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Waqf Law: वक्फ कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर होगी 'सुप्रीम' सुनवाई, तय हुई 16 अप्रैल की तारीख

Thu, 10 Apr 2025 12:48 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Thu, 10 Apr 2025 12:48 PM IST
सार

वक्फ कानून के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट 16 अप्रैल को सुनवाई करेगा। केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल कर रखी है। सरकार की ओर से कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आदेश पारित करने से पहले उसका पक्ष सुनने के लिए कैविएट लगाई है।

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SC bench headed by CJI Sanjiv Khanna will hear on April 16 pleas challenging Waqf Act constitutional validity
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट वक्फ (संशोधन) अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली की पीठ 16 अप्रैल को याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। सीजेआई के अलावा जस्टिस संजय कुमार और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन तीन जजों की उस बेंच का हिस्सा होंगे, जो वक्फ कानून के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई करेगी।

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केंद्र ने मंगलवार को शीर्ष अदालत में कैविएट दायर की थी और मामले में कोई भी आदेश पारित करने से पहले उसका पक्ष सुनने की मांग की थी। कैविएट किसी पक्ष की ओर से उच्च न्यायालयों और शीर्ष अदालत में यह सुनिश्चित करने के लिए दायर की जाती है। इसका अभिप्राय यह होता है कि उसे सुने बिना कोई आदेश पारित न किया जाए।
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10 से अधिक याचिकाएं शीर्ष अदालत में दायर
राजनेताओं और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) और जमीयत उलमा-ए-हिंद सहित 10 से अधिक याचिकाएं शीर्ष अदालत में नए कानून की वैधता को चुनौती देने के लिए दायर की गई थीं। केंद्र सरकार ने मंगलवार को वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को अधिसूचित कर दिया था। इसे पिछले सप्ताह संसद ने पारित किया था।

किस-किस ने लगाई याचिका?
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद महुआ मोइत्रा ने भी वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की वैधता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। संभल से समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने भी हाल ही में इस मुद्दे पर शीर्ष अदालत में याचिका दायर की थी। एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी, आप नेता अमानतुल्लाह खान, एसोसिएशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स, अरशद मदनी, समस्त केरल जमीयतुल उलेमा, अंजुम कादरी, तैय्यब खान सलमानी, मोहम्मद शफी, मोहम्मद फजलुर्रहीम और आरजेडी नेता मनोज कुमार झा, फैयाज अहमद ने भी इस मुद्दे पर शीर्ष अदालत का रुख किया है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी), जमीयत उलमा-ए-हिंद, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) और कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी और मोहम्मद जावेद इस मामले में अन्य प्रमुख याचिकाकर्ता हैं।

वक्फ कानून में संपत्तियों को विशेष दर्जा देने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका
सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर वक्फ कानून, 1995 और वक्फ (संशोधन) कानून, 2025 के प्रावधानों को चुनौती दी गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह कानून गैर-मुस्लिम समुदायों के साथ भेदभाव करते हुए वक्फ संपत्तियों को विशेष दर्जा देता है, जबकि हिंदू ट्रस्ट, मठ, अखाड़ों और अन्य धार्मिक संस्थाओं को ऐसा अधिकार नहीं मिलता।

पारुल खेरा की ओर दायर याचिका में कहा गया है कि वक्फ बोर्ड को किसी भी संपत्ति को वक्फ घोषित करने का गैर-वाजिब अधिकार मिला हुआ है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15 (धर्म के आधार पर भेदभाव निषेध), 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और 300-ए (संपत्ति का अधिकार) का उल्लंघन है। साथ ही, यह अधिनियम धर्मनिरपेक्ष राज्य के सिद्धांत के विपरीत है। याचिका में दावा किया गया कि पिछले 10 वर्षों में वक्फ बोर्ड ने 12 लाख एकड़ से अधिक भूमि पर कब्जा कर उन्हें वक्फ संपत्ति घोषित किया है, जो दिल्ली के कुल क्षेत्रफल (3,66,500 एकड़) से चार गुना ज्यादा है। सच्चर समिति की रिपोर्ट (2006) के मुताबिक, देश में 4.9 लाख पंजीकृत वक्फ संपत्तियां थीं, जो अब बढ़कर 7.85 लाख हो गई हैं।  


वक्फ बोर्ड को अतिक्रमण हटाने के विशेष अधिकार का विरोध
याचिका में वक्फ कानून की धारा 54 और 55 का भी विरोध किया गया, जो वक्फ बोर्ड को अतिक्रमण हटाने का विशेष अधिकार देती है। साथ ही धारा 89 के तहत वक्फ संपत्ति से जुड़े मामलों में केवल दो महीने का नोटिस देना अनिवार्य है, जबकि अन्य धार्मिक संस्थाओं को ऐसी सुविधा नहीं मिलती। याचिका में वक्फ कानून के भेदभावपूर्ण प्रावधानों को रद्द करने और सभी धार्मिक संस्थाओं को समान अधिकार देने की मांग की गई है। 

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राष्ट्रपति ने दी थी मंजूरी
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पांच अप्रैल को वक्फ संशोधन अधिनियम को मंजूरी दी थी। इसे बजट सत्र के दौरान संसद ने पारित किया था। कानून मंत्रालय की अधिसूचना में कहा गया था कि राष्ट्रपति ने दोनों विधेयकों को अपनी मंजूरी दे दी है। चार अप्रैल को राज्यसभा ने विधेयक के पक्ष में 128 और विपक्ष में 95 मतों से इसे पारित किया था, जबकि लोकसभा ने लंबी बहस के बाद तीन अप्रैल को विधेयक को मंजूरी दे दी थी। यहां 288 सांसदों ने इसके पक्ष में और 232 ने इसके विरोध में मतदान किया था।

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