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Malegaon Blast Case: बाइक में हुआ था धमाका, सात आरोपी और 17 साल बाद फैसला; जानें क्या है मालेगांव विस्फोट केस

Thu, 31 Jul 2025 11:56 AM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: बशु जैन Updated Thu, 31 Jul 2025 11:56 AM IST
सार

महाराष्ट्र के मालेगांव विस्फोट मामले के लगभग 17 साल बाद एनआईए की विशेष अदालत गुरुवार को फैसला सुनाया। कोर्ट ने प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित सहित सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया। आइए समझते हैं क्या है मालेगांव विस्फोट मामला....। 

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There was a blast in the bike, seven accused and the verdict after 17 years; Know what is Malegaon blast case
मालेगांव विस्फोट केस। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

साल 2008 में मालेगांव में एक बाइक में धमाका हुआ और छह लोगों की जान चली गई। 101 लोग घायल हुए। विस्फोट के बाद पुलिस कार्रवाई शुरू हुई। भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित सहित सभी सात लोगों को आरोपी बनाया गया। साल दर साल मामला चलता रहा। धीरे-धीरे गवाह बयान से मुकरते गए और 17 साल बाद एनआईए कोर्ट ने सातों आरोपियों को बरी कर दिया। आइए विस्तार से समझते हैं क्या है मालेगांव विस्फोट मामला....। 
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सबसे पहले जानते हैं मालेगांव विस्फोट क्या है

29 सितंबर, 2008 को महाराष्ट्र के नासिक जिले में मुंबई से 200 किमी दूर मालेगांव शहर में मुस्लिम बहुल क्षेत्र अंजुमन चौक और भीकू चौक के बीच मौजूद शकील गुड्स ट्रांसपोर्ट कंपनी के सामने रात 9:35 बजे बम विस्फोट में छह लोगों की मौत हो गई और 101 लोग घायल हुए थे। रमजान महीने में एक मस्जिद के पास बाइक में धमाका हुआ था। विस्फोट को पहला आतंकी हमला मानते हुए महाराष्ट्र एटीएस ने जांच शुरू की थी। 
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एटीएस को जांच में क्या मिला?
मामले की शुरुआती जांच महाराष्ट्र की आतंकवाद विरोधी दस्ता (एटीएस) ने की थी। एटीएस ने जांच में पाया कि एलएमएल फ्रीडम मोटरसाइकिल पर आईईडी लगाया गया था, जिससे विस्फोट हुआ। जांच में सामने आया कि बाइक का रजिस्ट्रेशन नंबर फर्जी था और इंजन नंबर और चेसिस नंबर मिटा दिए गए थे। इसके बाद वाहन को फॉरेंसिक लैब में भेज दिया गया। यहां जांच के बाद पता चला कि बाइक का पंजीकरण पूर्व भाजपा सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के नाम पर था। इसके बाद उनको 23 अक्तूबर 2008 को गिरफ्तार किया गया। 
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एटीएस ने जांच के दौरान मामले में कर्नल पुरोहित समेत 11 लोगों को गिरफ्तार किया। एटीएस ने जांच में पाया कि आरोपियों ने अभिनव भारत नामक संगठन बनाया था। उन पर महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम, 1999 (मकोका) के तहत आरोप लगाए गए थे। एटीएस ने जनवरी 2009 में आरोपपत्र दाखिल किया जिसमें 11 लोगों को आरोपी बनाया गया और कहा गया कि उनका मानना है कि उन्होंने मुस्लिम लोगों द्वारा किए गए आतंकवादी कृत्यों का बदला लेने के लिए विस्फोट किया। 

एटीएस जांच में दावा किया गया था कि आरोपी पुरोहित कश्मीर में अपनी पोस्टिंग पूरी करने के बाद अपने साथ आरडीएक्स लाया था और इसे अपने घर में रखा था। एटीएस जांच में आरोपी सुधाकर चतुर्वेदी के नासिक मौजूद घर में आरडीएक्स के निशान मिले थे, जहां बम बनाया गया था और प्रज्ञा ठाकुर ने पूरी जानकारी के साथ बम विस्फोट करने के लिए अपनी मोटरसाइकिल मुहैया कराई थी। 

