CAPF: केंद्र में IPS डेपुटेशन प्रक्रियात्मक छूट से संस्थागत विशेषाधिकार में तबदील, अफसरों को नहीं मिला 'जवाब'
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केंद्र सरकार में आईपीएस प्रतिनियुक्ति को लेकर 'अर्धसैनिक' बलों के कैडर अफसरों को एक सवाल का जवाब नहीं मिल रहा है। वो सवाल है कि क्या आईपीएस प्रतिनियुक्ति (केंद्र में) प्रक्रियात्मक छूट से संस्थागत विशेषाधिकार में तबदील हो गई है। मौजूदा समय में जब सीएपीएफ में आईपीएस अफसरों की प्रतिनियुक्ति, कैडर अधिकारियों के लिए ओजीएएस व एनएफएफयू का केस, सर्वोच्च अदालत में है, तब हर सीएपीएफ अधिकारी इस सवाल का जवाब मिलने के इंतजार में है। आईटीबीपी के कमांडेंट (सेवानिवृत्त), तरुण कुमार जो 'ओजीएएस' मामले में सर्वोच्च अदालत में मुख्य याचिकाकर्ता भी हैं, ने कहा है कि गृह मंत्रालय ने कभी सार्वजनिक रूप से उक्त सवाल का जवाब नहीं दिया है।
यूपीएससी से पूर्व परामर्श लेना अनिवार्य
बतौर तरुण कुमार, यदि भारत का संविधान किसी राज्य सरकार के अधिकारी को केंद्र सरकार में ग्रुप 'ए' पद पर नियुक्त करने से पहले संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) से परामर्श लेना अनिवार्य करता है, तो आईपीएस अधिकारियों को हर साल बिना परामर्श के सीएपीएफ में वरिष्ठ पदों पर क्यों तैनात किया जा रहा है। आईपीएस, एक अखिल भारतीय सेवा है, जिसके अधिकारी राज्य कैडर में तैनात होते हैं। उन्हीं के अधीन सेवा करते हैं। जब वे प्रतिनियुक्ति पर केंद्रीय संगठनों, जिनमें सीएपीएफ भी शामिल हैं, में आते हैं, तो कानून के अनुसार वे राज्य सरकार के अधिकारी होते हैं। उन्हें केंद्र सरकार के ग्रुप 'ए' पदों पर नियुक्त किया जाता है। नियमानुसार, इसके लिए यूपीएससी से पूर्व परामर्श लेना अनिवार्य है। ये अलग बात है कि दशकों से ऐसा नहीं हो रहा। सीएपीएफ में आईपीएस की प्रतिनियुक्ति, गृह मंत्रालय की आंतरिक चयन प्रक्रिया, 'केंद्रीय पुलिस स्थापना बोर्ड' द्वारा नियंत्रित होती है। इसकी प्रक्रियाएं अप्रैल 2000 में जारी एक कार्यालय ज्ञापन पर आधारित हैं, जो ओजीएएस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्णय लिए जाने से बहुत पहले का है।
ओजीएएस की लड़ाई, दोहरी जीत भी अधूरी
'ओजीएएस' मामले में सर्वोच्च अदालत में मुख्य याचिकाकर्ता के मुताबिक, यह कोई मामूली प्रक्रियात्मक खामी नहीं है। यह भारत के आंतरिक सुरक्षा प्रशासन में अंतर्निहित एक संरचनात्मक असमानता है। ओजीएएस की लड़ाई, सर्वोच्च न्यायालय की दोहरी जीत के बाद भी अधूरी क्यों है, इसके लिए कई बातों को जानना जरुरी है। संविधान के अनुच्छेद 320 में स्पष्ट है कि सिविल सेवाओं/पदों पर भर्ती की विधि, नियुक्तियां करते समय अपनाए जाने वाले सिद्धांतों व उम्मीदवारों की उपयुक्तता से संबंधित सभी मामलों पर यूपीएससी से परामर्श किया जाएगा। यह एक सलाहकारी भूमिका नहीं है, बल्कि एक संवैधानिक कर्तव्य है। संविधान निर्माताओं ने को यूपीएससी को एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय के रूप में इसलिए बनाया, ताकि सिविल सेवा नियुक्तियों को कार्यपालिका के विवेकाधिकार और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखा जा सके। यह सुनिश्चित करने के लिए कि किसे कौन सा पद मिले, ये योग्यता और पारदर्शी चयन द्वारा निर्धारित हो, न कि किसी एक मंत्रालय की प्राथमिकताओं द्वारा।
