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Khabaron Ke Khiladi: ममता का सियासी भविष्य कैसा? विश्लेषकों ने बताई टीएमसी में टूट और टकराव के पीछे की कहानी

Sat, 06 Jun 2026 09:13 PM IST
Asmita Tripathi न्यूज डेस्क, अमर उजाला नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला नई दिल्ली। Published by: Asmita Tripathi Updated Sat, 06 Jun 2026 09:13 PM IST
सार

पश्चिम बंगाल में राजनीति हलचल लगातार चर्चा में हैं। तृणमूल कांग्रेस टूट की कगार पर है। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। 

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Khabaron Ke Khiladi What does Mamata Banerjee's political future hold? Analysts explain the story
खबरों के खिलाड़ी में बंगाल की राजनीति पर चर्चा - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

पश्चिम बंगाल की राजनीति चुनाव के बाद भी हलचल है। सत्ता से बाहर हुई तृणमूल कांग्रेस में भगदड़ की स्थिति है। पार्टी टूट की कगार पर है। विधायकों की बगावत के बाद अब सांसदों के भी विद्रोह की चर्चा है। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, पीयूष पंत, समीर चौगांवकर, राकेश शुक्ल और गुजा कपूर मौजूद रहीं।  

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पीयूष पंत: संकट तो है, लेकिन मुझे लगता है कि संगठन मजबूत है। इसीलिए अभी आप देखिए कि जो लोग अलग हुए हैं वो इस बात को लगातार कह रहे हैं कि ममता बनर्जी हमारी नेता हैं। मुझे लगता है कि ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ वहां पर काफी गुस्सा है। लेकिन सरप्राइजिंग ये है कि कल जो मीटिंग हुई उसमें सांसद भी नहीं पहुंचे। वहां मुश्किल से मेरे ख्याल से आठ लोग थे। इसका मतलब कुछ-कुछ पक रहा है। संकट ये भी है कि भारतीय जनता पार्टी के पास इतने नंबर्स आ गए हैं कि उनको किसी को अपने यहां शामिल करने का कोई दबाव नहीं है। दूसरा उनके अंदर से भी विरोध हो रहा है। तो ये ग्रुप अलग-थलग सा पड़ गया है। मुझे लगता है कि संगठन अभी की क्राइसिस नहीं है, नेतृत्व की है।  ममता बनर्जी को कमजोर किया गया। ये भी बहुत बड़ा सरप्राइजिंग एलिमेंट है कि ममता बनर्जी जिनका वर्चस्व चलता था।  

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समीर चौगांवकर: मुझे तो भारतीय राजनीति में ऐसा उदाहरण देखने को नहीं मिलता कि कोई मुख्यमंत्री तीन बार लगातार मुख्यमंत्री रहा हो और सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री उस राज्य का रहा हो, सबसे ताकतवर उसकी पार्टी उस राज्य की रही हो और उसके चुनाव हारते ही एक महीने के अंदर पार्टी में ऐसा हाल हो जाए कि आपके 58 विधायक अलग बैठक करके ऋतब्रत बनर्जी को नेता बना दें। आपने सांसदों की बैठक बुलाई तो आठ सांसद ही पहुंचे। खबर ये आ रही है कि टीएमसी के 28 में से 20 सांसद लोकसभा के अंदर कल शायद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात कर सकते हैं और अलग गुट की मान्यता की मांग कर सकते हैं।किसी दल में इस तरीके से टूट-फूट होना यह बताता है कि ममता बनर्जी का पार्टी के अंदर किस तरीके से व्यवहार रहा होगा। यह बता रहा है कि ममता बनर्जी का पार्टी के अंदर किस तरीके से वर्किंग रही होगी। मुझे लगता है कि बहुत ज्यादा ममता बनर्जी के पास राजनीतिक भविष्य बचा नहीं है।  

