SC: जानवरों को जीवित व्यक्तियों की तरह अधिकार प्राप्त इकाई घोषित करने की याचिका खारिज; पढ़ें अहम खबरें
याचिका में कहा गया था कि जानवरों के प्रति क्रूरता के हाल में सामने आए मामलों ने सवाल उठाया है कि कैसे इंसानों के मन में जानवरों के जीवन के लिए कोई सम्मान नहीं है। वे सहानुभूति से बिल्कुल रहित कैसे हो सकते हैं।
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सुप्रीम कोर्ट ने सभी जानवरों को किसी भी जीवित व्यक्ति की तरह अधिकार प्राप्त इकाई घोषित करने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा, रिट याचिका में की गई प्रार्थना संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस अदालत को दी गई असाधारण अधिकार क्षेत्र में नहीं आती है।
एक एनजीओ की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया कि जानवरों के प्रति क्रूरता के हाल में सामने आए मामलों ने सवाल उठाया है कि कैसे इंसानों के मन में जानवरों के जीवन के लिए कोई सम्मान नहीं है। वे सहानुभूति से बिल्कुल रहित कैसे हो सकते हैं। इस तरह की घटनाओं ने कई लोगों को क्रोधित किया है। यह सोचने पर मजबूर किया है कि क्या मौजूदा कानून जानवरों को संभावित दुर्व्यवहार और क्रूरता से बचाने के लिए पर्याप्त है। याचिका में विभिन्न राज्यों में क्रूरता की विभिन्न घटनाओं का जिक्र किया।
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जनहित याचिका ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसलों को आधार बनाया गया है जिसमें पशु साम्राज्य के सभी जानवरों को कानूनी संस्थाओं के रूप में मान्यता दी गई थी।
सात न्यायाधीशों की याचिका पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह पटना हाईकोर्ट के उन सात न्यायाधीशों की याचिका पर 17 अप्रैल को सुनवाई करेगा, जिनके सामान्य भविष्य निधि (जीपीएफ) खातों को कथित तौर पर बंद कर दिया गया था। चीफ जस्टिस (सीजेआई) डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ को इस याचिका पर 27 मार्च को सुनवाई करनी थी लेकिन समय की कमी के कारण इस पर सुनवाई नहीं हो सकी।
पीठ ने कहा, याचिका को 17 अप्रैल को सूचीबद्ध करें। पीठ में जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला शामिल थे। शीर्ष कोर्ट ने 20 मार्च को न्यायाधीशों का वेतन उनके पद के आधार पर जारी करने का आदेश दिया था। पीठ ने स्थिति का संज्ञान लिया था और कहा था कि 'अंतरिम उपाय' के तौर पर वह हाईकोर्ट के न्यायाधीशों का वेतन 13 दिसंबर, 2022 से पहले की स्थिति के अनुसार जारी करने का आदेश दे रही है। केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय ने जीपीएफ के उनके हक का मुद्दा उठाया था।
जनहित में जब तक बहुत जरूरी न हो सरकारों की निगरानी अस्वीकार्य: जस्टिस चेलमेश्वर
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस जे चेलामेश्वर ने कहा, व्यापक जनहित में जब तक बहुत जरूरी न हो सरकार की ओर से निगरानी अस्वीकार्य है। नागरिकों की निगरानी को विनियमित करने वाली एक तर्कसंगत कानूनी प्रणाली बनाने के लिए सांसदों और संसद पर ‘लोकतांत्रिक दबाव’ डालने की अधिक आवश्यकता थी। सरकार के पास परिस्थितियों के आधार पर निगरानी रखने के कारण हैं, लेकिन प्रक्रिया में पारदर्शिता होनी चाहिए।
जांच एजेंसियों खासतौर से सीबीआई पर निगरानी और उसके दुरुपयोग पर पूर्व जज ने कहा, यह संकट सत्तारूढ़ पार्टियों से परे है। जो दल आज इसके विरोध में शोर मचा रहे हैं, उन्होंने भी 40 साल में केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग को रोकने वाला तंत्र विकसित करने के लिए कुछ नहीं किया।
उन्होंने कहा, मैं जब सरकारों की बात करता हूं तो मैं किसी राजनीतिक दल की बात नहीं करता। किसी भी राजनीतिक दल की सरकार हो, हार्डवेयर में बदलाव होता है, सॉफ्टवेयर वही रहता है। सभी लोग समान प्रथाओं का पालन करते हैं। इस बीच हमने सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग की कई शिकायतें सुनीं। जो लोग अभी शिकायत कर रहे हैं, वे 40 साल तक सरकार में थे। लेकिन उन्होंने तब सीबीआई पर निगरानी करने या उसे विनयमित करने का तंत्र बनाने के लिए कुछ नहीं किया।
वकील हरप्रीत सिंह बरार को नियुक्त किया गया अतिरिक्त न्यायाधीश
वकील हरप्रीत सिंह बरार को आज पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया है। कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने बरार की नियुक्ति की घोषणा को लेकर ट्वीट किया। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट कॉलेजियम ने पिछले साल मार्च में न्यायाधीश के रूप में पदोन्नति के लिए बरार के नाम की सिफारिश की थी।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने पिछले साल जुलाई में उनके नाम को मंजूरी दी थी और इसे केंद्र को भेज दिया था। कानून मंत्रालय के न्याय विभाग ने कुछ मुद्दों को उठाया था और पिछले साल नवंबर में पुनर्विचार के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को उनका नाम लौटा दिया था। 21 मार्च के अपने प्रस्ताव में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने बरार के नाम को दोहराया। अतिरिक्त न्यायाधीशों को आमतौर पर न्यायाधीशों के रूप में पदोन्नत होने से पहले दो साल की अवधि के लिए नियुक्त किया जाता है।