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कांगथांग के सहारे केंद्र का उत्तर-पूर्व के लोगों को खास संदेश, यहां बच्चे के जन्म पर सीटी बजाती है मां

Tue, 01 Sep 2020 07:48 AM IST
योगेश साहू डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली।
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Tue, 01 Sep 2020 07:48 AM IST
सार

  • 15 अगस्त को पीएम नरेंद्र मोदी के भाषण के बाद राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने कांगथांग को लिया था गोद
  • पूर्वोत्तर में रहने वाले आदिवासियों और दिल्ली की सत्ता के बीच भरोसे की कमी को पाटने की कवायद

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MP Rakesh Sinha Wants To Give This Special Message To The People Of North East With The Help Of Kangthang
meghalaya - फोटो : meghalaya

विस्तार

राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने जब संसद में बोलते हुए मेघालय के कांगथांग गांव की अनूठी संस्कृति के बारे में देश को बताया था, तब बहुत कम ही लोगों को पता था कि यह गांव सीटी बजाने वाले गांव (Whistling Village) के नाम से जाना जाता है।

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उसे यह नाम इसलिए मिला है क्योंकि यहां की हर मां बच्चे के जन्म के बाद सीटी के रूप में एक विशेष ध्वनि निकालती है जो उसके बाद पूरे जीवन भर उस बच्चे की पहचान के रूप में काम आती है। जिसे भी उस बच्चे को बुलाना होता है, वह वही ध्वनि निकालता है और बच्चा समझ जाता है कि उसे बुलाया जा रहा है। गांव की इसी अद्भुत संस्कृति के सहारे राकेश सिन्हा अब कांगथांग को यूनेस्को से हेरिटेज विलेज का दर्जा दिलवाने का प्रयास कर रहे हैं।
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इसके पहले टर्की का एक गांव कॉस्कॉव अपनी अनूठी सांस्कृतिक विरासत के कारण यह दर्जा पा चुका है। इसके पहले 15 अगस्त को ही सांसद सिन्हा कांगथांग के साथ-साथ बरैपुरा (बेगूसराय, बिहार) गांव को भी गोद लेने की घोषणा कर चुके हैं। मूलरूप से बिहार के रहने वाले और दिल्ली के कार्यक्षेत्र में काम करने वाले राकेश सिन्हा ने उत्तर-पूर्व के राज्य मेघालय के किसी गांव को गोद क्यों लिया?
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अमर उजाला के इस सवाल पर उन्होंने कहा कि हमारे देश की संस्कृति रही है कि किसी एक कोने का व्यक्ति देश के दूसरे कोने के व्यक्ति की चिंता करता रहा है। कभी किसी ने इस कारण भेदभाव का अनुभव नहीं किया कि वह कहीं दूसरी जगह का रहने वाला है।

लेकिन राजनीतिक कारणों से कुछ लोगों ने इस सोच को बढ़ावा दिया कि किसी जगह विशेष के पुत्र (Son Of the Soil) ही उस जगह का विकास कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह सोच अनजाने में यह भी स्थापित करती है कि एक जगह का व्यक्ति किसी दूसरी जगह के विकास की बात नहीं सोच सकता।

उन्होंने कहा कि मैं इस सोच को तोड़ना चाहता हूं क्योंकि देश की अखंडता तभी सुरक्षित हो सकती है, जब देश के एक कोने का व्यक्ति देश के दूसरे कोने को भी अपना माने, उसके विकास की चिंता करे। इससे पूर्वोत्तर के लोगों में भरोसा पैदा होगा देश उनके बारे में सोचता है।

कोरोना काल में सांसदों को विकास के लिए मिलने वाला फंड स्थगित कर दिया गया है। ऐसे में वे गोद लिए हुए गांवों का विकास कैसे कर पाएंगे? 
इस सवाल पर दिल्ली विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर राकेश सिन्हा ने कहा कि निजी संस्थाओं से बात कर इन गांवों के विकास को आगे बढ़ाया जा रहा है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री से बात कर गांव में अस्पताल बनवाने का रास्ता साफ हुआ है। इसी प्रकार एक अन्य संस्था के सहयोग से गांव में स्कूल बनवाया जा रहा है। अगले तीन-चार महीनों में ही इसमें बच्चे पढ़ने जा पाएंगे।

जमीनी बदलाव की जरूरत

सांसद सिन्हा ने कहा कि आज भी रोज दो-तीन फोन मेघालय से जरूर आते हैं। लोग मिलना चाहते हैं और अपने गांव, अपनी जमीन के बारे में समझना चाहते हैं। वहां का पीडीएस सिस्टम सही किया जा चुका है और लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली से मुफ्त राशन का लाभ मिल पा रहा है।

सामाजिक बदलाव का आह्वान
सिन्हा बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले से सैनिटरी नैपकिन की चर्चा कर एक बड़े सामाजिक बदलाव का आह्वान किया है। इसके तहत ही उन्होंने कांगथांग और बरैपुरा की महिलाओं के लिए छह हजार सैनिटरी नैपकिन, साबुन और अन्य सामग्रियां भेजी हैं।

प्रयास है कि कांगथांग एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो, जिससे गांव के लोगों को स्थाई रोजगार मिले। इसके लिए राज्य के पर्यटन मंत्री से भी बात कर रहे हैं। गांव के लोगों के अधिकार सुरक्षित रहें और इसमें कोई भ्रष्टाचार न कर सके, इसके लिए मैनेजमेंट के लोगों के साथ-साथ गांव के लोगों को मिलाकर एक विशेष कमेटी बनाई है। यह कमेटी विकास योजनाओं की रूपरेखा तय करती है।

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