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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: सामाजिक क्रांति एक रात में नहीं होती, सशस्त्र सेना समरूप इकाई, इसे जाति या पंथ में विभाजित नहीं करना चाहिए

Tue, 08 Mar 2022 09:25 PM IST
गौरव पाण्डेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गौरव पाण्डेय Updated Tue, 08 Mar 2022 09:25 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हम एनडीए में आरक्षण पर विचार नहीं करेंगे बल्कि ऐसे शिक्षण संस्थानों में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर विचार करेंगे जो केवल लड़कों के लिए रहे हैं।

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Supreme Court says social revolution does not come overnight on reservation for SC ST reservation in NDA news in Hindi
Supreme Court - फोटो : PTI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा, भारत की सशस्त्र सेना एक समरूप इकाई है जिसे जाति या पंथ के आधार पर विभाजित नहीं किया जाना चाहिए। इस टिप्पणी के साथ ही शीर्ष अदालत ने सैन्य स्कूलों में प्रवेश में जाति आरक्षण की याचिका को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, राष्ट्रीय भारतीय सैन्य कॉलेज और अन्य सैन्य स्कूलों में महिलाओं के प्रवेश से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। 

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जस्टिस संजय किशन कौल की पीठ ने कहा, इन स्कूलों को महिलाओं के लिए खोलकर एक शुरुआत की गई है। जाति आधारित आरक्षण के मुद्दे को लेकर अदालत का ध्यान नहीं भटकाना चाहिए। पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील कैलास मोरे से कहा, सैन्य स्कूलों में आपको जातिगत आरक्षण नहीं मिल सकता है। आरक्षण के सांविधानिक प्रावधान इस तरह से काम नहीं करते। हम लैंगिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं और हम नहीं चाहेंगे कि आप इसे जाति आदि के अन्य मुद्दों में विभाजित करें।
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दरअसल मोरे ने सैन्य कॉलेज, राष्ट्रीय सैन्य स्कूलों और सैनिक स्कूलों में लैंगिक भेदभाव और पूर्वाग्रह का मुद्दा उठाया था। मोरे ने अपनी याचिका में सशस्त्र बल में सभी समुदायों को शामिल करने के लिए जाति-आधारित आरक्षण पर विचार करने का अनुरोध किया था। शीर्ष अदालत मोरे की दलीलों से प्रभावित नहीं हुई।
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आप यहां नागरिक रोजगार के सिद्धांत लागू नहीं कर सकते
पीठ ने कहा, आप यहां नागरिक रोजगार के सिद्धांतों को लागू नहीं कर सकते। एक अधिकारी सशस्त्र बलों में एक अधिकारी है। कोई उत्तर प्रदेश से है, कोई तमिलनाडु से लेकिन वे एक समरूप इकाई हैं। आप उन्हें जाति के आधार पर अलग नहीं कर सकते।

रातों रात नहीं हो सकती सामाजिक क्रांति 
पीठ ने कहा, याचिकाओं के समूह में मुख्य मुद्दा यह सुनिश्चित करना है कि महिलाओं को भी सैन्य स्कूलों में प्रवेश मिले। अब जबकि केंद्र सरकार और सशस्त्र बल इस विचार के साथ हैं तो जाति के आधार पर आरक्षण के मसले पर जाना उचित नहीं है। हमारा ध्यान सिर्फ लैंगिक मुद्दों पर है। हमें दूसरे मुद्दों पर ले जाने की कोशिश न की जाए। सामाजिक क्रांति रातों-रात नहीं आती। समय लगता है। एक शुरुआत हुई है। सामाजिक परिवर्तन में थोड़ा समय लगता है और पहला अध्याय लिखा जा चुका है। सर्वप्रथम पहले अध्याय को खत्म होने दें।

सैन्य स्कूलों में लड़कियों को शामिल करने का प्रयोग सफल रहा: भाटी
सैनिक स्कूलों में लड़कियों को शामिल करने के बारे में पीठ ने 2021 में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई एक घोषणा को याद किया। पीठ ने कहा, पीएम ने सैनिक स्कूलों में लड़कियों को शामिल करने के बारे में कुछ कहा था। उसकी क्या स्थिति है? केंद्री की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा, कुछ लड़कियों को प्रायोगिक आधार पर सैनिक स्कूलों में प्रवेश दिया गया है। वह प्रयोग सफल रहा है लेकिन मेरे पास इस संबंध में सटीक डेटा नहीं है। इस पर अदालत ने भाटी को 19 जुलाई को अगली सुनवाई तक संबंधित आंकड़े पेश करने को कहा है।


रक्षा अकादमी में महिलाओं की संख्या बढ़ाने पर विचार के लिए केंद्र को तीन महीने दिए 
पीठ ने सुनवाई के दौरान सशस्त्र बलों द्वारा दिखाए गए दृष्टिकोण पर संतोष व्यक्त किया। लिहाजा अदालत, केंद्र सरकार को रक्षा अकादमी में महिला कैडेटों को शामिल करने की मौजूदा संख्या (19) से बढ़ाने पर विचार के लिए केंद्र को तीन महीने का वक्त और देने पर सहमत हो गई।

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