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टीएमसी का घमासान: ममता और ऋतब्रत गुट की आज चुनाव आयोग के सामने पेशी, बंगाल उपचुनाव से पहले सुनवाई क्यों अहम?
Thu, 17 Sep 2026 12:24 AM IST
देवेश त्रिपाठी
पीटीआई, कोलकाता
पीटीआई, कोलकाता
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Thu, 17 Sep 2026 12:24 AM IST
सार
तृणमूल कांग्रेस के संगठन और 'जोड़ा घास फूल' चुनाव चिह्न पर अधिकार को लेकर ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी गुटों के बीच विवाद जारी है। चुनाव आयोग दोनों पक्षों की 17 सितंबर को अलग-अलग सुनवाई करेगा। दोनों गुट खुद को पार्टी का वैध प्रतिनिधि बताते हुए अपने-अपने दावे और दस्तावेज आयोग के सामने रख चुके हैं।
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टीएमसी चुनाव चिह्न विवाद
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/AdobeStock
विस्तार
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के संगठनात्मक नियंत्रण और उसके 'जोड़ा घास फूल' चुनाव चिह्न को लेकर चल रही लड़ाई अब निर्णायक दौर में पहुंचती दिख रही है। चुनाव आयोग गुरुवार को नई दिल्ली में ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले दोनों गुटों की अलग-अलग सुनवाई करेगा। सूत्रों के मुताबिक, ऋतब्रत के नेतृत्व वाला गुट दोपहर तीन बजे चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ के सामने पेश होगा। इसके एक घंटे बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट आयोग के सामने अपनी बात रखेगा।
टीएमसी के बागी गुट के विधायक संदीपन साहा ने कहा, "हम वहां अपना पक्ष रखेंगे। हमें उम्मीद है।" ममता गुट के एक वरिष्ठ सदस्य ने भी पुष्टि की कि उसके पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल को शाम चार बजे पेश होने के लिए बुलाया गया है। ममता गुट के वरिष्ठ सांसद ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग सभी जरूरी सबूत और दस्तावेज होने के बावजूद मामले में जानबूझकर देरी कर रहा है और इस मुद्दे को लेकर "बहुत शोर पैदा करने की कोशिश कर रहा है।"
नंदीग्राम और रेजिनगर उपचुनाव के लिए क्यों खास है सुनवाई?
दोनों गुटों की लगातार होने वाली यह सुनवाई बुधवार को आयोग में दस्तावेज और कानूनी सामग्री जमा करने के एक दिन बाद हो रही है। यह नंदीग्राम और रेजिनगर में छह अक्तूबर को होने वाले उपचुनावों के लिए नामांकन दाखिल करने की 16 सितंबर की समयसीमा खत्म होने के कुछ घंटे बाद भी हो रही है।
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इस समय ने संगठनात्मक नियंत्रण तक सीमित इस विवाद को और महत्वपूर्ण बना दिया है। तत्काल सवाल यह है कि क्या दोनों में से कोई गुट उपचुनाव में 'जोड़ा घास फूल' चुनाव चिह्न के साथ मैदान में उतरेगा या अंतिम फैसला होने तक आयोग इस चिह्न को रोक देगा।
ममता और ऋतब्रत गुट ने किए क्या दावे?
ममता गुट का कहना है कि पार्टी के संविधान के तहत उसके संगठनात्मक समितियां वैध हैं। वहीं, ऋतब्रत गुट ने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बीच अपने समर्थन का हवाला देते हुए खुद को वैध टीएमसी बताया है। ऋतब्रत गुट ने इस साल की शुरुआत में अपना पक्ष आयोग के सामने रखने के बाद से चुनाव आयोग दोनों गुटों के दावों की जांच कर रहा है।
विवाद ने एक अलग चुनावी रूप भी ले लिया है। दोनों गुटों ने दोनों विधानसभा क्षेत्रों के लिए अपने-अपने समर्थित उम्मीदवारों के नाम पहले ही घोषित कर दिए हैं। हालांकि, यह सवाल अब भी बना हुआ है कि स्थापित पार्टी की पहचान का इस्तेमाल कौन सा गुट कर सकता है।
टीएमसी के लिए क्यों खास है नंदीग्राम और रेजिनगर उपचुनाव?
