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एक्सप्लेनर: ईरान को छलनी करने के लिए किन देशों को निशाना बनाने की तैयारी में अमेरिका, क्या भारत भी आएगा जद में
Wed, 26 Aug 2026 12:18 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 26 Aug 2026 12:18 PM IST
सार
अमेरिका ने ईरान के खिलाफ 'ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट' शुरू किया है। जानिए ईरान के शीर्ष आयातक-निर्यातक देश, अमेरिकी द्वितीयक प्रतिबंध और चाबहार बंदरगाह से लेकर भारतीय व्यापार पर इसके गंभीर असर से जुड़ी हर जानकारी।
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अमेरिका के ईरान पर अतिरिक्त प्रतिबंध।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अमेरिका और ईरान के बीच बीते करीब छह महीने से जारी युद्ध में अब तक ट्रंप प्रशासन को खास सफलता नहीं मिली है। पहले वित्तीय स्तर पर और उसके बाद कूटनीतिक स्तर पर अमेरिका की ईरान को मुश्किल में डालने की हर कोशिश लगभग नाकाम हुई है। हालांकि, अब अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने प्रतिबंधों के जरिए ईरान को पंगु बनाने की योजना तैयार की है। बेसेंट ने इस अभियान को ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट करार दिया है, जिसके तहत अमेरिका कुछ ऐसे प्रतिबंध लगाने जा रहा है, जिससे न सिर्फ ईरान को, बल्कि उसके साथ किसी भी तरह से लेन-देन करने वालों को भारी नुकसान हो।
बेसेंट का कहना है कि अब उनका मकसद ईरान को जिंदा रखने वाली हर लाइफलाइन को काटना है, ताकि वह इस जंग में अकेला बचे। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसके लिए पूरी दुनिया के नेताओं को फोन कर रहे हैं और ईरान से समझौतों और व्यापार पर रोक लगाने के लिए कह रहे हैं। बेसेंट ने यह नहीं बताया कि ट्रंप ने किन देशों को इसके लिए फोन किया है या अमेरिका की तरफ से किसे-कब तक निशाना बनाया जाएगा। हालांकि, उनका इशारा साफ है कि अब ईरान को घेरने के लिए उसके व्यापारिक और सामरिक सहयोगियों को नुकसान पहुंचाया जाएगा।
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बेसेंट का कहना है कि अब उनका मकसद ईरान को जिंदा रखने वाली हर लाइफलाइन को काटना है, ताकि वह इस जंग में अकेला बचे। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसके लिए पूरी दुनिया के नेताओं को फोन कर रहे हैं और ईरान से समझौतों और व्यापार पर रोक लगाने के लिए कह रहे हैं। बेसेंट ने यह नहीं बताया कि ट्रंप ने किन देशों को इसके लिए फोन किया है या अमेरिका की तरफ से किसे-कब तक निशाना बनाया जाएगा। हालांकि, उनका इशारा साफ है कि अब ईरान को घेरने के लिए उसके व्यापारिक और सामरिक सहयोगियों को नुकसान पहुंचाया जाएगा।
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर ईरान के सहयोगी देश कौन हैं? अमेरिका के बीते कई वर्षों से जारी प्रतिबंधों के बावजूद किन-किन देशों से ईरान का का आयात-निर्यात जारी रहा है? क्यों अमेरिका की ओर से सख्त किए जाने वाले प्रतिबंध अब भारत को ज्यादा प्रभावित कर सकते हैं? आइये जानते हैं...
ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट अमेरिका का ईरान के खिलाफ चलाया गया एक व्यापक और आक्रामक प्रतिबंध अभियान है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट की ओर घोषित इस अभियान का मुख्य मकसद ईरान की सरकार और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) को अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजारों और विदेशी मुद्रा से काटना और उसके वित्तीय स्रोतों को खत्म करना है।
1. ईरान के अहम सेक्टर्स को निशाना बनाने की तैयारी
इसके तहत अमेरिका कुछ चुनिंदा देशों, संस्थाओं, शख्सियतों और जहाजों पर प्रतिबंध लगा रहा है। इससे ईरान के जहाज परिवहन, सोने के आयात-निर्यात, उड्डयन सेवा, तकनीकी खरीद नेटवर्क और डिजिटल संपत्ति जैसे प्रमुख वित्तीय-लॉजिस्टिक्स क्षेत्रों को लक्षित करने की तैयारी की जा रही है।
2. द्वितीयक प्रतिबंधों (सेकेंडरी सैंक्शंस) का दायरा बढ़ेगा
इस ऑपरेशन के तहत द्वितीयक प्रतिबंधों के दायरे को काफी बढ़ा दिया गया है। अमेरिका ने वैश्विक साझेदार देशों को ईरान के वित्तीय बैकचैनलों को बंद करने के लिए सख्त समय सीमा दी है, ऐसा न करने पर उन्हें तत्काल द्वितीयक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। ट्रेजरी सचिव के अनुसार, देशों को ईरान के साथ अपने आर्थिक संबंध पूरी तरह से काटने होंगे या फिर अमेरिकी कार्रवाई का सामना करना होगा।
पहले जानें- क्या है अमेरिका का ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट?
ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट अमेरिका का ईरान के खिलाफ चलाया गया एक व्यापक और आक्रामक प्रतिबंध अभियान है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट की ओर घोषित इस अभियान का मुख्य मकसद ईरान की सरकार और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) को अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजारों और विदेशी मुद्रा से काटना और उसके वित्तीय स्रोतों को खत्म करना है।
1. ईरान के अहम सेक्टर्स को निशाना बनाने की तैयारी
इसके तहत अमेरिका कुछ चुनिंदा देशों, संस्थाओं, शख्सियतों और जहाजों पर प्रतिबंध लगा रहा है। इससे ईरान के जहाज परिवहन, सोने के आयात-निर्यात, उड्डयन सेवा, तकनीकी खरीद नेटवर्क और डिजिटल संपत्ति जैसे प्रमुख वित्तीय-लॉजिस्टिक्स क्षेत्रों को लक्षित करने की तैयारी की जा रही है।
2. द्वितीयक प्रतिबंधों (सेकेंडरी सैंक्शंस) का दायरा बढ़ेगा
इस ऑपरेशन के तहत द्वितीयक प्रतिबंधों के दायरे को काफी बढ़ा दिया गया है। अमेरिका ने वैश्विक साझेदार देशों को ईरान के वित्तीय बैकचैनलों को बंद करने के लिए सख्त समय सीमा दी है, ऐसा न करने पर उन्हें तत्काल द्वितीयक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। ट्रेजरी सचिव के अनुसार, देशों को ईरान के साथ अपने आर्थिक संबंध पूरी तरह से काटने होंगे या फिर अमेरिकी कार्रवाई का सामना करना होगा।
ईरान के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार।
- फोटो : अमर उजाला
अब जानें- ईरान के शीर्ष व्यापारिक सहयोगियों में कौन-कौन?
