell companies
ED - फोटो : ED

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के कोलकाता जोनल ऑफिस-I ने तीन सितंबर को पश्चिम बंगाल में 12 जगहों पर छापेमारी की थी। यह कार्रवाई 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002' (पीएमएलए) के तहत कोहिनूर पावर प्राइवेट लिमिटेड (केपीपीएल) से जुड़े 280 करोड़ रुपये से ज़्यादा के बैंक फ्रॉड (धोखाधड़ी) की जांच के सिलसिले में की गई है। कंपनी के पदाधिकारियों ने 100 से ज्यादा शेल कंपनियों में पैसा   लगाया। धोखाधड़ी से कमाया पैसा विदेशों तक पहुंचा। लोन देने वाले बैंकों को 97.5 फीसदी का नुकसान (हेयरकट) उठाना पड़ा।  प्रवर्तन निदेशालय ने यह जांच 'सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस' (एसएफआईओ) की शिकायत के आधार पर शुरू की थी। 

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एसएफआईओ ने कोलकाता की दूसरी स्पेशल कोर्ट में क्रिमिनल केस नंबर 11/2024 के तहत कोहिनूर पावर प्राइवेट लिमिटेड और अन्य के कामकाज के संबंध में यह शिकायत दर्ज कराई थी। कंपनी के कामकाज की जांच का आदेश 'मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स' (एमसीए) ने दिया था। यह आदेश 'इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया' (आईबीबीआई) द्वारा उन कंपनियों की सूची भेजे जाने के बाद दिया गया था, जिनके मामले में 'रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल' (आरपी) ने एनसीएलटी के सामने 'अवॉइडेंस ट्रांजैक्शन' (लेन-देन को रद्द करने या वापस लेने) से जुड़ी अर्ज़ियां दायर की थीं। 
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ईडी की जांच से पता चला है कि केपीपीएल और उसके डायरेक्टर्स ने धोखाधड़ी वाले काम किए, जैसे गलत जानकारी देना, ज़रूरी तथ्यों को छिपाना, अकाउंट्स की किताबों में हेर-फेर करना और लोन के पैसे का गलत इस्तेमाल करना आदि। इस तरह उन्होंने बैंकों के ग्रुप को बेईमानी से फाइनेंशियल सुविधाएं मंज़ूर करने और जारी करने के लिए उकसाया। 
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ईडी की जांच में यह भी पता चला कि आखिरकार कंपनी आईबीसी के तहत लिक्विडेशन में चली गई। सिर्फ़ 7 करोड़ रुपये के आसपास ही रिकवर हो पाए। इसके चलते बैंकों को 97.5% का नुकसान (हेयरकट) उठाना पड़ा। यह बताना ज़रूरी है कि लिक्विडेटर ने आईबीसी की धारा 66 और 67 के तहत भी एप्लीकेशन दायर की थीं, जिनमें ऐसे ट्रांज़ैक्शन का ज़िक्र था, जिसे पैसे को फर्जी ट्रांज़ैक्शन के बहाने संबंधित कंपनियों में भेजा गया था। बाद में इस पैसे का इस्तेमाल प्रमोटरों, उनके परिवार के सदस्यों और उनके मालिकाना हक या कंट्रोल वाली कंपनियों के नाम पर प्रॉपर्टी खरीदने के लिए किया गया।

कोलकाता और उसके आस-पास, अपराध की कमाई से दर्जनों अचल संपत्तियां खरीदी गई थीं, जिनसे प्रमोटर कथित तौर पर हर महीने लगभग 26 लाख रुपये का किराया कमा रहे थे। तलाशी अभियान से पता चला है कि कंपनी के प्रमोटर, विजय बोथरा और प्रशांत बोथरा, 100 से ज़्यादा शेल कंपनियों (फर्जी कंपनियों) को कंट्रोल कर रहे थे। इन कंपनियों का इस्तेमाल कथित तौर पर बैंक धोखाधड़ी से हुई अवैध कमाई को इधर-उधर करने और मनी लॉन्ड्रिंग के लिए किया जा रहा था। इसके अलावा, रिश्तेदारों और डमी डायरेक्टरों के नाम पर विदेश में भी बड़ी रकम निवेश की गई है।

