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जीडीपी आंकड़ा: पीएम की आर्थिक सलाहकार परिषद ने खारिज किया सुब्रमण्यन का दावा

Wed, 19 Jun 2019 10:13 PM IST
Gaurav Pandey न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Gaurav Pandey Updated Wed, 19 Jun 2019 10:13 PM IST
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PMEAC rejects Arvind Subramanian's claim to raise GDP figures
पूर्व मुख्य वित्तीय सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (पीएमईएसी) ने देश में साल 2011 के बाद जीडीपी के आंकड़े को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) अरविंद सुब्रमण्यन के दावे को बुधवार को खारिज कर दिया। पीएमईएसी ने कहा कि पूर्व सीईए का विश्लेषण अपनी सुविधानुसार उच्च आवृत्ति वाले संकेतकों पर आधारित है जबकि उन्होंने सेवा, कृषि और बेहतर कर संग्रह के आंकड़ों को अनदेखा किया है। 

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पीएमईएसी ने सुब्रमण्यन पर यह आरोप भी लगाया कि उन्होंने निजी एजेंसी सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों पर आंख मूंदकर भरोसा किया और सरकारी संस्थान केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) के आंकड़ों पर विश्वास नहीं किया। 
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सुब्रमण्यन के शोध पत्र की बातों का बिंदुवार जवाब देते हुए परिषद ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि एक बड़ी और जिम्मेदार अर्थव्यवस्था के रूप में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुमान का तरीका वैश्विक मानकों के अनुरूप है। इस रिपोर्ट को अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय, रथिन रॉय, सुरजीत भल्ला, चरण सिंह और अरविंद बिरमानी ने मिलकर तैयार किया है।

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सुब्रमण्यन ने शोध पत्र में कहा था कि जीडीपी आकलन के तरीकों में बदलाव के कारण साल 2011-12 और 2016-17 के बीच भारत की आर्थिक वृद्धि दर करीब 2.5 फीसदी अधिक दिखने लगी। पिछले सप्ताह पीएमईएसी ने कहा था कि वह सुब्रमण्यन के शोधपत्र की बातों का बिंदुवार जवाब देंगे। 

‘इंडियाज जीडीपी मिसएस्टीमेशन: लाइकलीहूड, मैग्नीट्यूड्स, मैकेनिज्म्स एंड इम्पलीकेशंस’ (भारत के जीडीपी का गलत आकलन : संभावना, आकार, व्यवस्था और निहितार्थ) शीर्षक से हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रकाशित यह शोध पत्र ऐसे समय में आया जब आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों को लेकर विभिन्न तबकों ने चिंता जताई है। 

पीएमईएसी के अनुसार ऐसा लगता है कि पूर्व सीईए ने भारत की जटिल अर्थव्यवस्था और उसके विकास के बारे में जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालने का प्रयास किया। पत्र के अनुसार उन्हेंने 17 तीव्र आवृत्ति वाले संकेतकों (आंकड़ों) का उपयोग किया लेकिन विश्लेषण में सेवा क्षेत्र तथा कृषि क्षेत्र की भूमिका की उपेक्षा की। सेवा क्षेत्र का जहां जीडीपी में 60 फीसदी योगदान है वहीं कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 18 फीसदी है।

रिपोर्ट के अनुसार सुब्रमण्यन ने 2011-12 के बाद वृद्धि दर के बारे में संदेह जताने को लेकर सुविधानुसार उच्च आवृत्ति के संकेतको को लिया। उन्होंने जिन 17 संकेतकों का उपयोग किया, उसमें से ज्यादातर सीधे सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन एकोनॉमी (सीएमआईई) से लिए गए। सीएमआईई एक निजी एजेंसी है जो सूचना का प्राथमिक स्रोत नहीं है। वह विभिन्न स्रोतों से सूचना एकत्रित करती है।

इसमें कहा गया है, ‘जिस किसी ने भी डॉ. सुब्रमण्यन के शोध पत्र को पढ़ा, उसे यह बिल्कुल स्पष्ट है कि उन्होंने सीएमआईई पर भरोसा किया लेकिन केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) पर अविश्वास किया... निजी एजेंसी सीएमआईई पर आंख मूंदकर भरोसा और देश की सेवा करने वाले सरकारी संस्थान पर अविश्वास करना, एक तटस्थ शिक्षाविद से ऐसी अपेक्षा नहीं की जाती है।’ 

पीएमईएसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि सुब्रमण्यन ने कर आंकड़ों की भी अनदेखी की। उनकी दलील है, ‘साल 2011 के बाद की अवधि में प्रत्यक्ष और परोक्ष करों में बड़े बदलाव के कारण हम कर वसूली से जुड़े संकेतकों का उपयोग नहीं करते। यह कर-जीडीपी संबंधों को पहले से अलग और अस्थिर बना देता है। इसीलिए यह जीडीपी वृद्धि के लिए संकेतकों को अवास्तविक बनाता है।’ 

पीएमईएसी के अनुसार अन्य संकेतकों के विपरीत कर आंकड़ों का संग्रह सर्वे या एजेंसियां किसी गुप्त तरीके से नहीं करती हैं। ये ठोस आंकड़े होते हैं और ये वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण संकेतक होने चाहिए। इसमें कहा गया है, ‘पुन: लेखक के विश्लेषण की अंतिम अवधि (31 मार्च 2017) तक कर कानून में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया था। जीएसटी एक जुलाई 2017 को आया।’ 

पीएमईएसी के अनुसार, ‘लेखक का कर आंकड़ों के उपयोग नहीं करने का तर्क उनकी सुविधा के मुताबिक दी गई दलील है। इसका मतलब है कि उन्होंने वास्तविक तथ्यों पर आधार असुविधाजनक निष्कर्षों से बचा।’ 


सुब्रमण्यन अक्तूबर 2014 से करीब चार साल वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे। सुब्रमण्यन पिछले साल मुख्य आर्थिक सलाहकार पद से हट गए थे। 
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