{"_id":"6992d1116cf21e575801f5d0","slug":"supreme-court-monday-16-feb-hearing-kuldeep-sengar-sonam-wangchuk-data-protection-law-sc-updates-today-news-2026-02-16","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"Supreme Court: डेटा संरक्षण कानून 2023 पर सरकार से जवाब तलब; कुलदीप सेंगर-सोनम वांगचुक मामले पर भी सुनवाई","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Supreme Court: डेटा संरक्षण कानून 2023 पर सरकार से जवाब तलब; कुलदीप सेंगर-सोनम वांगचुक मामले पर भी सुनवाई
Mon, 16 Feb 2026 01:41 PM IST
लव गौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: लव गौर
Updated Mon, 16 Feb 2026 01:41 PM IST
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : पीटीआई
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) अधिनियम, 2023 के कई प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया। पत्रकार नितिन सेठी द्वारा दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि नई डेटा व्यवस्था सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम को गंभीर रूप से कमजोर करती है और केंद्र को व्यक्तिगत डेटा पर 'व्यापक शक्तियां' प्रदान करती है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की पीठ ने अधिनियम की कानूनी जटिलताओं की जांच करने पर सहमति जताते हुए, विवादित प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करते हुए अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने कहा कि निजता की रक्षा करने के अपने प्रयास में अधिनियम में सटीक कार्यप्रणाली का अभाव है।
वरिष्ठ वकील ने कहा, 'छेनी का इस्तेमाल करने के बजाय, (विधानमंडल ने) हथौड़े का इस्तेमाल किया है और इस तरह (आरटीआई को) करारा प्रहार किया है। याचिका में कहा गया है कि डीपीडीपी अधिनियम व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण पर पूर्णतः रोक लगाता है, जिससे आरटीआई अधिनियम द्वारा स्थापित पारदर्शिता ढांचा प्रभावी रूप से समाप्त हो जाता है।
विज्ञापन
इन दो मामलों पर होगी सुनवाई
वहीं सुप्रीम कोर्ट में उन्नाव दुष्कर्म मामले में कुलदीप सेंगर के खिलाफ सीबीआई की अर्जी पर सुनवाई करेगा। इसी के साथ क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की हिरासत को चुनौती देने वाली अर्जी पर भी शीर्ष अदालत सुनवाई करेगी।
विज्ञापन
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की पीठ ने अधिनियम की कानूनी जटिलताओं की जांच करने पर सहमति जताते हुए, विवादित प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करते हुए अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने कहा कि निजता की रक्षा करने के अपने प्रयास में अधिनियम में सटीक कार्यप्रणाली का अभाव है।
विज्ञापन
वरिष्ठ वकील ने कहा, 'छेनी का इस्तेमाल करने के बजाय, (विधानमंडल ने) हथौड़े का इस्तेमाल किया है और इस तरह (आरटीआई को) करारा प्रहार किया है। याचिका में कहा गया है कि डीपीडीपी अधिनियम व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण पर पूर्णतः रोक लगाता है, जिससे आरटीआई अधिनियम द्वारा स्थापित पारदर्शिता ढांचा प्रभावी रूप से समाप्त हो जाता है।
विज्ञापन
इन दो मामलों पर होगी सुनवाई
वहीं सुप्रीम कोर्ट में उन्नाव दुष्कर्म मामले में कुलदीप सेंगर के खिलाफ सीबीआई की अर्जी पर सुनवाई करेगा। इसी के साथ क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की हिरासत को चुनौती देने वाली अर्जी पर भी शीर्ष अदालत सुनवाई करेगी।
ग्रामीण विवाद निपटान पहल: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ ने नई योजना शुरू की
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस विक्रम नाथ ने ग्रामीण क्षेत्रों में मुकदमे कम करने और स्थानीय स्तर पर विवाद सुलझाने के लिए एक नई पहल की शुरुआत की। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की इस परियोजना का मकसद गांवों में आपसी समझ से विवाद निपटान को बढ़ावा देना है। कम्युनिटी मेडिएशन: टुवर्ड्स लिटिगेशन-फ्री रूरल इंडिया” नाम की यह परियोजना उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और बागपत जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सहयोग से शुरू की गई। जस्टिस नाथ ने कहा कि कई पारिवारिक, जमीन और पड़ोस से जुड़े विवाद अदालत के बजाय बातचीत से सुलझाए जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि इस पहल का लक्ष्य सामाजिक सौहार्द बढ़ाना और अदालतों पर बोझ कम करना है। शुरुआत में बागपत जिले के छह गांवों को पायलट परियोजना के लिए चुना गया है। इस योजना के तहत स्थानीय लोगों जैसे सेवानिवृत्त शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ नागरिकों को मध्यस्थता का प्रशिक्षण दिया जाएगा। ये प्रशिक्षित लोग समुदाय और औपचारिक न्याय व्यवस्था के बीच सेतु का काम करेंगे। नालसा संविधान के अनुच्छेद 39ए के तहत न्याय तक समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए बना वैधानिक निकाय है।