There was a blast in the bike, seven accused and the verdict after 17 years; Know what is Malegaon blast case
एनआईए - फोटो : ANI
2011 में एनआईए को सौंपी गई जांच
2011 में केस राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपा गया। एनआईए जांच के दौरान आरोपियों ने मकोका के खिलाफ कोर्ट का रुख किया। 2016 में एनआईए ने आरोपपत्र दायर किया। इसमें एनआईए ने आरोपियों पर लगे मकोका के आरोप को हटा दिया। एनआईए ने माना कि मकोका का इस्तेमाल संदिग्ध था। एनआईए ने प्रज्ञा ठाकुर के खिलाफ जुटाए गए साक्ष्यों में भी खामियां पाईं। साथ ही माना गया कि 11 में से आरोपियों ने सात को आरोपी माना।  उसने प्रज्ञा ठाकुर और तीन अन्य आरोपियों- श्याम साहू, प्रवीण तकलकी और शिवनारायण कलसांगरा को क्लीन चिट देते हुए कहा कि उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला है और उन्हें मामले से बरी करने की मांग की थी।

मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के विशेष सरकारी वकील अविनाश रसल और अनुश्री रसल की ओर से पेश हुए अपने बयान में कहा कि वारदात के दौरान रमजान का पवित्र महीना था और नवरात्रि उत्सव शुरू होने वाला था। साजिशकर्ताओं ने लोगों को आतंकित करने, जान-माल की हानि करने के इरादे से विस्फोट किए थे। यह समुदाय के लिए आवश्यक आपूर्ति और सेवाओं को बाधित करने, सांप्रदायिक दरार पैदा करने और राज्य की आंतरिक सुरक्षा को खतरे में डालने के इरादे से किया गया था।

कौन-कौन थे आरोपी? 
मामले में भाजपा सांसद प्रज्ञा ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, मेजर रमेश उपाध्याय, अजय राहिरकर, सुधाकर द्विवेदी, सुधाकर चतुर्वेदी और समीर कुलकर्णी पर आतंकवाद और आपराधिक साजिश के गंभीर आरोप लगे थे। इन सभी पर गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत मुकदमा चला है, जिनमें हत्या, साजिश, सांप्रदायिकता फैलाना, और आतंक फैलाने जैसे आरोप शामिल हैं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने इस मामले की जांच की और कोर्ट से आरोपियों को उनके अपराध के अनुसार सजा देने की मांग की थी। 
 

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अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई (सांकेतिक) - फोटो : ANI
2018 में शुरू हुआ ट्रायल
मामले में 2018 में एनआईए कोर्ट में ट्रायल शुरू हुआ था। 19 अप्रैल 2025 को बहस पूरी हुई। कोर्ट ने गुरुवार को मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने फैसले में कहा कि न्यायाधीश ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि मामले को संदेह से परे साबित करने के लिए कोई विश्वसनीय और ठोस सबूत नहीं है। मामले में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के प्रावधान लागू नहीं होते। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह साबित नहीं हुआ है कि विस्फोट में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल प्रज्ञा ठाकुर के नाम पर पंजीकृत थी, जैसा कि अभियोजन पक्ष ने दावा किया है। यह भी साबित नहीं हुआ है कि विस्फोट कथित तौर पर बाइक पर लगाए गए बम से हुआ था। 

अदालत ने कहा कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। कोई भी धर्म हिंसा का समर्थन नहीं कर सकता। अदालत केवल धारणा और नैतिक साक्ष्य के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहरा सकती। इसके लिए ठोस सबूत होना जरूरी है।' कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने साबित किया कि मालेगांव में विस्फोट हुआ था, लेकिन यह साबित नहीं कर पाया कि उस मोटरसाइकिल में बम रखा गया था। अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि घायलों की संख्या 101 नहीं, बल्कि केवल 95 थी। कुछ मेडिकल प्रमाणपत्रों में भी हेराफेरी की गई थी।

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