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Supreme Court: 'समलैंगिक विवाह पर अदालत में आदेश की समीक्षा नहीं'; सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका खारिज
Thu, 09 Jan 2025 10:42 PM IST
पवन पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: पवन पांडेय
Updated Thu, 09 Jan 2025 10:42 PM IST
सार
समलैंगिक विवाह पर शीर्ष अदालत के आदेश की समीक्षा की अपील खारिज हो गई है। शीर्ष अदालत में पांच जजों की पीठ ने यह फैसला सुनाया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक शीर्ष अदालत ने कहा कि पहले पारित हुआ आदेश पूरी तरह न्यायसंगत है, ऐसे में उसमें हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
समलैंगिक विवाह पर पहले पारित आदेश पर दोबारा विचार करने की अपील सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। शीर्ष अदालत की पीठ ने कहा, जिस फैसले पर दोबारा विचार की अपील की गई है, वह कानून के मुताबिक सही हैं। अदालत को इसमें पुनर्विचार की कोई जरूरत नहीं दिखती। इसलिए पूर्व के आदेश में हस्तक्षेप उचित नहीं है। मामले में शीर्ष अदालत में जस्टिस बीआर गवई, न्यायमूर्ति सूर्यकांत, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस पीवी नरसिम्हा और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की बेंच ने यह फैसला सुनाया। पीठ ने मामले में कहा कि उन्हें अपने पिछले फैसले में रिकॉर्ड पर कोई त्रुटि नहीं दिखी।
'मत कानून के अनुसार, हस्तक्षेप की जरूरत नहीं'
चैंबर कार्यवाही के बाद दिए गए अपने आदेश में पीठ ने कहा कि हमने एस रवींद्र भट (पूर्व न्यायाधीश) के खुद और जस्टिस हिमा कोहली (पूर्व न्यायाधीश) के लिए दिए गए फैसलों और हममें से एक (जस्टिस नरसिम्हा) की ओर से दी गई सहमति वाली राय को ध्यान से पढ़ा है। यह बहुमत का मत था। पीठ ने कहा कि दोनों फैसलों में दिया गया मत कानून के अनुसार है और इस तरह किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। लिहाजा पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज किया जाता है। पीठ ने समीक्षा याचिकाओं को खुली अदालत में सूचीबद्ध करने के लिए आवेदन को भी खारिज कर दिया। इस मामले से संबंधित याचिकाओं के एक समूह पर न्यायाधीशों के चैंबर में विचार किया गया।
सुप्रीम कोर्ट के नियमों के अनुसार, समीक्षा याचिकाओं पर न्यायाधीशों की ओर से दस्तावेज के प्रसार और वकील की मौजूदगी के बिना चैंबर में विचार किया जाता है। शीर्ष अदालत ने पहले समीक्षा याचिकाओं पर खुली अदालत में सुनवाई की अनुमति देने से इन्कार कर दिया था। मौजूदा सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना की ओर से 10 जुलाई, 2024 को समीक्षा याचिकाओं की सुनवाई से खुद को अलग करने के बाद नई पीठ का गठन किया गया था।
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पांच जजों में चार जज हो चुके हैं सेवानिवृत्त
जस्टिस पीएस नरसिम्हा पांच न्यायाधीशों वाली मूल संविधान पीठ के एकमात्र सदस्य थे क्योंकि पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एसके कौल, रवींद्र भट और हिमा कोहली सेवानिवृत्त हो चुके हैं। तत्कालीन सीजेआई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने 17 अक्तूबर, 2024 को समलैंगिक विवाहों को कानूनी समर्थन देने से इन्कार कर दिया था। हालांकि, शीर्ष अदालत ने एलजीबीटीक्यूआईए व्यक्तियों के अधिकारों के लिए पुरजोर वकालत की थी ताकि उन्हें दूसरों के लिए उपलब्ध वस्तुओं और सेवाओं तक पहुंचने में भेदभाव का सामना न करना पड़े।
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'मत कानून के अनुसार, हस्तक्षेप की जरूरत नहीं'
चैंबर कार्यवाही के बाद दिए गए अपने आदेश में पीठ ने कहा कि हमने एस रवींद्र भट (पूर्व न्यायाधीश) के खुद और जस्टिस हिमा कोहली (पूर्व न्यायाधीश) के लिए दिए गए फैसलों और हममें से एक (जस्टिस नरसिम्हा) की ओर से दी गई सहमति वाली राय को ध्यान से पढ़ा है। यह बहुमत का मत था। पीठ ने कहा कि दोनों फैसलों में दिया गया मत कानून के अनुसार है और इस तरह किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। लिहाजा पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज किया जाता है। पीठ ने समीक्षा याचिकाओं को खुली अदालत में सूचीबद्ध करने के लिए आवेदन को भी खारिज कर दिया। इस मामले से संबंधित याचिकाओं के एक समूह पर न्यायाधीशों के चैंबर में विचार किया गया।
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सुप्रीम कोर्ट के नियमों के अनुसार, समीक्षा याचिकाओं पर न्यायाधीशों की ओर से दस्तावेज के प्रसार और वकील की मौजूदगी के बिना चैंबर में विचार किया जाता है। शीर्ष अदालत ने पहले समीक्षा याचिकाओं पर खुली अदालत में सुनवाई की अनुमति देने से इन्कार कर दिया था। मौजूदा सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना की ओर से 10 जुलाई, 2024 को समीक्षा याचिकाओं की सुनवाई से खुद को अलग करने के बाद नई पीठ का गठन किया गया था।
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पांच जजों में चार जज हो चुके हैं सेवानिवृत्त
जस्टिस पीएस नरसिम्हा पांच न्यायाधीशों वाली मूल संविधान पीठ के एकमात्र सदस्य थे क्योंकि पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एसके कौल, रवींद्र भट और हिमा कोहली सेवानिवृत्त हो चुके हैं। तत्कालीन सीजेआई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने 17 अक्तूबर, 2024 को समलैंगिक विवाहों को कानूनी समर्थन देने से इन्कार कर दिया था। हालांकि, शीर्ष अदालत ने एलजीबीटीक्यूआईए व्यक्तियों के अधिकारों के लिए पुरजोर वकालत की थी ताकि उन्हें दूसरों के लिए उपलब्ध वस्तुओं और सेवाओं तक पहुंचने में भेदभाव का सामना न करना पड़े।