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कम वजन और बौनापन : हर दूसरे बच्चे को हृदय-मधुमेह जैसे रोग का खतरा, अब सरकार को सता रही अगले 25 साल की चिंता

Sun, 24 Apr 2022 05:24 AM IST
योगेश साहू परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली। 
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली।  Published by: योगेश साहू Updated Sun, 24 Apr 2022 05:24 AM IST
सार

नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की डॉ. सरिता बताती हैं कि भारत एक युवा देश है। इसकी आबादी में युवाओं का योगदान सबसे अधिक है। बाल स्वास्थ्य पर ध्यान देना बहुत जरूरी होगा। अन्यथा देश में साल 2030 या फिर 2040 तक बीमारियों का भार और अधिक बढ़ सकता है।

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Underweight and dwarfism: Every second child is at risk of diseases like heart-diabetes, now the government is worrying about the next 25 years
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

विस्तार

पांच से 19 साल का हर दूसरा कम वजन वाला या फिर बौनापन का शिकार बच्चा अपने जीवन में कभी न कभी गैर संचारी रोग (एनसीडी) की चपेट में आ सकता है। इन बच्चों का भविष्य उच्च रक्तचाप और कार्डियो मेटाबॉलिक जोखिम जैसी चुनौतियों से घिर सकता है जो इन्हें कार्डियोवैस्कुलर स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं, मधुमेह, मोटापा इत्यादि परेशानियों में ले जा सकता है। 

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व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण (सीएनएनएस) और राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) का हवाला देते हुए भारत सरकार के बायोटेक्नोलॉजी विभाग (डीबीटी) ने चिंता जताई है कि भविष्य में एनसीडी रोगों की सुनामी से बचने के लिए बाल स्वास्थ्य पर अभी से काम करना बहुत जरूरी है। इसके लिए डीबीटी ने देश के सरकारी और प्राइवेट शोध-अनुसंधान केंद्रों से सहयोग भी मांगा है। इसके लिए विभाग ने आगामी 27 अप्रैल तक संस्थानों से आवेदन भी मांगे हैं।

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भारत युवा देश, इसलिए चिंता भी ज्यादा
नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की डॉ. सरिता बताती हैं कि भारत एक युवा देश है। इसकी आबादी में युवाओं का योगदान सबसे अधिक है। बाल स्वास्थ्य पर ध्यान देना बहुत जरूरी होगा। अन्यथा देश में साल 2030 या फिर 2040 तक बीमारियों का भार और अधिक बढ़ सकता है। चिकित्सीय अध्ययनों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि 20 से 25 साल बाद भारत में प्रति परिवार बीमारियों पर सालाना खर्च में 50 से 60 गुना तक बढ़ोतरी हो सकती है।

ग्रामीण बच्चों पर अधिक ध्यान
आगामी दिनों में देश के विशेषज्ञों के साथ मिलकर डीबीटी पोषण संबंधी नीतियों को न सिर्फ तैयार करेगा बल्कि जांच और उपचार के    साथ इसे प्राथमिक स्तर तक लेकर भी जाएगा ताकि ग्रामीण और कस्बा क्षेत्र के बच्चों पर सबसे अधिक ध्यान दिया जा सके।

जोखिम देखते हुए बनेगी नीति
देश के दो बड़े राष्ट्रीय सर्वेक्षण सीएनएनएस व एनएफएचएस में काफी हद तक स्थिति स्पष्ट हुई है। इसमें कुपोषण, बौनापन और कमजोर बच्चों को लेकर गंभीर परिणाम सामने आए हैं। साथ ही पता चलता है कि बच्चे के शुरुआती जीवन के दो वर्ष में ही रैखिक विकास लड़खड़ाता है। इसके बाद अविकसित या कम वजन वाले बच्चे स्थिर होने लगते हैं। ऐसे में जरूरी है कि नौनिहालों का सभी जोखिम को देखते हुए मूल्यांकन हो। खासतौर पर शुरुआती छह माह के दौरान आहार, बीमारी और इलाज पर ध्यान देना अहम है।

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अध्ययन के तीन अहम पड़ाव

  • 6 माह से 5 वर्ष तक के बच्चों के शारीरिक विकास और शरीर संरचना के लिए पोषण संबंधी जरूरतों का गहनता से समझना।
  • विभिन्न सामाजिक आर्थिक परिवेश से आने वाले किशोर और बच्चों के भविष्य में अस्थायी वसा अभिवृद्धि पैटर्न और कार्डियो मेटाबॉलिक जोखिम के कारको की स्पष्ट जानकारी।
  • पोषण और चयापचय के तहत आहार और जीवन शैली में एंथ्रोपोमेट्रिक के दोहरे बोझ का मूल्यांकन करना।
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