1. ईरान को सबसे ज्यादा आपूर्ति करने वाले देश
साल 2024 के आधिकारिक सीमा शुल्क आंकड़ों के मुताबिक, ईरान ने दुनिया भर से कुल 68.55 अरब डॉलर (6.52 लाख करोड़ रुपये के बराबर) कीमत की वस्तुओं का आयात किया था। ईरान अपनी जरूरत की अधिकतर चीजों के लिए मुख्य रूप से कुछ चुनिंदा एशियाई और क्षेत्रीय भागीदारों पर निर्भर है...संयुक्त अरब अमीरात (यूएई): 21.01 अरब डॉलर
यह ईरान के कुल आयात का 30% से अधिक हिस्सा है। हालांकि, यूएई द्वारा हाल ही में लगाए गए अनिश्चितकालीन व्यापार प्रतिबंध के बाद यह आपूर्ति श्रृंखला गंभीर संकट में आ गई है। यह ईरान के आयात का सबसे बड़ा घटक है। ईरान मुख्य रूप से यूएई, जो पश्चिमी मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक्स का री-एक्सपोर्ट हब है।
ये भी पढ़ें: होर्मुज पर अमेरिका की नजर: ईरान की घेराबंदी तेज, हेगसेथ बोले- पैसा भी रोकेंगे, जरूरत पड़ी तो मिसाइल भी चलाएंगे
अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान का अरबों डॉलर का व्यापार।
- फोटो : अमर उजाला
चीन: 17.8 अरब डॉलर
ईरान का दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता, जिस पर पश्चिमी देशों के साथ व्यापार बंद होने के बाद ईरान की निर्भरता सबसे ज्यादा बढ़ी है। ईरान के लिए यूएई के बाद चीन से इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। इसके अलावा चीन से ही औद्योगिक कलपुर्जे और धातु ईरान पहुंचते हैं।
तुर्किये: 11.16 अरब डॉलर
साझा जमीनी सीमा होने के कारण यह ईरान के लिए एक अहम व्यापारिक आपूर्ति मार्ग है। विनिर्माण इकाइयों को चालू रखने के लिए जरूरी औद्योगिक कलपुर्जे, धातु और वाहन मुख्य रूप से तुर्किये से आते हैं। तुर्किये से भारी मात्रा में रसायनों और तैयार उपभोक्ता वस्तुओं का भी आयात किया जाता है।
यूरोपीय संघ: 6.1 अरब डॉलर
प्रतिबंधों के चलते यूरोपीय संघ से आयात ऐतिहासिक रूप से बहुत निचले स्तर पर आ गया है। चिकित्सा और स्वास्थ्य क्षेत्र प्रतिबंधों से मुक्त हैं, फिर भी बैंकों की सतर्कता की वजह से ईरान के लिए भुगतान प्रक्रिया जटिल हो गई है। ईरान अपनी दवाओं का एक बड़ा हिस्सा यूरोपीय संघ से मंगाता है।
ईरान का दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता, जिस पर पश्चिमी देशों के साथ व्यापार बंद होने के बाद ईरान की निर्भरता सबसे ज्यादा बढ़ी है। ईरान के लिए यूएई के बाद चीन से इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। इसके अलावा चीन से ही औद्योगिक कलपुर्जे और धातु ईरान पहुंचते हैं।
तुर्किये: 11.16 अरब डॉलर
साझा जमीनी सीमा होने के कारण यह ईरान के लिए एक अहम व्यापारिक आपूर्ति मार्ग है। विनिर्माण इकाइयों को चालू रखने के लिए जरूरी औद्योगिक कलपुर्जे, धातु और वाहन मुख्य रूप से तुर्किये से आते हैं। तुर्किये से भारी मात्रा में रसायनों और तैयार उपभोक्ता वस्तुओं का भी आयात किया जाता है।
यूरोपीय संघ: 6.1 अरब डॉलर
