सीमांचल में उद्योग बना शराब तस्करी, तीन गुना दाम चुकाने पर होम डिलीवरी

सीमांचल से हिमांशु मिश्र Updated Thu, 29 Oct 2020 06:43 AM IST
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जेब में पैसे हैं तो होम डिलीवरी की भी सुविधा। बस कीमत बाजार मूल्य से तीन से चार गुना चुकानी होगी। साल 2016 में शराब बंदी के बाद बिहार और खासतौर से सीमांचल में यही स्थिति है। आपको बस एक फोन करने की जरूरत है। कुछ ही मिनटों में शराब आपके घर तक पहुंचा दी जाएगी।  पश्चिम बंगाल से जुड़े सीमांचल में युवाओं का एक बड़ा वर्ग शराब तस्करी के धंधे से जुड़ गया है।
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पांच वर्ष पूर्व 5 अप्रैल 2016 को पूर्ण शराब बंदी के बाद कुछ महीने तक इसका व्यापक असर देखा गया। महिलाओं के खिलाफ अपराध में चार फीसदी की कमी आई, मगर इसके बाद धीरे-धीरे स्थिति पहले की तरह हो गई। अंतर बस इतना आया कि शराब की सरकारी दुकानें तो बंद हो गईं, मगर शराब की खपत और बिक्री में कोई कमी नहीं आई। सीमांचल में उसी की शराब तक पहुंच नहीं हैं, जिनकी जेब में पैसे नहीं हैं। जिनकी जेब में पैसे हैं, उनके लिए शराब हासिल करना पहले की तुलना में ज्यादा आसान है।


शराबबंदी कहने भर को
कटिहार जिले के तेलता रेलवे स्टेशन पर दवा की दुकान चलाने वाले मोहम्मद इश्तियाक कहते हैं शराबबंदी बस कहने भर के लिए है। हकीकत यह है कि शराब हासिल करना पहले से ज्यादा आसान है। सभी को पता है कि शराब कहां मिलेगा।

हां, अंतर बस इतना आया है कि पहले लोग शराब पी कर हंगामा करते थे, अब ऐसी घटनाओं में कमी आई है। पूर्णिया जिले के चटांगी पंचायत के पूर्व मुखिया तौकीर हसन कहते हैं शराब बंदी बस दिखावा है। सरकार हर साल चार हजार करोड़ के राजस्व का नुकसान झेलती है। शु

बढ़ते मामले भी बता रहे हैं हकीकत
पूर्ण शराब बंदी के लिए बिहार सरकार ने कठोर कानून बनाए हैं। इसके तहत शराब निर्माण, तस्करी और सेवन के लिए 50000 रुपये जुर्माना और दस साल तक की सजा का प्रावधान है। शराब सेवन से मौत के मामले में तस्करी से जुड़े लोगों को फांसी की सजा का भी प्रावधान है।

इसके बावजूद राज्य में इससे जुड़े दो लाख से अधिक मामले अदालत में लंबित हैं। बीते पांच साल में तीन लाख लोग शराब सेवन, तस्करी जैसे मामले में गिरफ्तार हुए हैं।

विपक्ष और सरकार में वार पलटवार
शराबबंदी इस बार चुनाव में बड़ा मुदï्दा है। राजद की अगुवाई वाले विपक्षी महागठबंधन के साथ ही अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि शराबबंदी महज कागजों तक सीमित है। इस फैसले के कारण राज्य में शराब माफिया का उदय हुआ है। युवा वर्ग तेजी से शराब तस्करी से जुड़े हैं।

जबकि जदयू का कहना है कि इससे समाज में बड़ा परिवर्तन आया है। जदयू शराबबंदी को भविष्य में भी जारी रखने का वादा कर रही है।

शराबबंदी एक छलावा है। नीतीश सरकार बिहारियों को तस्कर बनाने पर आमदा है।रोजगार के अभाव में बड़ी संख्या में युवा वर्ग शराब तस्करी से जुड़ गए हैं। इसकारण हजारों परिवार मुकदमों का सामना कर रहे हैं। -चिराग पासवान, अध्यक्ष लोजपा

शराबबंदी कानून से लाखों की संख्या मेंगरीब लोग मुकदमों का सामना कर रहे हैं। पुलिस-प्रशासन की सांठगांठ से पूरे बिहार में शराब तस्करी के धंधे ने अपनेपांव जमा लिए हैं। इस कानून की व्यापक समीक्षा की जरूरत है। सरकार बनी तो हम इससे जुड़े कानून में व्यावहारिक बदलाव लाएंगे। -मदन मोहन झा, अध्यक्ष कांग्रेस

विपक्ष सामाजिक सरोकारों को भूल लोगों को गुमराह करने में जुटा है। खासतौर से कांग्रेस अंबेडकर और महात्मा गांधी की विचारधारा से बहुत दूर चली गई है। नीतीश सरकार ने इन्हीं महापुरुषों की इच्छा का मूर्तरूप दिया है। इससे बिहार में व्यापक सामाजिक बदलाव हुआ है। भविष्य में भी हम शराब बंदी को जारी रखेंगे। -अशोक चौधरी, अध्यक्ष जदयू

लोजपा समेत विपक्षी गठबंधनों ने शराब बंदी को चुनावी मुद्दा बनाया है। राजद की अगुवाई वाले महागठबंधन ने शराबबंदी की समीक्षा करने का वादा किया है। लोजपा प्रमुख चिराग पासवान इस मुद्दे पर बेहद हमलावर हैं। उन्होंने सरकार पर युवाओं को तस्कर बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि रोजगार के अभाव में बड़ी संख्या में युवा शराब तस्करी से जुड़ गए हैं। कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में शराब बंदी की समीक्षा कर निर्णय लेने की बात कही है।

बालगुदर गांव ने किया चुनाव का बहिष्कार
 जिले के बालगुदर गांव के लोगों ने खेल के मैदान में संग्रहालय बनाने के विरोध में मतदान का बहिष्कार किया। गांव की बूथ संख्या 115 पर लोग नदारद थे।

बूथ के पीठासीन अधिकारी मोहम्मद इकरामुल हक ने बताया कि ग्रामीणों ने म्यूजियम बनाने से नाराज होकर मतदान का बहिष्कार किया है। वहीं भाजपा प्रत्याशी और नीतीश कैबिनेट में मंत्री कुमार सिन्हा ने कहा कि सुशासन तो दिख रहा है, लेकिन कहीं-कहीं बहिष्कार का वातावरण बनाना ‘प्रायोजित’ है।

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