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भ्रष्टाचार मामले में सीबीआई जांच का आदेश: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई कल, पंजाब सरकार ने किया क्या अनुरोध?
Wed, 07 Oct 2026 10:41 PM IST
देवेश त्रिपाठी
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Wed, 07 Oct 2026 10:41 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को पंजाब सरकार की उस याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के सीबीआई जांच के आदेश को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने आम आदमी पार्टी सरकार से जुड़े लोगों पर तबादलों और अनुकूल नीतियों के लिए पैसे लेने जैसे आरोपों की जांच सीबीआई से कराने का निर्देश दिया था।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को पंजाब सरकार की उस याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के एक आदेश पर रोक लगाने की मांग की गई है। हाईकोर्ट ने आम आदमी पार्टी सरकार से जुड़े लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने और दो महीने के भीतर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया गया था।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ इस मामले की सुनवाई कर सकती है। पंजाब सरकार ने सोमवार को हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट ने यह आदेश अधिवक्ता निखिल सराफ की याचिका पर दिया था।
पंजाब सरकार पर लगे क्या आरोप?
याचिका में सरकार से जुड़े लोगों पर तबादलों के लिए पैसे लेने और अनुकूल नीतियां तैयार कराने के लिए धन लिए जाने जैसे आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया था कि प्रवर्तन निदेशालय की ओर से आम आदमी पार्टी सरकार को पत्र भेजे जाने के बावजूद अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। याचिका में इन आरोपों को गंभीर बताते हुए स्वतंत्र जांच की जरूरत बताई गई थी। हाईकोर्ट ने पंजाब पुलिस और राज्य सरकार को मामले से संबंधित सभी दस्तावेज केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंपने का निर्देश भी दिया था।
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पंजाब सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को कई आधारों पर चुनौती दी है। राज्य सरकार का कहना है कि फैसले में धन शोधन निवारण अधिनियम की धारा 66 की उपधारा 2 के तहत साझा की गई जानकारी को ऐसी दिशा के रूप में माना गया है, जिससे प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य हो जाता है। सरकार ने इसे 2022 में विजय मदनलाल चौधरी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विपरीत बताया है।
मान सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को किन आधार पर दी चुनौती?
राज्य सरकार ने अपनी याचिका में कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में अधिकारियों के तबादलों, निविदाओं और नीतिगत फैसलों से संबंधित मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया गया है। सरकार के अनुसार, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत ऐसे लोक सेवकों से जुड़े मामलों की जांच के लिए पहले से आवश्यक मंजूरी का प्रावधान है।
याचिका में यह भी कहा गया कि हाईकोर्ट ने जांच ब्यूरो को एक सेवारत अधिकारी को जांच में शामिल नहीं करने के लिए दोषी ठहराया, जबकि राज्य सरकार के अनुसार ऐसी जांच के लिए आवश्यक मंजूरी के बिना उस अधिकारी से कानूनी रूप से पूछताछ नहीं की जा सकती थी। पंजाब सरकार ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट का फैसला राज्य में केंद्रीय एजेंसी की जांच का रास्ता खोलता है, जबकि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम की धारा 6 के तहत सामान्य सहमति 8 नवंबर 2020 से वापस ली जा चुकी है।
पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से किया क्या अनुरोध?
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट के फैसले में उन असाधारण परिस्थितियों का कोई निष्कर्ष नहीं दिया गया, जिनके आधार पर राज्य की सामान्य सहमति वापस लिए जाने के बावजूद केंद्रीय एजेंसी को जांच की अनुमति दी जा सकती है। सरकार ने यह भी कहा कि जांच ब्यूरो के अक्षम या पक्षपाती होने का कोई निष्कर्ष नहीं दिया गया है।
पंजाब सरकार ने वैकल्पिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि राज्य के जांच ब्यूरो को प्रारंभिक जांच पूरी करने और तय समय के भीतर अदालत के समक्ष कार्रवाई रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया जाए। सरकार ने यह भी मांग की है कि हाईकोर्ट के फैसले में की गई टिप्पणियों का इस्तेमाल किसी एजेंसी या अदालत की ओर से इस याचिका के अंतिम निपटारे तक नहीं किया जाए।
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न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ इस मामले की सुनवाई कर सकती है। पंजाब सरकार ने सोमवार को हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट ने यह आदेश अधिवक्ता निखिल सराफ की याचिका पर दिया था।
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पंजाब सरकार पर लगे क्या आरोप?
याचिका में सरकार से जुड़े लोगों पर तबादलों के लिए पैसे लेने और अनुकूल नीतियां तैयार कराने के लिए धन लिए जाने जैसे आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया था कि प्रवर्तन निदेशालय की ओर से आम आदमी पार्टी सरकार को पत्र भेजे जाने के बावजूद अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। याचिका में इन आरोपों को गंभीर बताते हुए स्वतंत्र जांच की जरूरत बताई गई थी। हाईकोर्ट ने पंजाब पुलिस और राज्य सरकार को मामले से संबंधित सभी दस्तावेज केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंपने का निर्देश भी दिया था।
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पंजाब सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को कई आधारों पर चुनौती दी है। राज्य सरकार का कहना है कि फैसले में धन शोधन निवारण अधिनियम की धारा 66 की उपधारा 2 के तहत साझा की गई जानकारी को ऐसी दिशा के रूप में माना गया है, जिससे प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य हो जाता है। सरकार ने इसे 2022 में विजय मदनलाल चौधरी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विपरीत बताया है।
मान सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को किन आधार पर दी चुनौती?
राज्य सरकार ने अपनी याचिका में कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में अधिकारियों के तबादलों, निविदाओं और नीतिगत फैसलों से संबंधित मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया गया है। सरकार के अनुसार, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत ऐसे लोक सेवकों से जुड़े मामलों की जांच के लिए पहले से आवश्यक मंजूरी का प्रावधान है।
याचिका में यह भी कहा गया कि हाईकोर्ट ने जांच ब्यूरो को एक सेवारत अधिकारी को जांच में शामिल नहीं करने के लिए दोषी ठहराया, जबकि राज्य सरकार के अनुसार ऐसी जांच के लिए आवश्यक मंजूरी के बिना उस अधिकारी से कानूनी रूप से पूछताछ नहीं की जा सकती थी। पंजाब सरकार ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट का फैसला राज्य में केंद्रीय एजेंसी की जांच का रास्ता खोलता है, जबकि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम की धारा 6 के तहत सामान्य सहमति 8 नवंबर 2020 से वापस ली जा चुकी है।
पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से किया क्या अनुरोध?
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट के फैसले में उन असाधारण परिस्थितियों का कोई निष्कर्ष नहीं दिया गया, जिनके आधार पर राज्य की सामान्य सहमति वापस लिए जाने के बावजूद केंद्रीय एजेंसी को जांच की अनुमति दी जा सकती है। सरकार ने यह भी कहा कि जांच ब्यूरो के अक्षम या पक्षपाती होने का कोई निष्कर्ष नहीं दिया गया है।
पंजाब सरकार ने वैकल्पिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि राज्य के जांच ब्यूरो को प्रारंभिक जांच पूरी करने और तय समय के भीतर अदालत के समक्ष कार्रवाई रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया जाए। सरकार ने यह भी मांग की है कि हाईकोर्ट के फैसले में की गई टिप्पणियों का इस्तेमाल किसी एजेंसी या अदालत की ओर से इस याचिका के अंतिम निपटारे तक नहीं किया जाए।