प्रतिबंधों के चलते यूरोपीय संघ से आयात ऐतिहासिक रूप से बहुत निचले स्तर पर आ गया है। चिकित्सा और स्वास्थ्य क्षेत्र प्रतिबंधों से मुक्त हैं, फिर भी बैंकों की सतर्कता की वजह से ईरान के लिए भुगतान प्रक्रिया जटिल हो गई है। ईरान अपनी दवाओं का एक बड़ा हिस्सा यूरोपीय संघ से मंगाता है।
भारत: 1.6 अरब डॉलर
भारत मुख्य रूप से मानवीय और कृषि वस्तुओं का निर्यात करता है। भारत से ईरान मुख्य रूप से प्रीमियम बासमती चावल (2026 की पहली छमाही में 38.31 करोड़ डॉलर का निर्यात), चाय (1.43 करोड़ डॉलर कीमत का निर्यात) और चीनी का आयात करता है। इसके अलावा चिकित्सा और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी कई चीजों के लिए भी ईरान लंबे समय तक भारत पर निर्भर रहा है।
रूस: 1.43 अरब डॉलर
रूस से ईरान मुख्य रूप से अनाज और धातु का आयात करता है, जो कि वहां बढ़ती महंगाई से निपटने और उद्योगों और रक्षा मामलों के लिए बेहद अहम है।
आधिकारिक सीमा शुल्क आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 में ईरान ने दुनिया के कम से कम 112 देशों और क्षेत्रों को कुल 56 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया था। पिछले दो दशकों में पश्चिमी प्रतिबंधों के लगातार बढ़ते दबाव के कारण ईरान का निर्यात बाजार यूरोपीय देशों से दूर होकर मुख्य रूप से एशियाई और क्षेत्रीय देशों पर केंद्रित हो गया है। ईरान के कुल निर्यात में चीन की हिस्सेदारी सबसे बड़ी है। चीन ईरान के कुल समुद्री कच्चे तेल के निर्यात का 80% से अधिक हिस्सा खरीदता है।
ये भी पढ़ें: होर्मुज पर ईरान-ओमान की बातचीत:दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की मुलाकात; क्या जहाजों की आवाजाही पर बनी सहमति?
भारत मुख्य रूप से मानवीय और कृषि वस्तुओं का निर्यात करता है। भारत से ईरान मुख्य रूप से प्रीमियम बासमती चावल (2026 की पहली छमाही में 38.31 करोड़ डॉलर का निर्यात), चाय (1.43 करोड़ डॉलर कीमत का निर्यात) और चीनी का आयात करता है। इसके अलावा चिकित्सा और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी कई चीजों के लिए भी ईरान लंबे समय तक भारत पर निर्भर रहा है।
रूस: 1.43 अरब डॉलर
रूस से ईरान मुख्य रूप से अनाज और धातु का आयात करता है, जो कि वहां बढ़ती महंगाई से निपटने और उद्योगों और रक्षा मामलों के लिए बेहद अहम है।
2. ईरान से सबसे ज्यादा खरीदारी करने वाले देश
आधिकारिक सीमा शुल्क आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 में ईरान ने दुनिया के कम से कम 112 देशों और क्षेत्रों को कुल 56 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया था। पिछले दो दशकों में पश्चिमी प्रतिबंधों के लगातार बढ़ते दबाव के कारण ईरान का निर्यात बाजार यूरोपीय देशों से दूर होकर मुख्य रूप से एशियाई और क्षेत्रीय देशों पर केंद्रित हो गया है। ईरान के कुल निर्यात में चीन की हिस्सेदारी सबसे बड़ी है। चीन ईरान के कुल समुद्री कच्चे तेल के निर्यात का 80% से अधिक हिस्सा खरीदता है।
ये भी पढ़ें: होर्मुज पर ईरान-ओमान की बातचीत:दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की मुलाकात; क्या जहाजों की आवाजाही पर बनी सहमति?
