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दंगाइयों को सजा मिले, लेकिन उनके पोस्टर लगाने का कोई कानून नहीं : सुप्रीम कोर्ट

Fri, 13 Mar 2020 02:07 AM IST
गौरव पाण्डेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गौरव पाण्डेय Updated Fri, 13 Mar 2020 02:07 AM IST
सार

जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने साफ तौर पर कहा, बेशक दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए और उन्हें दंडित भी किया जाना चाहिए। मगर, ऐसा कोई कानून नहीं है, जो सड़क के किनारे उपद्रवियों के पोस्टर लगाने को सही ठहरा सके।

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Supreme Court on Poster case in Lucknow, Rioters must be punished but no law to put up their posters

विस्तार

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन के दौरान लखनऊ में हिंसा और उपद्रव करने वालों की सुप्रीम कोर्ट ने जमकर खबर ली है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सड़कों के किनारे उपद्रवियों के पोस्टर फौरन हटाने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार भी कर दिया। जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने साफ तौर पर कहा, बेशक दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए और उन्हें दंडित भी किया जाना चाहिए। मगर, ऐसा कोई कानून नहीं है, जो सड़क के किनारे उपद्रवियों के पोस्टर लगाने को सही ठहरा सके। अवकाशकालीन पीठ ने इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को इस मामले को तत्काल मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे के सामने रखने को कहा, ताकि कम से कम तीन सदस्यीय पीठ का गठन किया जा सके, जो अगले हफ्ते इस मामले को सुन सके।

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यूपी सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने इस विवाद को गंभीर मानते हुए कहा कि इस मसले पर बड़ी पीठ द्वारा परीक्षण करने की दरकार है। मामले में अपेक्षाकृत विस्तृत व्याख्या और विचार की जरूरत भी बताई। यूपी सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, यह मामला बेहद महत्वपूर्ण है। इस पर पीठ ने मेहता से पूछा कि क्या राज्य सरकार के पास पोस्टर लगाने की ऐसी कोई शक्ति है? जस्टिस ललित की पीठ ने कहा, हिंसा और तोड़फोड़ की निंदा हो, मगर क्या अपराधियों को बार-बार पीड़ित किया जाना चाहिए? आरोपियों के लिए भुगतान करने का समय अभी भी बाकी था और वसूली की कार्रवाई को चुनौती देने वाली उनकी याचिकाएं लंबित हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने जिन लोगों की तस्वीरें बैनरों पर हैं, उन्हें मामले में पक्षकार बनने की मंजूरी भी दे दी।

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हाईकोर्ट ने मूल मसले को ‘घालमेल’ कर दिया : यूपी सरकार

पीठ के समक्ष मेहता ने कहा, असामाजिक तत्वों व उनकी हरकतों को निजता के अधिकार के तहत संरक्षण प्रदान नहीं किया जा सकता। मेहता ने कहा कि हाईकोर्ट की खंडपीठ ने निजता के अधिकार पर जोर दिया लेकिन मूल मसले को ‘घालमेल’ कर दिया।

उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पोस्टर लगाने की राज्य की कार्रवाई को अत्यधिक अन्यायपूर्ण करार देते हुए इसे निजता का उल्लंघन माना था। हाईकोर्ट ने पोस्टर को फौरन हटाने का आदेश देते हुए जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस आयुक्त को 16 मार्च तक हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का भी निर्देश दिया था।

मेहता बोले, सबक सिखाने के लिए लगाए गए पोस्टर

यूपी सरकार की ओर से दलील रखते हुए तुषार मेहता ने कहा, निजता के अधिकार के कई आयाम होते हैं। पोस्टर हटाने के हाईकोर्ट के फैसले में खामियां हैं। ये लोग प्रदर्शन के दौरान हिंसा में शामिल थे। सरकार के पास ऐसी कार्रवाई करने की शक्ति है। दंगाइयों के पोस्टर सबक सिखाने के लिए लगाए गए, ताकि भविष्य में लोग इस तरह की असामाजिक गतिविधियों में शामिल होने से डरें।

उन्होंने कहा कि लोगों का पोस्टर में नाम यूं ही नहीं आया है। नोटिस के बाद नाम आया है। मनमाने तरीके से पोस्टर में नाम नहीं आया है। ये बैनर इसलिए लगाए गए थे क्योंकि स्थगन प्राधिकरण ने 95 लोगों को सुना था और पाया कि 57 लोग दंगे के लिए जिम्मेदार थे। उन्होंने कहा कि इन 57 लोगों में विभिन्न समुदायों के दंगाई शामिल हैं।

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दंगों में खुलेआम बंदूक लहरा रहे हैं तो निजता के अधिकार का दावा नहीं

पीठ ने कहा, सरकार कानून के बाहर जाकर काम नहीं कर सकती। उसने पूछा कि क्या यूपी सरकार को ऐसे पोस्टर लगाने का अधिकार है। अब तक ऐसा कोई कानून नहीं है, जो सरकार की इस कार्रवाई का समर्थन करता हो। तब मेहता ने दलील दी कि प्रदर्शनकारी खुले में सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान कर रहे हैं। मीडिया ने उनके वीडियो बनाए। सबने वीडियो देखा। ऐसे में यह दावा नहीं कर सकते कि पोस्टर लगने से उनकी निजता के अधिकार का उल्लंघन हुआ है।

निजता के कई आयाम होते हैं। अगर आप दंगों में खुलेआम बंदूक लहरा रहे हैं और चला रहे हैं तो आप निजता के अधिकार का दावा नहीं कर सकते। उन्होंने दलील दी कि पुट्टास्वामी मामले में दिए गए फैसले के अनुसार, किसी व्यक्ति का नाम सार्वजनिक डोमेन में होना निजता के अधिकार का उल्लंघन है। अगर किसी व्यक्ति को सार्वजनिक स्थानों पर हिंसक गतिविधियों में लिप्त होते हुए वीडियोग्राफ किया गया हो तो वह निजता के अधिकार के संरक्षण का दावा नहीं कर सकता।

बचाव पक्ष बोला, सरकार की कार्रवाई में लिंचिंग की अपील

बैनर में प्रकाशित पूर्व आईपीएस अधिकारी एसआर दारापुरी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील डॉ अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, सरकार की कार्रवाई में लिंचिंग की अपील नजर आती है। बच्चों के दुष्कर्मी और गंभीर अपराधियों के नाम भी प्रकाशित नहीं किए जाते। उन्होंने यह भी कहा कि नुकसान की वसूली का मुद्दा अभी भी कानूनन विचाराधीन था। वहीं, एक और याचिकाकर्ता वकील मोहम्मद शोएब की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस ने कहा कि उनके मुवक्किल पर अल्पसंख्यकों के मुद्दे उठाने के लिए अतीत में कई बार हमले हो चुके हैं। ऐसे में बैनर में उनके नाम और पते के प्रकाशन के बाद उन पर हमला हो सकता है।

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