यूपीएससी की भूमिका हो रही नजरअंदाज
डीओपीटी के अपने समेकित प्रतिनियुक्ति दिशानिर्देश, यूपीएससी की प्रकाशित प्रक्रियाओं के साथ मिलकर, इस बात को स्पष्ट करते हैं कि जब विचार क्षेत्र में केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकार के अधिकारी भी शामिल हों, तो राज्य सरकार के अधिकारी की नियुक्ति से पहले आयोग से पूर्व परामर्श लेना आवश्यक है। सीएपीएफ में प्रतिनियुक्ति के लिए आईपीएस अधिकारियों का चयन गृह मंत्रालय के पूर्णतः आंतरिक तंत्र के अंतर्गत होता है। गृह सचिव की अध्यक्षता में गठित और गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से युक्त केंद्रीय पुलिस स्थापना बोर्ड (सीपीईबी), आईपीएस अधिकारियों की उपयुक्तता का आकलन करता है। इसके बाद ही सिफारिशें, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट नियुक्ति समिति (एसीसी) को अंतिम स्वीकृति के लिए भेजी जाती हैं। इस प्रक्रिया में यूपीएससी की कोई भूमिका नहीं है। किसी संवैधानिक निकाय द्वारा योग्यता की कोई स्वतंत्र परीक्षा नहीं होती। कोई पारदर्शी और सार्वजनिक रूप से जवाबदेह चयन प्रक्रिया नहीं है। चयन से लेकर अंतिम नियुक्ति तक की पूरी प्रक्रिया गृह मंत्रालय के भीतर ही संचालित होती है। यही मंत्रालय, जो आईपीएस कैडर को नियंत्रित करता है और सीएपीएफ पर आईपीएस का नियंत्रण बनाए रखने में संरचनात्मक हित रखता है।
पच्चीस वर्ष पहले जारी हुआ कार्यालय ज्ञापन
तरुण कुमार के अनुसार, इस प्रक्रिया का अधिकार मुख्य रूप से गृह मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन संख्या I.21023/21/97-IPS.III से मिलता है, जो अप्रैल 2000 में जारी किया गया था। यह केंद्रीय संगठनों में आईपीएस अधिकारियों के चयन और नियुक्ति के लिए प्रतिनियुक्ति नीति और प्रक्रिया से संबंधित एक दस्तावेज है। यह एकल आदेश - जो पच्चीस वर्ष पहले जारी किया गया था, बिना किसी नए यूपीएससी परामर्श के, उस समय जब सीएपीएफ की ओजीएएस स्थिति पर कोई विवाद नहीं हुआ था। तब से हजारों आईपीएस की कमांड पदों पर नियुक्तियों के लिए प्रक्रियात्मक आधार के रूप में कार्य करता रहा है। इन्हें अब सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्ण रूप से गठित संगठित समूह 'ए' सेवाओं के रूप में मान्यता दी है। फरवरी 2022 में, गृह मंत्रालय की संशोधित कार्यकाल नीति में कहा गया कि कम से कम 14 वर्षों के अनुभव वाले आईपीएस अधिकारी, अनिवार्य पैनल में शामिल हुए बिना डीआईजी स्तर की प्रतिनियुक्ति के पात्र होंगे। वजह, सीएपीएफ में आईपीएस डीआईजी स्तर पर लंबे समय से रिक्त पड़े पदों को भरना था। इसके बाद सीएपीएफ में डीआईजी स्तर के पदों को केवल वर्षों के अनुभव के आधार पर आईपीएस अधिकारियों द्वारा भरा जा सकता था, न कि उस बल की विशिष्ट परिचालन मांगों के लिए उनकी उपयुक्तता के किसी संरचित मूल्यांकन द्वारा, जिसकी वे कमान संभालेंगे।
भर्ती नियमों की समस्या