ईरान से सबसे ज्यादा आयात करने वाले देश।
- फोटो : अमर उजाला
मजेदार बात यह है कि 56 अरब के आधिकारिक आंकड़े में वह गुप्त तेल व्यापार शामिल नहीं है, जो ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए शैडो-फ्लीट (गुप्त टैंकरों) के जरिए भारी छूट पर चीन जैसे देशों को भेजता है।
चीन: 14.58 अरब डॉलर
ईरान के कुल समुद्री कच्चे तेल के निर्यात का 80% से अधिक हिस्सा चीन खरीदता है। वहीं, गैर-तेल व्यापार में द्विपक्षीय औद्योगिक और वाणिज्यिक वस्तुएं शामिल हैं। इस आंकड़े में लगभग 31.2 अरब का अघोषित तेल निर्यात शामिल नहीं है जो शैडो फ्लीट टैंकरों के जरिए डिस्काउंट पर खरीदा जाता है।
इराक: 11.70 अरब डॉलर
ईरान की तरफ से इराक के बिजली संयंत्रों के संचालन के लिए भारी मात्रा में गैस और इराक के दक्षिणी प्रांतों के लिए सीधी बिजली भेजी जाती है। इसके अलावा खाद्य उत्पाद, निर्माण और बुनियादी सामग्री और विनिर्मित सामान का एक बड़ा हिस्सा भी ईरान की ओर से इराक को निर्यात होता है।
चीन: 14.58 अरब डॉलर
ईरान के कुल समुद्री कच्चे तेल के निर्यात का 80% से अधिक हिस्सा चीन खरीदता है। वहीं, गैर-तेल व्यापार में द्विपक्षीय औद्योगिक और वाणिज्यिक वस्तुएं शामिल हैं। इस आंकड़े में लगभग 31.2 अरब का अघोषित तेल निर्यात शामिल नहीं है जो शैडो फ्लीट टैंकरों के जरिए डिस्काउंट पर खरीदा जाता है।
इराक: 11.70 अरब डॉलर
ईरान की तरफ से इराक के बिजली संयंत्रों के संचालन के लिए भारी मात्रा में गैस और इराक के दक्षिणी प्रांतों के लिए सीधी बिजली भेजी जाती है। इसके अलावा खाद्य उत्पाद, निर्माण और बुनियादी सामग्री और विनिर्मित सामान का एक बड़ा हिस्सा भी ईरान की ओर से इराक को निर्यात होता है।
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई): 7.16 अरब डॉलर
ईरान के कुल आधिकारिक निर्यात का 13% हिस्सा वित्तीय और पुनर्निर्यात हब के तौर पर संयुक्त अरब अमीरात को जाता है। हालांकि, हाल ही में यूएई ने सुरक्षा कारणों से व्यापार और वित्तीय लेन-देन निलंबित कर दिया है।
तुर्किये: 6.10 अरब डॉलर
तबरीज-अंकारा पाइपलाइन के जरिए तुर्किये, ईरान से भारी मात्रा में गैस का आयात करता है। इसके अलावा पेट्रोकेमिकल्स, निर्माण सामग्री और खाद्य उत्पाद भी तुर्किये को भेजे जाते हैं।
अफगानिस्तान: 2.30 अरब डॉलर
तालिबान के शासन वाला अफगानिस्तान ईंधन, खाद्य उत्पाद और बुनियादी निर्माण सामग्री के लिए ईरान पर निर्भर है। हर तरफ जमीनी सीमा से घिरा होने की वजह से अफगानिस्तान वैश्विक बाजारों तक पहुंच के लिए पूरी तरह ईरानी मार्गों पर निर्भर है।
पाकिस्तान: 2.27 अरब डॉलर
पाकिस्तान मुख्य रूप से सीमावर्ती द्विपक्षीय व्यापार के तहत कृषि उत्पाद और बुनियादी पेट्रोलियम वस्तुओं के लिए ईरान पर निर्भर है। उसके ईंधन आपूर्ति में एक बड़ा हिस्सा ईरान का है।
ईरान के कुल आधिकारिक निर्यात का 13% हिस्सा वित्तीय और पुनर्निर्यात हब के तौर पर संयुक्त अरब अमीरात को जाता है। हालांकि, हाल ही में यूएई ने सुरक्षा कारणों से व्यापार और वित्तीय लेन-देन निलंबित कर दिया है।
