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अग्निपरीक्षा: योगी आदित्यनाथ के सामने हैं ये बड़ी चुनौतियां, किनसे पाएंगे पार, कौन बन सकता है राह का कांटा

Fri, 06 Aug 2021 11:09 PM IST
गौरव पाण्डेय अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली Published by: गौरव पाण्डेय Updated Fri, 06 Aug 2021 11:09 PM IST
सार

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने कामकाज से बेहद सख्त प्रशासक की छवि बनाई है। इसका उन्हें लाभ भी मिल रहा है लेकिन कुछ लोग उनसे नाराज भी हैं।

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challenges Yogi Adityanath facing before upcoming Assembly Election of Uttar Pradesh complete analysis in Hindi
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

योगी आदित्यनाथ ने पिछले साढ़े चार साल के कामकाज से अपनी बेहद सख्त प्रशासक की छवि बनाई है। विकास के अनेक कार्य करते हुए वे अपराधियों-आतंकियों के विरुद्ध बेहद कड़ी कार्रवाई करते रहे हैं। इसका उन्हें अच्छा लाभ भी मिला है और उनके प्रशंसक उनकी इस छवि को ही उनकी सबसे मजबूत ताकत भी मानते हैं। हालांकि, उनकी कार्यशैली ने समाज के कई वर्गों में उनके आलोचक भी तैयार कर दिए हैं जो चुनाव में नुकसान पहुंचा सकते हैं। अगर योगी को दोबारा उत्तर प्रदेश की सत्ता संभालनी है तो उन्हें इनसे पार पाना ही होगा।

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पार्टी कार्यकर्ताओं की नाराजगी
योगी आदित्यनाथ की सरकार पर सबसे बड़ा सवाल उनकी पार्टी के कार्यकर्ता ही उठाते रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री अधिकारियों की बात ज्यादा सुनते हैं। हमारी अपनी सरकार होते हुए भी हम अपने ही कामकाज नहीं करवा पाते हैं। ऐसे में दूसरे समर्थकों के कामकाज कराने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। कुछ कार्यकर्ताओं का तो यहां तक कहना है कि स्थिति ये है कि दूसरी पार्टी के कार्यकर्ताओं के कामकाज हो जाते हैं, लेकिन भाजपा कार्यकर्ता होने के कारण हमारे अपने कामकाज नहीं किए जाते हैं।
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पार्टी कार्यकर्ताओं की असंतुष्टि की शिकायत पार्टी के केंद्रीय आलाकमान तक भी पहुंचाई गई थी। आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) ने अपने स्तर पर भी यह पाया था कि अपने ही लोगों के कोई कामकाज सरकार में नहीं हो पा रहे हैं जिससे कार्यकर्ताओं में असंतुष्टि बढ़ रही है। इस असंतोष को संभालने के लिए केंद्रीय स्तर से भी निर्देश दिए गए थे कि कार्यकर्ताओं के सही कामकाज को कराने से न रोका जाए। लेकिन कथित तौर पर इस निर्देश के बाद भी कार्यप्रणाली में कोई सुधार नहीं हुआ और सरकार में कामकाज का तरीका वही बना रहा।

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मंत्रिमंडल के सहयोगियों का साथ

उत्तर प्रदेश सरकार ने संतुलन साधने के लिए हर वर्ग के लोगों की भागीदारी को बढ़ाने का काम किया है। ओबीसी और एससी/एसटी समुदाय के लोगों की भागीदारी बढ़ाकर हर वर्ग को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की गई है। आगामी मंत्रिमंडल विस्तार में इसे और धार देने की कोशिश की जा सकती है। लेकिन बताया जा रहा है कि सरकार का यह फॉर्मूला बहुत कारगर साबित नहीं होने वाला है। 

इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण यह है कि ओबीसी समुदाय के मंत्री अपने वर्ग को ज्यादा मजबूती के साथ राज्य के मंत्रिमंडल में देखना चाहते हैं। इसके साथ ही कई मंत्री केशव प्रसाद मौर्य को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट न किए जाने से असंतुष्ट हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में उपयुक्त समीकरण न बन पाने पर इस वर्ग की नाराजगी सामने आ सकती है, जो योगी आदित्यनाथ सरकार पर भारी पड़ सकती है।

ब्राह्मण वर्ग की राज्य सरकार से नाराजगी

उत्तर प्रदेश में 15 फीसदी वोट बैंक वाले ब्राह्मण समुदाय की राज्य की भाजपा सरकार से नाराजगी जारी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में एक ब्राह्मण मंत्री बढ़ाकर इस वर्ग की नाराजगी को कम किए जाने की कोशिशें की गई थीं, और आगामी मंत्रिमंडल विस्तार में भी ब्राह्मणों की भागीदारी बढ़ाने की संभावना है, लेकिन कथित तौर पर इसका अभी भी कोई सकारात्मक असर नहीं देखने को मिला है। साथ ही, इस वर्ग की नाराजगी भाजपा के सामने मुश्किलें खड़ी कर सकती है क्योंकि यह वर्ग भाजपा और योगी आदित्यनाथ का कोर सपोर्टर वोटर वर्ग रहा है।

मेडिकल में ओबीसी आरक्षण को मंजूरी

केंद्र सरकार ने मेडिकल कोटे में ओबीसी आरक्षण को मान्यता दे दी है। भाजपा ने यह दांव उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ओबीसी समुदाय के वोटरों को ध्यान में रखते हुए ही लिया है। लेकिन, आशंका है कि भाजपा का यह दांव उत्तर प्रदेश में ही उलटा पड़ सकता है। अनेक सवर्ण संगठन मेडिकल में भी ओबीसी आरक्षण लागू करने के विरोध में हैं। राज्य सरकार को इसका भी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

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