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गुंजा कपूर: जब भी हम किसी क्षेत्रीय दल की बात करते हैं और स्पेशली ऐसी पार्टी की जो किसी व्यक्ति विशेष के इर्द-गिर्द बनी होती है। उसका कई बार भविष्य या तो वो दो भागों में बंट जाती है जो हमने देखा कि शिवसेना के साथ हो और एकदम अलग धाराओं पे दोनों बह रही हैं। या फिर वो एक अलग नेतृत्व चुन लेती हैं जो कि एमजीआर के बाद जयंती रामचंद्रन और जयललिता के बीच संघर्ष हुआ। एंड द पार्टी चोस कि हम जयललिता के साथ जाएंगे। या तो फिर तीसरा होता है कि वो पार्टी सेट्स इनटू ऑब्लिवियन जो हम अब जेडीयू के साथ शायद होते देख रहे हैं। एक्सेप्ट फॉर व्हाट हैपेंड विद समाजवादी पार्टी। 
शुभेंदु अधिकारी 5 साल पहले चले गए। बड़े-बड़े नेता शुभेंदु अधिकारी के साथ दिखते हैं। बिकॉ उन्हें लगता है कि हम भी अगर पांच साल पहले चले गए होते तो आज हम भी सत्ता में बैठे होते। डायनेस्टी को लेकर ना जो एक अलग माइंडसेट हो चुका है कि भाई काम वर्सेस नाम में मोदी जी ने वो 12 साल में ये सबके दिमाग में बैठा दिया है कि काम बोलता है नाम ज्यादा दिन नहीं चलता है। आई थिंक वो अब इस बार बंगाल में भी दिख रहा है कि जब 15 साल काम हमने किया तो तुम हेलीकॉप्टर से या फिर तुम्हारा कोई भतीजा है तो इसकी वजह से हम क्यों किसी की लीडरशिप को एक्सेप्ट करें?

राकेश शुक्ल: 2011 में जब लेफ्ट पार्टी को हरा करके तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनी थी तब भी इसी तरह की भगदड़ मची थी। तृणमूल कांग्रेस ने अपने दरवाजे खोल रखे थे। आइए क्योंकि उनको उस तरह के लोगों की जरूरत थी, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने दरवाजा बंद कर रखा है कि आप प्रवेश नहीं करेंगे। इसी का कारण है कि जो लोग कल तक अभिषेक बनर्जी का पैर छूते थे, वह आज उनकी टांग खींच रहे हैं। क्योंकि पैर छूने के पीछे उनका उद्देश्य था और आज टांग खींचने के लिए भी उनका एक अपना उद्देश्य है। उसी उद्देश्य के तहत यह सब हो रहा है। ममता बनर्जी को भी यह पता था कि हमारे पास समर्पित नहीं समर्थित लोग हैं। लेकिन उनको यह एक भ्रम था कि हमारे साथ पब्लिक है। वह मुगालता उनके लिए घातक साबित हुआ और आज स्थितियां यह है कि पार्टी संकट में नहीं ममता बनर्जी संकट में हैं। उनको इस संकट में कुछ भी समझ में नहीं आ रहा इसलिए वो मौन साध के बैठी हैं क्योंकि उनका रिएक्शन उनका और पार्टी का भविष्य तय करेगा।

विनोद अग्निहोत्री: ऋतुब्रत बनर्जी की हिस्ट्री देखिए। उनका इतिहास है वो सीपीएम छोड़के तृणमूल में आए। अब क्या होगा देखिए 15 साल से सरकार रही है। वहां हर विधायक की फाइल है। हर विधायक के ऊपर बैगेज है। तो बचना है। जब अभिषेक बनर्जी पर अंडे फेंके जा सकते हैं तो विधायकों की और जिला परिषद के क्या हैसियत बचेगी? तो पहला काम क्या होता है कि नेता को इतना बेइज्जत कर दो कि उसका कार्यकर्ता और विधायक और टूट जाए। ये सत्ता का चुंबक और सत्ता का भय दोनों हैं। ये विशुद्ध राजनीतिक स्वार्थों की लड़ाई है। जहां तक विपक्षी एकता की बात है तो ये सारी पार्टियां इंक्लूडिंग कांग्रेस सब सरकार में रही हैं। सबके बैकेज हैं। सबके अपने स्वार्थ हैं। फाइलें हैं। तो सब एक तरह से कोर्ट कंप्रोमाइज्ड हैं। सबको सत्ता का संरक्षण चाहिए और ऐसे में आपको चुनाव भी लड़ना है। अब आठ तारीख की जो बैठक है उससे बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए। लेकिन हां कांग्रेस के लिए अवसर है कि वो जो क्षेत्रीय पार्टियों के क्षेत्र में क्या वो अपनी जमीन वापस पाने की कोशिश करेगी या कर पाएगी। ये उसका ट्रस्ट है। आपदा में अवसर है।

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