तुर्किये: 6.10 अरब डॉलर
तबरीज-अंकारा पाइपलाइन के जरिए तुर्किये, ईरान से भारी मात्रा में गैस का आयात करता है। इसके अलावा पेट्रोकेमिकल्स, निर्माण सामग्री और खाद्य उत्पाद भी तुर्किये को भेजे जाते हैं।
अफगानिस्तान: 2.30 अरब डॉलर
तालिबान के शासन वाला अफगानिस्तान ईंधन, खाद्य उत्पाद और बुनियादी निर्माण सामग्री के लिए ईरान पर निर्भर है। हर तरफ जमीनी सीमा से घिरा होने की वजह से अफगानिस्तान वैश्विक बाजारों तक पहुंच के लिए पूरी तरह ईरानी मार्गों पर निर्भर है।
पाकिस्तान: 2.27 अरब डॉलर
पाकिस्तान मुख्य रूप से सीमावर्ती द्विपक्षीय व्यापार के तहत कृषि उत्पाद और बुनियादी पेट्रोलियम वस्तुओं के लिए ईरान पर निर्भर है। उसके ईंधन आपूर्ति में एक बड़ा हिस्सा ईरान का है।
ईरान को निर्यात करने वाले टॉप-10 देश।
- फोटो : अमर उजाला
भारत: 1.97 अरब डॉलर
भारत ईरान से मुख्य रूप से बिटुमेन (13.8 करोड़ डॉलर), ताजे सेब (4.1 करोड़ डॉलर), बादाम (3.6 करोड़ डॉलर) और खजूर (3.5 करोड़ डॉलर) जैसी वस्तुएं खरीदता है। साल 2026 की शुरुआत में अस्थायी अमेरिकी छूट मिलने के दौरान भारत ने सीमित अवधि के लिए कच्चे तेल का आयात दोबारा शुरू किया था। |
इसके अलावा ईरान की तरफ से ओमान को 1.57 अरब डॉलर के उपभोक्ता सामान और वित्तीय बैंकिंग चैनलों के लिए एक बड़ी राशि देता है। वहीं, रूस 1.05 अरब डॉलर औद्योगिक व रणनीतिक सामान के लिए ईरान पर निर्भर है। उधर अजरबैजान क्षेत्रीय गलियारों से जुड़े बुनियादी व्यापार और द्विपक्षीय वाणिज्यिक वस्तुओं के लिए ईरान से जरूरी उत्पाद आयात करता है।
अमेरिका की ईरान पर बढ़ती सख्ती और हालिया वैश्विक व्यापारिक बदलाव भारत को कई स्तरों पर सीधे और गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं...
इस अभियान के तहत अमेरिका ने भारत की चार कंपनियों और कुछ नागरिकों को अपनी विशेष वर्गीकृत देशों (एसडीएन) की सूची में डाल दिया है। इन पर ईरान से पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल उत्पादों के अवैध परिवहन और विपणन में शामिल होने का आरोप है।
भारत ईरान से मुख्य रूप से बिटुमेन (13.8 करोड़ डॉलर), ताजे सेब (4.1 करोड़ डॉलर), बादाम (3.6 करोड़ डॉलर) और खजूर (3.5 करोड़ डॉलर) जैसी वस्तुएं खरीदता है। साल 2026 की शुरुआत में अस्थायी अमेरिकी छूट मिलने के दौरान भारत ने सीमित अवधि के लिए कच्चे तेल का आयात दोबारा शुरू किया था। |
इसके अलावा ईरान की तरफ से ओमान को 1.57 अरब डॉलर के उपभोक्ता सामान और वित्तीय बैंकिंग चैनलों के लिए एक बड़ी राशि देता है। वहीं, रूस 1.05 अरब डॉलर औद्योगिक व रणनीतिक सामान के लिए ईरान पर निर्भर है। उधर अजरबैजान क्षेत्रीय गलियारों से जुड़े बुनियादी व्यापार और द्विपक्षीय वाणिज्यिक वस्तुओं के लिए ईरान से जरूरी उत्पाद आयात करता है।
भारत को किस तरह प्रभावित कर सकती है अमेरिकी की ईरान पर बढ़ती सख्ती?
अमेरिका की ईरान पर बढ़ती सख्ती और हालिया वैश्विक व्यापारिक बदलाव भारत को कई स्तरों पर सीधे और गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं...
