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Madras HC On Judiciary:'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से इन्कार नहीं', तमिल फिल्म पर रोक लगाने से किया इन्कार

Thu, 28 May 2026 11:11 AM IST
शिवम गर्ग न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई Published by: शिवम गर्ग Updated Thu, 28 May 2026 11:11 AM IST
सार

तमिल फिल्म ‘करुप्पु’ पर रोक लगाने की याचिका खारिज करते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार मौजूद है। कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कलात्मक आजादी पर भी बड़ा बयान दिया।

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Madras High Court on Judiciary Corruption Judges Should Not Be Treated as Holy Cows
मद्रास हाईकोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

मद्रास हाईकोर्ट ने स्वीकार किया कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार व्याप्त है। जस्टिस जीआर स्वामीनाथन एवं जस्टिस वी लक्ष्मीनारावण की अवकाशकालीन पीठ ने अधिवक्ता आरएस तमिलवेंदन की जनहित याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। याचिका में फिल्म स्टार एस सूर्या और तृषा अभिनीत तमिल फिल्म करुप्पु के प्रदर्शन पर रोक लगाने का निर्देश देने की मांग की गई थी। पीठ ने टिप्पणी की, न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को कोई नकार नहीं सकता, भ्रष्ट न्यायाधीश थे और हैं।

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बार काउंसिल और वकीलों की भूमिका पर भी टिप्पणी
अदालत ने यह भी कहा कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार बिना कुछ वकीलों की मिलीभगत के संभव नहीं है। हाईकोर्ट लगातार सतर्क निगरानी रखता है ताकि भ्रष्ट लोगों की पहचान कर उचित कार्रवाई की जा सके। कोर्ट ने कहा कि न्याय व्यवस्था को आलोचना से ऊपर नहीं रखा जा सकता। लॉर्ड एटकिंसन के एक प्रसिद्ध कथन का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा कि न्याय "बंद कमरे में रहने वाली सद्गुण" नहीं है, बल्कि उसे आम लोगों की तीखी लेकिन सम्मानजनक आलोचना का सामना करना चाहिए।
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क्या था पूरा मामला?
दरअसल, एक याचिकाकर्ता ने तमिल फिल्म ‘करुप्पु’ पर रोक लगाने की मांग की थी। उसका आरोप था कि फिल्म में एक जज को रिश्वत लेते और ड्रग्स का सेवन करते दिखाया गया है, जिससे न्यायपालिका की छवि खराब होती है। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि फिल्म निर्माता ने भारतीय न्यायिक व्यवस्था की बिना समझ के आलोचना की है और यह संविधान की भावना के खिलाफ है।
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अदालत ने कहा- कला को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है
हालांकि हाईकोर्ट ने माना कि फिल्म में न्यायिक व्यवस्था को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है, लेकिन अदालत ने इसे कलात्मक स्वतंत्रता का हिस्सा बताया। कोर्ट ने कहा कि तमिल फिल्मों में नाटकीय प्रस्तुति आम बात है और कलाकार को अपनी रचनात्मकता के अनुसार कहानी प्रस्तुत करने का अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि डॉक्यूमेंट्री और कलात्मक फिल्मों के मूल्यांकन का पैमाना अलग होता है।

कोर्ट ने कहा कि फिल्म कला की अभिव्यक्ति है। कलाकार को कानून के दायरे में रहकर खुद को व्यक्त करने की स्वतंत्रता है। यदि रचनात्मकता में अनावश्यक हस्तक्षेप किया जाएगा तो सभ्यता के मूल्य कमजोर पड़ जाएंगे।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) का हवाला देते हुए कहा कि हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। इसमें बोलने, लिखने, प्रकाशित करने और चित्रों के माध्यम से विचार रखने की आजादी शामिल है। कोर्ट ने यह भी कहा कि फिल्म को पहले ही केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए मंजूरी दे चुका है। ऐसे में अदालत किसी रिट याचिका के जरिए  सीबीएफसी के फैसले की जगह अपना दृष्टिकोण नहीं थोप सकती।


अवमानना कार्रवाई से भी इनकार
याचिकाकर्ता ने फिल्म निर्माताओं के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की भी मांग की थी। लेकिन अदालत ने कहा कि फिल्म में किसी वास्तविक अदालत या पूरे न्यायिक तंत्र को बदनाम नहीं किया गया है, बल्कि काल्पनिक पात्रों को भ्रष्ट दिखाया गया है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फिल्म पर प्रतिबंध या नियंत्रण लगाने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।

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