अंतर्निहित कोटा की वैधता, सीएपीएफ भर्ती नियमों में आईपीएस प्रतिनियुक्ति कोटा सीधे तौर पर शामिल है। वर्तमान में डीआईजी स्तर पर 20-25 प्रतिशत, आईजी स्तर पर 50 प्रतिशत और एडीजी स्तर पर 75 प्रतिशत आईपीएस कोटा तय है। ये भर्ती नियम, यूपीएससी के साथ परामर्श करके बनाए गए थे, जैसा कि अनुच्छेद 320 और यूपीएससी (परामर्श से छूट) विनियम, 1958 के अनुसार आवश्यक है। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है जिसे लगातार अनदेखा किया जाता है। भर्ती नियमों पर यूपीएससी से परामर्श किया गया था कि पदों का एक निश्चित प्रतिशत, प्रतिनियुक्ति पर आईपीएस अधिकारियों द्वारा भरा जाएगा। उस ढांचे के तहत व्यक्तिगत चयन पर यूपीएससी से कभी परामर्श नहीं किया गया। इस मामले में यूपीएससी के स्वयं के दिशानिर्देश स्पष्ट हैं, 'भर्ती नियमों में निर्धारित अवधि से आगे डेपुटेशन नियुक्ति के विस्तार के लिए उन सभी मामलों में यूपीएससी से परामर्श आवश्यक है, जहां संबंधित भर्ती नियम, आयोग के परामर्श से तैयार किए गए थे। यदि विस्तार के लिए भी यूपीएससी की सहमति आवश्यक है, तो राज्य कैडर के अधिकारियों को शामिल करने वाली मूल नियुक्ति के लिए तो निश्चित रूप से इसकी आवश्यकता होती है। गृह मंत्रालय ने भर्ती नियमों के ढांचे पर परामर्श को संवैधानिक दायित्व का एक बार का निर्वहन मान लिया है। यह संवैधानिक दायित्व नहीं है।
ओजीएएस विवाद के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है
सर्वोच्च न्यायालय के 23 मई, 2025 के फैसले और अक्टूबर 2025 में सरकार की पुनर्विचार याचिका को खारिज करने के दौरान यह निर्देश दिया गया था कि दो वर्षों के भीतर आईपीएस प्रतिनियुक्ति को एसएजी स्तर तक क्रमिक रूप से कम किया जाए। छह महीनों के भीतर सभी सीएपीएफ में कैडर समीक्षा हो। ओजीएएस स्थिति के अनुरूप भर्ती नियमों में संशोधन किया जाए। सरकार ने इनमें से कुछ भी नहीं किया है। वह सेवा नियमों में कोई संशोधन अधिसूचित किए बिना, कोई कैडर समीक्षा पूरी किए बिना और व्यक्तिगत चयन प्रक्रिया में यूपीएससी की भागीदारी के बिना, आईपीएस को सीएपीएफ के वरिष्ठ पदों पर नियुक्त करना जारी रखे हुए है। यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन है।
सुधार के लिए दिए ये सुझाव
सीएपीएफ में प्रतिनियुक्ति पद पर आईपीएस अधिकारी की प्रत्येक भावी नियुक्ति अनुच्छेद 320 और विभाग के स्वयं के प्रतिनियुक्ति दिशानिर्देशों के अनुसार यूपीएससी के माध्यम से हो। 2022 के उस संशोधन को रद्द किया जाना चाहिए, जिसमें अनिवार्य डीआईजी-स्तरीय पैनल में शामिल होने की आवश्यकता को समाप्त कर दिया गया था। सीएपीएफ में आईपीएस प्रतिनियुक्ति पदों के लिए रिक्तियां परिपत्र उसी तरह सार्वजनिक रूप से जारी किए जाने चाहिए, जैसे किसी अन्य समूह 'ए' प्रतिनियुक्ति पद के लिए रिक्ति परिपत्र जारी किए जाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के परिणामस्वरूप जारी किसी भी राजपत्र अधिसूचना या वैधानिक दस्तावेज के भाग के रूप में, सीएपीएफ प्रतिनियुक्ति पदों के लिए भर्ती नियमों में संशोधन किया जाना चाहिए। इसके जरिए व्यक्तिगत चयन के लिए यूपीएससी परामर्श को स्पष्ट रूप से अनिवार्य किया जा सकेगा। प्रत्येक सीएपीएफ अधिकारी जो पदोन्नति या प्रतिनियुक्ति के लिए यूपीएससी चयन समिति के समक्ष योग्यता के आधार पर, एक खुली प्रक्रिया में, एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय के समक्ष प्रतिस्पर्धा करता है, उसे यह जानने का अधिकार है कि आईपीएस से प्रतिनियुक्ति द्वारा उनसे ऊपर नियुक्त अधिकारियों को भी उसी मानक पर परखा गया था। हालांकि वर्तमान में, ऐसा नहीं है।