केरल में इस वक्त सदी की सबसे भीषण बाढ़ आई हुई है। इससे पहले साल 1924 में वहां ऐसी तबाही मची थी। आज पूरी दुनिया की निगाह भारत के इस राज्य पर है। सरकार की ओर से भी इस राज्य को 500 करोड़ रुपये की मदद का एलान किया गया है। साथ ही देश के अन्य राज्य और बड़ी हस्तियां भी अपनी ओर से पूरी मदद कर रही हैं। यहां मौत का आंकड़ा 324 पर पहुंच गया है और लाखों लेग बेघर हैं जिन्हें राहत शिविरों में रखा गया है। लेकिन क्या इस तबाही के पीछे की वजह केवल बारिश ही है? ऐसा नहीं है बल्कि और भी कई वजह राज्य में मची इस तबाही के जिम्मेदार हैं।
पहले से कहीं अधिक बारिश
राज्य में आई बाढ़ का मुख्य कारण तो यहां हुई अधिक बारिश है। एक पर्यावरणविद के मुताबिक बाढ़ से सबसे ज्यादा नुकसान उन इलाकों को हुआ है जो इकोलॉजिकली सेंसिटिव जोन में आते हैं। यहीं पर सबसे ज्यादा भूस्खलन भी हुआ है।
अवैध कंस्ट्रक्शन
पर्यावरणविद बताते हैं कि बारिश के अलावा बाढ़ का अन्य कारण अवैध निर्माण भी है। जो कि इन जगहों पर धड़ल्ले से चल रहा था। पिछले कुछ समय से इकोलॉजिकली सेंसिटिव जोन में अवैध निर्माण और अवैध कब्जा जैसी क्रियाएं हो रही थीं।
चैकडैम भी हैं वजह
बाढ़ आने का दूसरा कारण है चैकडैम। केरल की सरकार के पास आज भी ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि राज्य में कितने चैकडैम हैं। राज्य में बारिश और भूस्खलने से लोगों की जान जा रही है। जिन क्षेत्रों में भूस्खलन हो रहा है उन क्षेत्रों की बात करें तो वह ऐसी जगहें हैं जहां निर्माण की इजाजद न होते हुए भी चैकडैम बनाए गए या फिर इमारतें खड़ी की गईं।
कोई नहीं मानता नियम
पर्यावरणविदों का मानना है कि नियमों का पालन सरकार द्वारा भी नहीं किया जा रहा है। वोटबैंक की राजनीति के चलते जिन जगहों पर निर्माण की इजाजद नहीं है वहां भी ये काम हो रहा है। जिसे सरकार भी नहीं रोक रही। इन क्षेत्रों में निर्माण न किया जाए इसके लिए साल 2010 में गाडकिल कमिटी बनाई गई थी। केंद्र सरकार ने स्वंय इस पैनल का गठन किया था।
अवैध निर्माण के चलते इस रिपोर्ट में कहा गया था कि मानवीय हस्तक्षेप के कारण पश्चिमी घाट सिकुड़ रहा है। यह घाट भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर बादलों को तोड़ने में अहम भूमिका निभाता है। 2010 में इस कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इन क्षेत्रों में निर्माण कार्य नहीं होना चाहिए। लेकिन फिर भी सरकारें इसके उलट काम कर रही हैं।