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SC: सुप्रीम कोर्ट ने महिला की दहेज उत्पीड़न की याचिका को किया रद्द, कहा- वह 'प्रतिशोध' लेना चाहती थी
Sat, 02 Sep 2023 01:05 PM IST
देव कश्यप
पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: देव कश्यप
Updated Sat, 02 Sep 2023 01:05 PM IST
सार
शीर्ष अदालत ने कहा, वह स्पष्ट रूप से अपने ससुराल वालों के खिलाफ प्रतिशोध लेना चाहती थी... आरोप इतने दूरगामी और असंभव हैं कि कोई भी विवेकशील व्यक्ति यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता कि उनके खिलाफ आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार हैं।
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सुप्रीम कोर्ट।
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला द्वारा अपने ससुराल वालों के खिलाफ दायर दहेज उत्पीड़न के मामले को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह "स्पष्ट रूप से प्रतिशोध लेना चाहती थी" और आपराधिक कार्यवाही जारी रखने की अनुमति देने से स्पष्ट रूप से अन्याय होगा। न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि तथ्यों और परिस्थितियों की समग्रता को देखते हुए यह सुविचारित राय है कि अपने ससुराल वालों के खिलाफ महिला के आरोप पूरी तरह से असंतोषजनक हैं और प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि उनके खिलाफ कोई मामला नहीं बनता है।
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शीर्ष अदालत ने कहा, वह स्पष्ट रूप से अपने ससुराल वालों के खिलाफ प्रतिशोध लेना चाहती थी... आरोप इतने दूरगामी और असंभव हैं कि कोई भी विवेकशील व्यक्ति यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता कि उनके खिलाफ आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार हैं... ऐसी स्थिति में अपीलकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति देने से स्पष्ट और प्रत्यक्ष रूप से अन्याय होगा।
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शीर्ष अदालत का यह फैसला मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के एक आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर आया है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने महिला के देवरों और सास के खिलाफ कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया था। महिला पेशे से शिक्षिका है और उसकी शादी वर्ष 2007 में हुई थी। हालांकि, पति ने अपनी शादी को खत्म करते हुए तलाक की डिक्री हासिल कर ली है। पति द्वारा तलाक की याचिका दायर करने से पहले महिला ने पुलिस को एक लिखित शिकायत दी थी, जिसमें उसने अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ कई आरोप लगाए थे।
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शिकायत के जवाब में पुलिस ने उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए (किसी महिला के पति या पति के रिश्तेदार द्वारा उसके साथ क्रूरता करना) और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा तीन और चार के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि महिला द्वारा लगाए गए आरोप ज्यादातर सामान्य और सर्वव्यापी प्रकृति के हैं, बिना इस बात का कोई विशेष विवरण दिए कि उसके देवर और सास ने कब और कैसे, जो अलग-अलग शहरों में रहते थे, दहेज के लिए उसे प्रताड़ित करते थे।
शीर्ष अदालत ने कहा कि महिला के मामले में सबसे नुकसानदायक तथ्य यह है कि उसने फरवरी 2009 में अपना वैवाहिक घर छोड़ने के बाद कुछ भी नहीं किया और अपने पति द्वारा तलाक की कार्यवाही शुरू करने से ठीक पहले साल 2013 में दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज की।