1. भारतीय कंपनियों और नागरिकों पर सीधे अमेरिकी प्रतिबंध
इस अभियान के तहत अमेरिका ने भारत की चार कंपनियों और कुछ नागरिकों को अपनी विशेष वर्गीकृत देशों (एसडीएन) की सूची में डाल दिया है। इन पर ईरान से पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल उत्पादों के अवैध परिवहन और विपणन में शामिल होने का आरोप है।
सदाशिव ओवरसीज लिमिटेड: दावा है कि इस कंपनी ने लगभग 6.9 करोड़ डॉलर कीमत के ईरानी पेट्रोलियम उत्पादों का आयात किया।
पोर्टईज पार्टनर्स एलएलपी: इसके भारतीय भागीदारों (इदरीसमिया अशरफमिया शेख और हरीश रामचंद्र रंगी) के साथ इसे भी प्रतिबंधित किया गया है।
पीपी सॉफ्टटेक प्राइवेट लिमिटेड: इसके निदेशक प्रशांत गर्ग के साथ इसे प्रतिबंधित किया गया है।
प्राकृतीस इंफ्रा इम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड: इस पर लगभग 2.5 करोड़ डॉलर के ऊर्जा उत्पादों के आयात का आरोप है।
इन प्रतिबंधों के कारण इन कंपनियों की अमेरिकी संपत्तियां फ्रीज हो गई हैं और डॉलर-मूल्यवर्ग वित्तीय प्रणाली तक इनकी पहुंच बंद हो गई है।
भारत-ईरान द्विपक्षीय व्यापार पहले ही 2018-19 के 17 अरब डॉलर के शिखर से 90% से अधिक घटकर 2025-26 तक लगभग 1.6 अरब डॉलर रह गया था। अब इस बचे हुए व्यापार पर भी गहरा संकट मंडरा रहा है। नए प्रतिबंधों से बासमती चावल और चाय का निर्यात बाधित होने की आशंका है।
पोर्टईज पार्टनर्स एलएलपी: इसके भारतीय भागीदारों (इदरीसमिया अशरफमिया शेख और हरीश रामचंद्र रंगी) के साथ इसे भी प्रतिबंधित किया गया है।
पीपी सॉफ्टटेक प्राइवेट लिमिटेड: इसके निदेशक प्रशांत गर्ग के साथ इसे प्रतिबंधित किया गया है।
प्राकृतीस इंफ्रा इम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड: इस पर लगभग 2.5 करोड़ डॉलर के ऊर्जा उत्पादों के आयात का आरोप है।
इन प्रतिबंधों के कारण इन कंपनियों की अमेरिकी संपत्तियां फ्रीज हो गई हैं और डॉलर-मूल्यवर्ग वित्तीय प्रणाली तक इनकी पहुंच बंद हो गई है।
2. कृषि और फार्मास्युटिकल निर्यात पर भारी संकट
भारत-ईरान द्विपक्षीय व्यापार पहले ही 2018-19 के 17 अरब डॉलर के शिखर से 90% से अधिक घटकर 2025-26 तक लगभग 1.6 अरब डॉलर रह गया था। अब इस बचे हुए व्यापार पर भी गहरा संकट मंडरा रहा है। नए प्रतिबंधों से बासमती चावल और चाय का निर्यात बाधित होने की आशंका है।
इसके अलावा भारत और ईरान के बीच सीधे बैंकिंग चैनल न होने के कारण भारतीय निर्यातक यूएई (दुबई) के व्यापारियों के जरिए भुगतान हासिल करते थे। लेकिन यूएई की तरफ से ईरान के साथ व्यापार पूरी तरह निलंबित किए जाने से यह प्रमुख भुगतान मार्ग ठप हो गया है।
वहीं, भारत अतीत में खरीदे गए तेल के बदले जमा किया गया रुपया भंडार (यूको बैंक में) अब लगभग समाप्त हो चुका है। भारत की ओर से ईरान से कच्चे तेल की नियमित खरीद न करने की वजह से ईरानी खरीदारों के पास भारतीय सामानों के भुगतान के लिए रुपये की लिक्विडिटी भी नहीं बची है।
भारत के रणनीतिक और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी बढ़ाने की कोशिशों पर भी अमेरिका के प्रतिबंधों का सीधा असर पड़ेगा।