तलाशी अभियान के दौरान 150 से ज़्यादा शेल कंपनियों/व्यक्तियों के बैंक अकाउंट्स के साथ-साथ सिक्योरिटीज़ और अन्य फाइनेंशियल इन्वेस्टमेंट (जैसे शेयर, म्यूचुअल फंड और डेट सिक्योरिटीज़) को फ्रीज़ कर दिया गया। इस कार्रवाई के दौरान फ्रीज़ किए गए बैंक बैलेंस और फाइनेंशियल एसेट्स की कुल कीमत लगभग 64 करोड़ है। तलाशी अभियान में अपराध से जुड़े डिजिटल सबूत, कंपनी के रिकॉर्ड, फाइनेंशियल डॉक्यूमेंट्स, प्रॉपर्टी के कागज़ात आदि भी जब्त किए गए हैं। इन सबूतों का विश्लेषण किया जा रहा है ताकि अपराध से मिली कमाई का पता लगाया जा सके और उससे खरीदी गई अन्य संपत्तियों की पहचान की जा सके। 

ED: Bengal-based company committed a fraud of rs280 crore funds routed through 100 shell companies
ईडी - फोटो : अमर उजाला

उत्तराखंड में नकली राजस्व रिकॉर्ड व जाली मालिकाना हक से जमीन की धोखाधड़ी, सबसे ज्यादा होने वाला आर्थिक अपराध 

देहरादून में जमीन के बड़े घोटाले के मामले में, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), देहरादून ने आरोपी नवीन कुमार मित्तल को 'प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002' (पीएमएलए) की धारा 19 के तहत गिरफ़्तार किया है। उन्हें देहरादून की स्पेशल कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें पांच दिन की ईडी कस्टडी में भेज दिया गया। ईडी का कहना है कि उत्तराखंड में नकली राजस्व रिकॉर्ड और जाली मालिकाना के जरिए जमीन की धोखाधड़ी, राज्य में यह सबसे ज्यादा होने वाला आर्थिक अपराध बन गया है।  

ईडी ने यह जांच उत्तराखंड पुलिस द्वारा दर्ज विभिन्न एफआईआर के आधार पर शुरू की थी। ये सभी केस देहरादून में जमीन के रिकॉर्ड में हेराफेरी और धोखाधड़ी से जुड़े थे। पुलिस ने इनमें से दो एफआईआर में चार्जशीट दाखिल की हैं, जिनमें नवीन कुमार मित्तल को मुख्य आरोपी और धोखाधड़ी का मुख्य फ़ायदा उठाने वाला बताया गया है। ईडी पहले ही इस मामले में हुमायूं परवेज़, मो. वकील और मुकेश कुमार गुप्ता के ख़िलाफ़ देहरादून की स्पेशल कोर्ट में प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट (अभियोजन शिकायत) दाखिल कर चुकी है। 

जांच से पता चला है कि नवीन कुमार मित्तल ने नकली कागजात के जरिए अपने सह-आरोपी को जमीन का असली मालिक बताया और ज़मीन को अनजान खरीदारों को बेच दिया। बिक्री से मिली रकम, जिसमें लगभग 3.24 करोड़ रुपये की 'अपराध से हुई कमाई' शामिल थी, उसे सह-आरोपी के नाम पर खोले गए बैंक खाते में जमा किया गया। बाद में वह राशि उसके कंट्रोल वाली कंपनियों में ट्रांसफर कर दी गई। सीएफएसएल द्वारा बैंक के असली रिकॉर्ड की फोरेंसिक जांच से यह साबित हुआ है कि यह खाता असल में नवीन कुमार मित्तल ही चलाते थे। 

बार-बार समन मिलने के बावजूद, नवीन कुमार मित्तल जांच में शामिल नहीं हुए। ईडी के अनुसार, उन्होंने गवाहों को प्रभावित किया। अपने ही रिश्तेदारों को एजेंसी के सामने बयान देने से रोका। साथ ही, उन्होंने नए नकली कागज़ात बनाकर गलत लेन-देन को सही दिखाने की कोशिश की। अगस्त 2026 में ईडी द्वारा उनके ठिकानों पर की गई छापेमारी में दोषी ठहराने वाले कागजात और डिजिटल डिवाइस ज़ब्त किए गए। ज़मीन से जुड़े अन्य धोखाधड़ी के मामलों में भी उनकी भूमिका सामने आई है और उनकी जांच चल रही है।

नकली रेवेन्यू रिकॉर्ड और जाली मालिकाना हक, इसके जरिए ज़मीन की धोखाधड़ी, ऐसे केस उत्तराखंड में सबसे ज़्यादा होने वाले आर्थिक अपराधों में शामिल हैं। इससे नागरिकों की जीवन भर की बचत का नुकसान होता है। जमीन रजिस्ट्रेशन सिस्टम पर जनता का भरोसा कम होता है। मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी से यह साफ संदेश जाता है कि ऐसी धोखाधड़ी से पैसा कमाने और उसे वैध दिखाने (मनी लॉन्ड्रिंग) वालों को सज़ा दिलाई जाएगी। पीएमएलए के तहत गलत तरीके से बनाई गई संपत्ति का पता लगाकर उसे अटैच और जब्त किया जाएगा। 
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