आर्टिफिशियल सुपरइंटेलिजेंस: एआई की अगली पीढ़ी कितनी खतरनाक होगी? जानिए एजीआई से एएसआई तक की पूरी कहानी
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब सिर्फ साइंस फिक्शन की कहानी नहीं रह गया है। सवाल यह है कि अगर एआई इंसानों से भी ज्यादा बुद्धिमान हो गया, तो दुनिया कितनी बदल जाएगी?
विस्तार
एआई को लेकर जो साइंस फिक्शन फिल्मों में दिखाया जाता था। वह अब हकीकत में होता हुआ दिख रहा है। कुछ दिनों पहले सामने आई एक घटना ने इस डर को और गहरा करने का काम किया है। कुछ दिनों पहले की बात है एक खास तरह के साइबर सिक्योरिटी टेस्ट में 1,200 से ज्यादा एआई एजेंट्स को एक बंद सिस्टम में काम करने के लिए छोड़ा गया था। उन्हें आपस में सीधे बातचीत की कोई इजाजत नहीं थी।
हालांकि, इस दौरान 1200 से अधिक एजेंट्स ने मिलकर एक मैसेज बोर्ड बनाया। इस दौरान एक एजेंट ने खुद को फेजवन10841 नाम दिया और अपने आपको लीडर बना लिया। इसके बाद उसने बाकी एजेंट्स को छोटी-छोटी टीमों में बांटकर अलग-अलग काम देने लगा। देखते ही देखते एजेंट्स के बीच करीब 70 हजार से ज्यादा संदेशों का आदान-प्रदान हुआ। इसके बाद करीब 700 एजेंट्स ने मिलकर एआई प्लेटफॉर्म हगिंग फेस के सिस्टम पर हमला कर दिया।
यह घटना इसलिए अहम है क्योंकि सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि एआई कितना स्मार्ट हो सकता है, बल्कि यह भी है कि अगर एआई को इससे कहीं ज्यादा क्षमता मिल गई तो क्या होगा? आज के एआई सिस्टम अभी इंसानों की तरह सामान्य तरीके से नहीं सोचते। हालांकि, जिस दिशा में एआई की क्षमताएं बढ़ रही हैं उसने वैज्ञानिकों और एआई विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। इसी वजह से अब चर्चा सिर्फ मौजूदा एआई की नहीं बल्कि आर्टिफिशयल जनरल इंटेलिजेंस (AGI) और उससे आगे आने वाली सुपरइंटेलिजेंस की भी हो रही है।
गूगल डीपमाइंड के प्रमुख डेमिस हसाबिस की मानें तो 2030 तक आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस आ सकता है। यह नई तकनीक इंसानों की तरह सोच सकेगी, खुद सीखेगी और फैसले लेगी। हालांकि, आर्टिफिशियल सुपर इंटेलिजेंस और आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस क्या है और यह आज के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से कैसे अलग हैं? इस बारे में जानने से पहले आपको इन तीनों के बीच का अंतर समझना होगा।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्या है?
आज हम जिस एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं, उसे आसान भाषा में ऐसी मशीन समझिए जो कुछ काम इंसानों की तरह करने की कोशिश करती है। यह बड़ी मात्रा में जानकारी देखकर पैटर्न समझ सकती है और उसके आधार पर जवाब या नतीजा देती है। उदाहरण के तौर पर चैटजीपीटी से सवाल पूछना, मोबाइल में आवाज से कमांड देना, किसी फोटो में चेहरा पहचानना या यूट्यूब पर आपकी पसंद के वीडियो सुझाना। हालांकि, मौजूदा एआई की एक सीमा है उसे जिस तरह के काम के लिए बनाया और प्रशिक्षित किया जाता है। वह मुख्य रूप से उसी दायरे में अच्छा प्रदर्शन करता है। एआई स्मार्ट है हालांकि, इंसान की तरह हर तरह की चीजों को समझने वाला दिमाग अभी इसके पास नहीं है।
आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस क्या है?
आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस एआई का वह अगला स्तर है, जहां मशीन सिर्फ एक दो काम करने तक सीमित नहीं रहेगी। यह इंसान की तरह अलग-अलग तरह के बौद्धिक काम को समझ सकेगी। नई चीजें सीख सकती है और सीखी हुई जानकारी को दूसरी परिस्थितियों में भी इस्तेमाल कर सकती है। अगर इसने किसी विषय में समस्या हल करना सीखा है तो वह उसी समझ का इस्तेमाल किसी बिल्कुल नए क्षेत्र की समस्या में भी कर सकती है। एजीआई में दुनिया की सामान्य जानकारी तर्क करने और परिस्थितियों के हिसाब से फैसला लेने की क्षमता होगी। इस कारण इसे हर नए काम के लिए अलग से तैयार करने की जररत नहीं होगी। फिलहाल आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस अस्तित्व में नहीं आया है।
आर्टिफिशियल सुपर इंटेलिजेंस क्या है?