चाबहार बंदरगाह: मई 2024 में भारत के आईपीजीएल ने चाबहार के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन के लिए 10 साल का ऐतिहासिक समझौता किया था। हालांकि, इसे अमेरिकी प्रतिबंधों से कुछ मानवीय छूट प्राप्त थी, लेकिन नई सख्ती के कारण भारत को वहां गेंट्री क्रेन और अन्य भारी बंदरगाह मशीनरी खरीदने में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। वैश्विक आपूर्तिकर्ता और बैंक चाबहार से जुड़े वित्तीय लेनदेन से कतरा रहे हैं।
इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी): मुंबई से सेंट पीटर्सबर्ग को जोड़ने वाले इस 7,200 किमी लंबे मार्ग के विकास, जैसे ईरान में रश्त-अस्तारा रेलवे लिंक के वित्तपोषण पर अमेरिकी निगरानी के कारण काम धीमा हो सकता है।
वहीं, भारत अतीत में खरीदे गए तेल के बदले जमा किया गया रुपया भंडार (यूको बैंक में) अब लगभग समाप्त हो चुका है। भारत की ओर से ईरान से कच्चे तेल की नियमित खरीद न करने की वजह से ईरानी खरीदारों के पास भारतीय सामानों के भुगतान के लिए रुपये की लिक्विडिटी भी नहीं बची है।
3. चाबहार बंदरगाह और आईएनएसटीसी कनेक्टिविटी परियोजनाओं में रुकावट
भारत के रणनीतिक और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी बढ़ाने की कोशिशों पर भी अमेरिका के प्रतिबंधों का सीधा असर पड़ेगा।
चाबहार बंदरगाह: मई 2024 में भारत के आईपीजीएल ने चाबहार के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन के लिए 10 साल का ऐतिहासिक समझौता किया था। हालांकि, इसे अमेरिकी प्रतिबंधों से कुछ मानवीय छूट प्राप्त थी, लेकिन नई सख्ती के कारण भारत को वहां गेंट्री क्रेन और अन्य भारी बंदरगाह मशीनरी खरीदने में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। वैश्विक आपूर्तिकर्ता और बैंक चाबहार से जुड़े वित्तीय लेनदेन से कतरा रहे हैं।
इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी): मुंबई से सेंट पीटर्सबर्ग को जोड़ने वाले इस 7,200 किमी लंबे मार्ग के विकास, जैसे ईरान में रश्त-अस्तारा रेलवे लिंक के वित्तपोषण पर अमेरिकी निगरानी के कारण काम धीमा हो सकता है।
4. होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों का संकट
अमेरिकी वित्त विभाग ने वैश्विक जहाजों को सख्त चेतावनी दी है कि वे होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान को किसी भी तरह का टोल या बीमा प्रीमियम का भुगतान न करें, क्योंकि ऐसा करना अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन होगा। यह भारत के लिए एक बड़ा संकट है, क्योंकि भारत का लगभग 40% कच्चा तेल आयात और व्यापक कंटेनर व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है।- अगर भारतीय जहाज ईरान को टोल देने से मना करते हैं, तो उन्हें ईरानी नौसेना (आईआरजीसी) की ओर से रोके जाने या हिरासत में लिए जाने का जोखिम है।
- अगर वे पारगमन सुनिश्चित करने के लिए भुगतान करते हैं, तो वे अमेरिकी प्रतिबंधों की चपेट में आ सकते हैं और अपनी वैश्विक बीमा सुरक्षा खो सकते हैं।