छत्तीसगढ़ होर्डिंग विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के कुछ गांवों में पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश पर रोक से जुड़े होर्डिंग्स के मामले में दायर याचिका खारिज कर दी। यह याचिका हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए दाखिल की गई थी। हाईकोर्ट ने पहले ऐसे होर्डिंग्स हटाने की मांग वाली याचिकाओं का निपटारा करते हुए कहा था कि जबरन या प्रलोभन देकर धर्मांतरण रोकने के लिए लगाए गए होर्डिंग्स को असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता। इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने की। याचिकाकर्ता की ओर से वकील ने पादरियों पर हमलों से जुड़े लंबित मामले का भी हवाला दिया। सॉलिसिटर जनरल ने अदालत से कहा कि हाईकोर्ट में दायर याचिका सीमित मुद्दे पर थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में नए तथ्य और दस्तावेज जोड़े गए हैं। दोनों पक्षों को सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने याचिका खारिज कर दी।
राजस्थान सरकार को राहत: सुप्रीम कोर्ट ने वसूली कार्रवाई पर लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने ठेकेदार को रकम वापस न करने के मामले में राजस्थान सरकार के खिलाफ चल रही वसूली कार्रवाई पर रोक लगा दी है। अदालत ने राज्य सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम राहत दी। जस्टिस एमएम सुंदरश की अध्यक्षता वाली पीठ ने ठेकेदार को नोटिस जारी किया और रिकवरी की प्रक्रिया फिलहाल रोक दी। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अपील दाखिल करने में देरी माफ करने की अर्जी खारिज कर दी गई थी। मामला सड़क निर्माण अनुबंध से जुड़ा है। कोटा की वाणिज्यिक अदालत ने ठेकेदार को 6.35 लाख रुपये लौटाने का आदेश दिया था। राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ देरी से अपील दायर की थी। याचिका में कहा गया कि सरकार बदलने और वकीलों की नियुक्ति प्रक्रिया के कारण 259 दिन की देरी हुई। इस बीच निचली अदालत ने सरकारी संपत्तियों की कुर्की के वारंट जारी कर दिए थे और कुछ चल संपत्तियां जब्त भी कर ली गई थीं। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश से फिलहाल वसूली पर रोक रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस विक्रम नाथ ने ग्रामीण क्षेत्रों में मुकदमे कम करने और स्थानीय स्तर पर विवाद सुलझाने के लिए एक नई पहल की शुरुआत की। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की इस परियोजना का मकसद गांवों में आपसी समझ से विवाद निपटान को बढ़ावा देना है। कम्युनिटी मेडिएशन: टुवर्ड्स लिटिगेशन-फ्री रूरल इंडिया” नाम की यह परियोजना उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और बागपत जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सहयोग से शुरू की गई। जस्टिस नाथ ने कहा कि कई पारिवारिक, जमीन और पड़ोस से जुड़े विवाद अदालत के बजाय बातचीत से सुलझाए जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि इस पहल का लक्ष्य सामाजिक सौहार्द बढ़ाना और अदालतों पर बोझ कम करना है। शुरुआत में बागपत जिले के छह गांवों को पायलट परियोजना के लिए चुना गया है। इस योजना के तहत स्थानीय लोगों जैसे सेवानिवृत्त शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ नागरिकों को मध्यस्थता का प्रशिक्षण दिया जाएगा। ये प्रशिक्षित लोग समुदाय और औपचारिक न्याय व्यवस्था के बीच सेतु का काम करेंगे। नालसा संविधान के अनुच्छेद 39ए के तहत न्याय तक समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए बना वैधानिक निकाय है।
छत्तीसगढ़ होर्डिंग विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के कुछ गांवों में पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश पर रोक से जुड़े होर्डिंग्स के मामले में दायर याचिका खारिज कर दी। यह याचिका हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए दाखिल की गई थी। हाईकोर्ट ने पहले ऐसे होर्डिंग्स हटाने की मांग वाली याचिकाओं का निपटारा करते हुए कहा था कि जबरन या प्रलोभन देकर धर्मांतरण रोकने के लिए लगाए गए होर्डिंग्स को असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता। इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने की। याचिकाकर्ता की ओर से वकील ने पादरियों पर हमलों से जुड़े लंबित मामले का भी हवाला दिया। सॉलिसिटर जनरल ने अदालत से कहा कि हाईकोर्ट में दायर याचिका सीमित मुद्दे पर थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में नए तथ्य और दस्तावेज जोड़े गए हैं। दोनों पक्षों को सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने याचिका खारिज कर दी।
राजस्थान सरकार को राहत: सुप्रीम कोर्ट ने वसूली कार्रवाई पर लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने ठेकेदार को रकम वापस न करने के मामले में राजस्थान सरकार के खिलाफ चल रही वसूली कार्रवाई पर रोक लगा दी है। अदालत ने राज्य सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम राहत दी। जस्टिस एमएम सुंदरश की अध्यक्षता वाली पीठ ने ठेकेदार को नोटिस जारी किया और रिकवरी की प्रक्रिया फिलहाल रोक दी। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अपील दाखिल करने में देरी माफ करने की अर्जी खारिज कर दी गई थी। मामला सड़क निर्माण अनुबंध से जुड़ा है। कोटा की वाणिज्यिक अदालत ने ठेकेदार को 6.35 लाख रुपये लौटाने का आदेश दिया था। राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ देरी से अपील दायर की थी। याचिका में कहा गया कि सरकार बदलने और वकीलों की नियुक्ति प्रक्रिया के कारण 259 दिन की देरी हुई। इस बीच निचली अदालत ने सरकारी संपत्तियों की कुर्की के वारंट जारी कर दिए थे और कुछ चल संपत्तियां जब्त भी कर ली गई थीं। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश से फिलहाल वसूली पर रोक रहेगी।