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प्रकृति से खिलवाड़ का नतीजा है महामारी, दस लाख जानवरों-पौधों की प्रजातियां खतरे में

Fri, 05 Jun 2020 12:36 PM IST
Tanuja Yadav न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Tanuja Yadav Updated Fri, 05 Jun 2020 12:36 PM IST
सार

  • 10 लाख जानवरों और पौधों की प्रजातियों पर गहराया संकट
  • पर्यावरण और प्रकृति से खिलवाड़ करने पर महामारी दे रही दस्तक
  • जंगलों में अतिक्रमण से तीन गुना तेज हुई संक्रामक रोग की रफ्तार

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over one million species and animal are in deep crisis human harm to biodiversity
पर्यावरण दिवस - फोटो : SELF

विस्तार

पर्यावरण और महामारियों के बीच पुराना संबंध रहा है, चाहे वह 1347 में यूरोप में फैली ब्लैक डेथ हो या फिर अमेरिका में 1610 में आया चेचक या 1918 का स्पेनिश फ्लू। जब कभी भी पर्यावरण के साथ संतुलन बनाए रखने में कोई छेड़छाड़ हुई हो तो किसा न किसी महामारी ने जन्म लिया है। 
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पिछले 20 सालों में दुनिया ने कई तरह की वायरस जनित महामारियों का सामना किया है लेकिन सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात यह है कि अब तक हर चार में से तीन महामारियां जानवरों से ही इंसानों में आई हैं। पर्यावरणविदों का मानना है कि जंगलों की अंधाधुंध कटाई, कुदरती संसाधनों का अतिदोहन और जानवरों के असामान्य भक्षण ने जैव विविधता की डोर तोड़ दी है।
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जैव विविधता की डोर को तोड़ने का खामियाजा आज कोरोना वायरस में पूरी दुनिया भुगत रही है। यही वजह है कि आजकल के हालात में जैव विविधता को बचाने की मांग जोर पकड़ने लगी है। 
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जंगलों में अतिक्रमण से तीन गुना बढ़ी संक्रामक रोगों की रफ्तार
साल 2002 में सार्स, 2009 में स्वाइन फ्लू, 2013 में इबोला और अब 2019 में कोरोना ने दुनिया को हिला कर दिया है। इन सभी बीमारियों में एक समानता है कि इनके वायरस ने जानवरों से इंसानों पर हमला बोला है। इसका मुख्य कारण यह रहा कि इन जानवरों के साथ इंसानों का संपर्क बढ़ने लगा। 

वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसान की बढ़ती आबादी और जंगली जानवरों के रहने की जगहों को कब्जे करने का ही परिणाम है कोरोना का दुनिया में कहर मचाना। इंसानों की ओर से जंगलों में अतिक्रमण का ही नतीजा है कि 1980 के मुकाबले अब संक्रामक रोगों के प्रकोप की सालाना रफ्तार तीन गुना बढ़ गई है।

मिसाल बना कोलंबिया 
कोलंबिया जैसे देश ने जैव विविधता का मूल काफी पहले समझ लिया था। धरती की कुल जैव विविधता का दस फीसदी अकेले कोलंबिया में है यह दुनिया का प्रमुख मेगाडाइवर्स देश कहलाता है। विविध पक्षियों और आर्किड के मामले में वह पहले पायदान पर है। वहीं पौधे, तितलियां और ताजा पानी की मछलियों के हिसाब से दूसरे स्थान पर है।

100 गुना तेजी से विलुप्त हो रही हैं प्रजातियां

1991-2015 के बीच 29 करोड़ हेक्टेयर स्थानीय जंगलों को खत्म कर दिया गया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार वन्यजीवों, पक्षियों और पेड़-पौधों के अस्तित्व पर तेजी से खतरा मंडराने लगा है। जैव विविधता के विशेषज्ञ एडवर्ड ओ विल्सन ने कई साल पहले कहा था कि धरती पर इंसान के आने से पहले मौजूद प्रजातियां अब 100 गुना तेजी से विलुप्त हो रही हैं।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन का कहना है कि ताजा हालात की बात करें तो दस लाख पौधे और जानवरों की प्रजातियों पर विलु्प्त होने का खतरा मंडरा रहा है।

जैव विविधता रहेगी तो ही बचेगा इंसान का भविष्य
वैज्ञानिकों के अनुसार मानव के अच्छे स्वास्थ्य और संतुलित पर्यावरण के लिए जैव विविधता का होना बेहद जरूरी है। कुदरत के साथ खिलवाड़ होने पर वह कोरोना जैसा कहर बरपाती है। उनका कहना है कि लगातार बढ़ती इंसानी आबादी के कारण जानवरों की आवाज का नष्ट होना, वन्यजीवों की खरीद-फरोख्त प्रदूषण और जलवायु संकट खतरनाक हुआ है। ऐसे में इन समस्याओं से तत्काल निपटा जाना चाहिए।

6.6 करोड़ साल बाद छठे सामूहिक विलुप्तकरण की ओर
हाल ही में प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशन एकेडमी ऑफ साइंसेस के एक अध्ययन में सामने आया है कि अगले 20 वर्षों में वन्यजीवों की पांच सौ प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी। अगर कुदरत के साथ इंसानी खिलवाड़ नहीं होता तो यह प्रजातियां अगले दस हजार साल तक जीवित रहती। वहीं 515 प्रजातियों की आबादी एक हजार से भी कम मिली है।

आज हालात यह है कि धरती पर कई जानवरों के छठे सामूहिक विलुप्तीकरण का खतरा मंडरा रहा है। गौरतलब है कि अतीत में 6.6 करोड़ साल पहले डायनासोर विलुप्त हुए थे।

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