आर्टिफिशियल सुपर इंटेलिजेंस की कल्पना एजीआई से भी आगे की जाती है। एएसआई वह चरण है जो बौद्धिक क्षमता के मामले में इंसानों से बहुत आगे निकल जाएगा। वह बेहद जटिल समस्याओं को इंसानों से तेजी से समझ सकता है, नई वैज्ञानिक खोजों में मदद कर सकता है और ऐसी खोज और इनोवेशन कर सकता है, जिनके बारे में इंसान सोच तक नहीं सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसा एआई अगर खुद को लगातार बेहतर बनाने में सक्षम हुआ, तो उसकी क्षमता बहुत तेजी से बढ़ सकती है। गौर करने वाली बात है कि आर्टिफिशियल सुपरइंटेलिजेंस भविष्य की संभावित अवधारणा है।
कब तक आ सकता है आर्टिफिशियल सुपरइंटेलिजेंस?
कई टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि सबसे पहले 2030 से 2035 के बीच एजीआई (मानव जैसी बुद्धिमत्ता) आ सकता है। इसके बाद एजीआई खुद को विकसित करके आर्टिफिशियल सुपरइंटेलिजेंस बन सकता है।सैम अल्टमैन के मुताबिक सुपरइंटेलिजेंस एआई इंसान की बुद्धिमत्ता से कहीं आगे जाने वाली तकनीक साबित हो सकती है। अल्टमैन का मानना है कि सुपरइंटेलिजेंस आने में शायद कुछ हजार दिन लगेंगे। हालांकि, इसमें इससे ज्यादा समय भी लग सकता है। उनके मुताबिक एक बार जब एआई इंसानों से कहीं ज्यादा सक्षम हो जाएगा, तो वह खुद अपने अगले वर्जन के एआई बनाने और विज्ञान में नई खोजों को तेज करने में मदद कर सकता है। जलवायु संकट का समाधान, अंतरिक्ष में इंसानी बस्तियां बसाना और भौतिक विज्ञान की बड़ी-बड़ी अनसुलझी समस्याओं को हल करना सुपरइंटेलिजेंट एआई की मदद से संभव हो सकता है। हालांकि, इसके साथ जोखिम भी होंगे। इसलिए एआई के फायदे बढ़ाने और उसके नुकसान को कम करने के लिए अभी से तैयारी करना जरूरी है।
लोकप्रिय कंप्यूटर वैज्ञानिक बेन गोएर्टजेल (फाउंडर सिंगुलैरिटी एनईटी) दावा करते हैं कि 2027 से 2030 के बीच सुपरइंटेलिजेंट एआई आ सकता है। उनका कहना है कि आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस बनने के बाद यह मानव सभ्यता के पूरे ज्ञान को चंद पलों में जानकर सीधे सुपरइंटेलिजेंस में बदल सकता है।
मशहूर कंप्यूटर वैज्ञानिक रे कर्जवील का अनुमान है कि 2029 तक एआई इंसानों जितना बुद्धिमान हो सकता है। उनके मुताबिक आगे चलकर इंसान और मशीन की बुद्धिमत्ता एक-दूसरे से जुड़ सकती है। इससे इंसानी दिमाग की क्षमता बढ़ेगी और हम आज के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से सोच और सीख सकेंगे।
एआई के क्षेत्र से जुड़े एक और बड़े वैज्ञानिक योशुआ बेंगियो को इंसानों से ज्यादा बुद्धिमान एआई की चिंता सताती है। उन्हें इस बात का डर है कि कहीं हम ऐसी मशीनें न बना दें, जिन्हें बाद में इंसान नियंत्रित ही न कर पाएं। उनका मानना है कि इंसान ऐसी तकनीक तैयार कर रहा है, जिसकी ताकत आगे चलकर खुद इंसानों से भी ज्यादा हो सकती है।
आर्टिफिशियल सुपरइंटेलिजेंस क्या कुछ कर सकता है?
इल्या सुतस्केवर जो कि ओपनएआई कंपनी के पूर्व चीफ साइंटिस्ट और संस्थापक सदस्यों में थे। उनका मानना है कि सुपरइंटेलिजेंस केवल सॉफ्टवेयर भर नहीं होगा। यह एक नई बुद्धिमान प्रजाति की तरह होगा। कई टेक एक्सपर्ट का मानना है कि आर्टिफिशियल सुपर इंटेलिजेंस इंसानों से हजारों गुना अधिक स्मार्ट होगा। एआई का यह विकसित स्वरूप क्या कुछ करने में सक्षम होगा उसके बारे में हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में दुनिया एक टेक्नोलॉजिकल सिंगुलैरिटी में जा सकती है।सैम अल्टमैन के मुताबिक अगर इसका अनियंत्रित विकास किया गया तो यह मानवता के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हो सकती है। वहीं अगर इसे सुरक्षित ढंग से विकसित किया गया तो इससे अकल्पनीय समृद्धि का युग आ सकता है। हसाबिस भी कुछ-कुछ ऐसा ही कहते हैं, उनके मुताबिक सुपरइंटेलिजेंस इंसानों का दुश्मन बनने के बजाय विज्ञान का सबसे बड़ा औजार बन सकता है। ये इंसानी वैज्ञानिकों के साथ मिलकर नई खोजें करेगा।