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Kerala High Court: 'नियम-कानून समाज को जोड़ने वाली ताकत बनें, झगड़े का जरिया नहीं'; अदालत ने क्यों की टिप्पणी?

Sat, 07 Feb 2026 10:09 PM IST
शिवम गर्ग न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोच्चि
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोच्चि Published by: शिवम गर्ग Updated Sat, 07 Feb 2026 10:09 PM IST
सार

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि कानून और नियम धर्मों, जाति या समुदायों के बीच कलह पैदा करने का जरिया नहीं होने चाहिए, बल्कि समाज को जोड़ने का साधन बनें।

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Kerala High Court Says Laws Should Unite Society, Not Create Religious Conflicts
केरल हाईकोर्ट - फोटो : Amar Ujala Graphics

विस्तार

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि कानून, नियम और नियमन धर्मों, जाति या समुदायों के बीच झगड़ा या मनमुटाव पैदा करने का जरिया नहीं बनने चाहिए, बल्कि इन्हें समाज को जोड़ने वाली शक्ति के तौर पर काम करना चाहिए। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी एक याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें यह एलान करने का आग्रह किया गया था कि 2023 में पथनमथिट्टा जिले के अडूर श्री पार्थसारथी मंदिर में दो पादरियों का प्रवेश केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश प्राधिकरण) अधिनियम, 1965 का उल्लंघन है।

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डॉ. जकारिया मार अप्रेम और एक अन्य पादरी को श्रीकृष्ण जयंती समारोह के अवसर पर सात सितंबर 2023 को एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए मंदिर में आमंत्रित किया गया था। पेशे से शिक्षक सनील नारायणन नंबूथिरी की दायर याचिका में त्रावणकोर देवस्वओम बोर्ड (टीडीबी) और मंदिर प्रशासन को यह निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया था कि गैर हिंदुओं के मंदिर में प्रवेश को रोका जाए।
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जस्टिस राजा विजयराघवन वी और जस्टिस केवी जयकुमार की पीठ ने तैत्तिरीय उपनिषद के पवित्र संस्कृत मंत्र मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव का जिक्र किया और कहा कि इसका अर्थ है कि माता, पिता, गुरु और अतिथि भगवान के समान हैं और उनका सम्मान किया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि इस मामले में ईसाई पादरियों को तंत्री की ओर से अतिथि के रूप में मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी, जो अधिकार के रूप में मांगे गए प्रवेश से बिल्कुल अलग है। ऐसा अनुमति आधारित और औपचारिक प्रवेश अधिनियम, उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों या मंदिर की स्थापित परंपराओं और रीति-रिवाजों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
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सामाजिक सद्भाव पर जोर
पीठ ने कहा कि केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश प्राधिकरण) अधिनियम का उद्देश्य मंदिरों में हिंदुओं के सभी वर्गों और संप्रदायों को प्रवेश की अनुमति देना और उनके बीच भेदभाव को समाप्त करना है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य सामाजिक सद्भाव को सुनिश्चित करना और नागरिकों के कल्याण को बढ़ावा देना है। पीठ ने कहा कि जैसे-जैसे समाज आगे बढ़ता है और अधिक समावेशी बनता है, कानूनी प्रावधानों की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिए जो सांविधानिक मूल्यों और सामाजिक एकता को मजबूत करे।


पीठ ने कहा कि कानून, नियम और विनियमों को विभिन्न धर्मों, जातियों, उप-जातियों या समुदायों के बीच कलह या असंतोष फैलाने का जरिया नहीं बनने देना चाहिए। इसके विपरीत, कानूनी ढांचा एक ऐसी एकीकृत शक्ति के रूप में कार्य करे जो आपसी सम्मान और सह-अस्तित्व को बढ़ावा दे।

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