टीएमसी के लिए नंदीग्राम का महत्व खास है। यह सीट 2007 के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन का केंद्र रही थी। इस आंदोलन ने टीएमसी को सत्ता तक पहुंचाने में मदद की थी और अंततः 34 साल तक सत्ता में रहे वाम मोर्चे की हार में भी भूमिका निभाई थी।
वहीं, रेजिनगर का चुनाव संगठनात्मक विभाजन की तत्काल दूसरी परीक्षा है। दोनों गुट जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में उपचुनाव पहली ऐसी चुनावी जमीन बन सकते हैं, जहां टीएमसी की विरासत पर दोनों गुटों के दावों की एक साथ परीक्षा होगी।
चुनाव आयोग के फैसले का बंगाल उपचुनाव पर होगा क्या असर?
दोनों गुटों के नेताओं के मुताबिक, चुनाव आयोग के विकल्पों का असर इन दोनों उपचुनावों से आगे भी हो सकता है। अगर आयोग किसी एक गुट के दावे को मान्यता देता है, तो दूसरे गुट को अलग नाम और चुनाव चिह्न के साथ चुनाव लड़ना पड़ सकता है। वहीं, यदि तत्काल कोई फैसला नहीं होता है तो मौजूदा चुनाव चिह्न को रोककर दोनों पक्षों को अस्थायी चुनावी पहचान दिए जाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
दोनों गुटों के नेताओं के मुताबिक, महाराष्ट्र में शिवसेना विवाद के दौरान आयोग ने इसी तरह का रास्ता अपनाया था। उस समय अंतिम फैसला होने तक प्रतिद्वंद्वी गुटों को मूल पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न से वंचित किया गया था और उन्हें अलग-अलग पहचान दी गई थी।
चुनाव आयोग की सुनवाई में अब क्या हुआ?
चुनाव आयोग के फैसले पर क्यों टिकी नजरें?
अब नामांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। ऐसे में गुरुवार की सुनवाई महत्वपूर्ण हो गई है। आयोग जो भी रास्ता अपनाता है, उससे न सिर्फ नंदीग्राम और रेजीनगर के मतपत्रों पर दिखाई देने वाले चुनाव चिह्न का सवाल तय हो सकता है, बल्कि इस साल के अंत में संभावित निकाय चुनावों से पहले दोनों गुट मतदाताओं के सामने खुद को किस रूप में पेश करेंगे, यह भी प्रभावित हो सकता है।
दोनों पक्षों के लिए गुरुवार की सुनवाई केवल पार्टी के चुनाव चिह्न का मामला नहीं है। यह इस बात से भी जुड़ी है कि अगली चुनावी लड़ाई में टीएमसी का नाम और उसकी राजनीतिक विरासत लेकर कौन सा गुट आगे बढ़ेगा।
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टीएमसी के बागी गुट के विधायक संदीपन साहा ने कहा, "हम वहां अपना पक्ष रखेंगे। हमें उम्मीद है।" ममता गुट के एक वरिष्ठ सदस्य ने भी पुष्टि की कि उसके पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल को शाम चार बजे पेश होने के लिए बुलाया गया है। ममता गुट के वरिष्ठ सांसद ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग सभी जरूरी सबूत और दस्तावेज होने के बावजूद मामले में जानबूझकर देरी कर रहा है और इस मुद्दे को लेकर "बहुत शोर पैदा करने की कोशिश कर रहा है।"
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नंदीग्राम और रेजिनगर उपचुनाव के लिए क्यों खास है सुनवाई?
दोनों गुटों की लगातार होने वाली यह सुनवाई बुधवार को आयोग में दस्तावेज और कानूनी सामग्री जमा करने के एक दिन बाद हो रही है। यह नंदीग्राम और रेजिनगर में छह अक्तूबर को होने वाले उपचुनावों के लिए नामांकन दाखिल करने की 16 सितंबर की समयसीमा खत्म होने के कुछ घंटे बाद भी हो रही है।
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इस समय ने संगठनात्मक नियंत्रण तक सीमित इस विवाद को और महत्वपूर्ण बना दिया है। तत्काल सवाल यह है कि क्या दोनों में से कोई गुट उपचुनाव में 'जोड़ा घास फूल' चुनाव चिह्न के साथ मैदान में उतरेगा या अंतिम फैसला होने तक आयोग इस चिह्न को रोक देगा।
ममता और ऋतब्रत गुट ने किए क्या दावे?
