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महावानरों पर नई खोज: हर प्रजाति के सोच का तरीका अलग, अध्ययन ने खारिज की एकरूप बुद्धिमत्ता की धारणा
Sat, 20 Jun 2026 05:07 AM IST
निर्मल कांत
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Sat, 20 Jun 2026 05:07 AM IST
सार
वैज्ञानिकों के नए अध्ययन से पता चला है कि चिंपैंजी, बोनोबो, गोरिल्ला और ओरंगुटान जैसे महावानरों की सोचने-समझने की क्षमता न सिर्फ अलग-अलग प्रजातियों में, बल्कि एक ही प्रजाति के व्यक्तियों में भी भिन्न होती है। यह निष्कर्ष इस धारणा को कमजोर करता है कि एक प्रजाति के सभी सदस्य समान रूप से सीखते और सोचते हैं। पढ़िए रिपोर्ट-
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक (एएनआई)
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विस्तार
मनुष्य की बुद्धिमत्ता और उसके विकासक्रम को समझने के लिए वैज्ञानिक लंबे समय से चिंपैंजी, बोनोबो, गोरिल्ला और ओरंगुटान जैसे महावानरों का अध्ययन करते रहे हैं। आम धारणा यह रही है कि यदि कोई मानसिक क्षमता केवल मनुष्यों और उनके सबसे निकट संबंधी प्राइमेट्स में दिखाई देती है तो वह विकासक्रम में अपेक्षाकृत बाद में विकसित हुई होगी। लेकिन एक नए अध्ययन ने संकेत दिया कि महावानरों की संज्ञानात्मक क्षमताएं न केवल एक-दूसरे से भिन्न होती हैं, बल्कि एक ही प्रजाति के अलग-अलग व्यक्तियों में भी अंतर होता है। इससे यह धारणा कमजोर पड़ती है कि किसी प्रजाति के सभी सदस्य समान तरीके से सोचते और सीखते हैं।
अर्थ डॉट कॉम के अनुसार, जर्मनी की ल्युफाना यूनिवर्सिटी ल्यूनेबर्ग के विकासात्मक मनोवैज्ञानिक मैनुअल बोहन और उनके सहयोगियों द्वारा किए गए इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका साइकोलॉजिकल साइंस में प्रकाशित हुए हैं।
हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि व्यक्तियों के अनुभव, पालन-पोषण, सामाजिक वातावरण और जीवन की परिस्थितियां उनकी सोच और व्यवहार को गहराई से प्रभावित करती हैं। मनुष्यों के मामले में वैज्ञानिक इस निजी और विकासात्मक दृष्टिकोण को स्वीकार करते हैं।
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सामाजिक समूह का भी असर
शोधकर्ताओं ने पाया कि किसी महावानर का सामाजिक समूह, उसका पालन-पोषण, शोध गतिविधियों से पूर्व परिचय और लिंग जैसी विशेषताएं उसके प्रदर्शन को प्रभावित करती हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कारक वह समूह था जिसमें वह रहता था। हालांकि किसी एक समूह ने सभी परीक्षणों में श्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं किया।
ये भी पढ़ें: ओडिशाः इंजीनियर के ठिकानों पर विजिलेंस की छापेमारी, 49 प्लॉट-दो फार्म हाउस का मालिक निकला; सोना भी बरामद
■ इंसानों जैसी नहीं दिखी बुद्धिमत्ता की संरचना: शोध में महावानरों की संज्ञानात्मक क्षमताओं का संगठन मनुष्यों जैसा नहीं दिखा। मनुष्यों में कई मानसिक क्षमताएं आपस में जुड़ी होती हैं और अक्सर एक व्यापक सामान्य बुद्धिमत्ता कारक की बात की जाती है। लेकिन इस अध्ययन में अलग-अलग परीक्षणों के परिणामों के बीच वैसा संबंध नहीं मिला।
■ नई दिशा में शोध की जरूरत: शोधकर्ताओं का मानना है कि वर्तमान परीक्षण संभवतः महावानरों की वास्तविक मानसिक क्षमताओं को पूरी तरह नहीं माप पाते। इसलिए ऐसे नए मूल्यांकन उपकरण विकसित करने की आवश्यकता है जो विशेष रूप से महावानरों की संज्ञानात्मक संरचना को समझने के लिए तैयार किए गए हों। ऐसे में नई दिशा में शोध जरूरी बताया गया।
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अर्थ डॉट कॉम के अनुसार, जर्मनी की ल्युफाना यूनिवर्सिटी ल्यूनेबर्ग के विकासात्मक मनोवैज्ञानिक मैनुअल बोहन और उनके सहयोगियों द्वारा किए गए इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका साइकोलॉजिकल साइंस में प्रकाशित हुए हैं।
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हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि व्यक्तियों के अनुभव, पालन-पोषण, सामाजिक वातावरण और जीवन की परिस्थितियां उनकी सोच और व्यवहार को गहराई से प्रभावित करती हैं। मनुष्यों के मामले में वैज्ञानिक इस निजी और विकासात्मक दृष्टिकोण को स्वीकार करते हैं।
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सामाजिक समूह का भी असर
शोधकर्ताओं ने पाया कि किसी महावानर का सामाजिक समूह, उसका पालन-पोषण, शोध गतिविधियों से पूर्व परिचय और लिंग जैसी विशेषताएं उसके प्रदर्शन को प्रभावित करती हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कारक वह समूह था जिसमें वह रहता था। हालांकि किसी एक समूह ने सभी परीक्षणों में श्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं किया।
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■ इंसानों जैसी नहीं दिखी बुद्धिमत्ता की संरचना: शोध में महावानरों की संज्ञानात्मक क्षमताओं का संगठन मनुष्यों जैसा नहीं दिखा। मनुष्यों में कई मानसिक क्षमताएं आपस में जुड़ी होती हैं और अक्सर एक व्यापक सामान्य बुद्धिमत्ता कारक की बात की जाती है। लेकिन इस अध्ययन में अलग-अलग परीक्षणों के परिणामों के बीच वैसा संबंध नहीं मिला।
■ नई दिशा में शोध की जरूरत: शोधकर्ताओं का मानना है कि वर्तमान परीक्षण संभवतः महावानरों की वास्तविक मानसिक क्षमताओं को पूरी तरह नहीं माप पाते। इसलिए ऐसे नए मूल्यांकन उपकरण विकसित करने की आवश्यकता है जो विशेष रूप से महावानरों की संज्ञानात्मक संरचना को समझने के लिए तैयार किए गए हों। ऐसे में नई दिशा में शोध जरूरी बताया गया।