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चिंताजनक: 2024 में भारत ने गंवाए 18,200 हेक्टेयर वन, ग्लोबल रिपोर्ट से सामने आई स्याह हकीकत

Thu, 22 May 2025 06:54 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शुभम कुमार Updated Thu, 22 May 2025 06:54 AM IST
सार

भारत ने 2024 में 18,200 हेक्टेयर प्राथमिक वन गंवाए। 2001 से अब तक कुल 23.1 लाख हेक्टेयर हरियाली खत्म, जिससे 1.29 गीगाटन CO₂ उत्सर्जन हुआ। यह संकट हमारी पारिस्थितिकी और जलवायु दोनों के लिए खतरा है।

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India will lose 18,200 hectares of forest in 2024 global report News In Hindi
जंगल (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Adobe

विस्तार

भारत ने 2024 में 18,200 हेक्टेयर बेशकीमती प्राथमिक वनों को खो दिया। साल 2023 के 17,700 हेक्टेयर के मुकाबले थोड़ा अधिक है। यह आंकड़ा 100 से अधिक संगठनों की वैश्विक साझेदारी से प्राप्त हुआ है। इसे ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच और मैरीलैंड विश्वविद्यालय ने जारी किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने 2001 से अब तक कुल 23.1 लाख हेक्टेयर वृक्षों की हरियाली खो दी है। यह नुकसान कुल वृक्षावरण का लगभग 7.1 फीसदी है। इससे लगभग 1.29 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन हुआ है।
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इस वृक्षावरण हानि में एक बड़ा हिस्सा आर्द्र प्राथमिक वनों का है। इन वनों को चिरकालीन वन भी कहा जाता है। यह ऐसे वन हैं जो बहुत पुराने हैं और इनमें मानवीय दखल से बहुत कम या बिल्कुल भी बदलाव नहीं हुआ है। ये वन मूलतः एक ऐसे क्षेत्र को कवर करते थे जो इंसान के किए गए पर्यावरण में बदलावों से पहले का था। प्राथमिक वन अक्षुण्ण पारिस्थितिक तंत्र के उदाहरण हैं। ये वन जंगल में आग, तूफान, या भूस्खलन जैसे प्राकृतिक विक्षोभों से गुजर सकते हैं और मानवीय गतिविधियों से प्रभावित नहीं होते हैं।
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जैव विविधता के संरक्षण में अहम भूमिका

यह वन जैव विविधता के संरक्षण में अहम भूमिका निभाते हैं। भारत ने 2002 से 2024 के बीच कुल 3,48,000 हेक्टेयर आर्द्र प्राथमिक वन खो दिए। यह लगभग 5.4 फीसदी हानि के बराबर है और देश की कुल वृक्षावरण हानि का लगभग 15 फीसदी हिस्सा है। 

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क्या कहते है आकड़े

आंकड़ों से पता चलता है कि देश को 2022 में 16,900 हेक्टेयर , 2021 में 18,300 हेक्टेयर, 2020 में 17,000 हेक्टेयर और 2019 में 14,500 हेक्टेयर आर्द्र प्राथमिक वनों का नुकसान हुआ। यह सभी आंकड़े लैंडसैट उपग्रह चित्रों के विश्लेषण पर आधारित हैं। इन्हें हर क्षेत्र के लिए खास एल्गोरिद्म से जांचा गया है। भारत में परिपक्व वन पारिस्थितिकी तंत्रों का लगातार होता नुकसान, वन संरक्षण की नीतियों को और मजबूत करने और भूमि उपयोग की टिकाऊ योजनाओं की जरूरत की तरफ इशारा करता है।
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