ममता गुट का कहना है कि पार्टी के संविधान के तहत उसके संगठनात्मक समितियां वैध हैं। वहीं, ऋतब्रत गुट ने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बीच अपने समर्थन का हवाला देते हुए खुद को वैध टीएमसी बताया है। ऋतब्रत गुट ने इस साल की शुरुआत में अपना पक्ष आयोग के सामने रखने के बाद से चुनाव आयोग दोनों गुटों के दावों की जांच कर रहा है।
विवाद ने एक अलग चुनावी रूप भी ले लिया है। दोनों गुटों ने दोनों विधानसभा क्षेत्रों के लिए अपने-अपने समर्थित उम्मीदवारों के नाम पहले ही घोषित कर दिए हैं। हालांकि, यह सवाल अब भी बना हुआ है कि स्थापित पार्टी की पहचान का इस्तेमाल कौन सा गुट कर सकता है।
टीएमसी के लिए क्यों खास है नंदीग्राम और रेजिनगर उपचुनाव?
टीएमसी के लिए नंदीग्राम का महत्व खास है। यह सीट 2007 के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन का केंद्र रही थी। इस आंदोलन ने टीएमसी को सत्ता तक पहुंचाने में मदद की थी और अंततः 34 साल तक सत्ता में रहे वाम मोर्चे की हार में भी भूमिका निभाई थी।
वहीं, रेजिनगर का चुनाव संगठनात्मक विभाजन की तत्काल दूसरी परीक्षा है। दोनों गुट जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में उपचुनाव पहली ऐसी चुनावी जमीन बन सकते हैं, जहां टीएमसी की विरासत पर दोनों गुटों के दावों की एक साथ परीक्षा होगी।
चुनाव आयोग के फैसले का बंगाल उपचुनाव पर होगा क्या असर?
दोनों गुटों के नेताओं के मुताबिक, चुनाव आयोग के विकल्पों का असर इन दोनों उपचुनावों से आगे भी हो सकता है। अगर आयोग किसी एक गुट के दावे को मान्यता देता है, तो दूसरे गुट को अलग नाम और चुनाव चिह्न के साथ चुनाव लड़ना पड़ सकता है। वहीं, यदि तत्काल कोई फैसला नहीं होता है तो मौजूदा चुनाव चिह्न को रोककर दोनों पक्षों को अस्थायी चुनावी पहचान दिए जाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
दोनों गुटों के नेताओं के मुताबिक, महाराष्ट्र में शिवसेना विवाद के दौरान आयोग ने इसी तरह का रास्ता अपनाया था। उस समय अंतिम फैसला होने तक प्रतिद्वंद्वी गुटों को मूल पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न से वंचित किया गया था और उन्हें अलग-अलग पहचान दी गई थी।
चुनाव आयोग की सुनवाई में अब क्या हुआ?
- टीएमसी का यह विवाद अब तक कई दौर की दलीलों और सुनवाई से गुजर चुका है। दो जुलाई को ऋतब्रत के नेतृत्व में 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल आयोग के सामने पेश हुआ था। गुट ने बहुमत का समर्थन होने का दावा करते हुए पार्टी के संगठन और संपत्तियों पर नियंत्रण की मांग की थी।
- इसके बाद चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों से जवाब मांगा। ममता गुट ने असंतुष्ट नेताओं के दावे को खारिज करते हुए अपने संगठनात्मक ढांचे को वैध बताया। आयोग ने 12 सितंबर को दोनों गुटों की फिर सुनवाई की और 16 सितंबर की समयसीमा से पहले अतिरिक्त सामग्री मांगी।
चुनाव आयोग के फैसले पर क्यों टिकी नजरें?
अब नामांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। ऐसे में गुरुवार की सुनवाई महत्वपूर्ण हो गई है। आयोग जो भी रास्ता अपनाता है, उससे न सिर्फ नंदीग्राम और रेजीनगर के मतपत्रों पर दिखाई देने वाले चुनाव चिह्न का सवाल तय हो सकता है, बल्कि इस साल के अंत में संभावित निकाय चुनावों से पहले दोनों गुट मतदाताओं के सामने खुद को किस रूप में पेश करेंगे, यह भी प्रभावित हो सकता है।
दोनों पक्षों के लिए गुरुवार की सुनवाई केवल पार्टी के चुनाव चिह्न का मामला नहीं है। यह इस बात से भी जुड़ी है कि अगली चुनावी लड़ाई में टीएमसी का नाम और उसकी राजनीतिक विरासत लेकर कौन सा गुट आगे बढ़ेगा।