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Budget 2018: ‘ईज ऑफ लिविंग’ की परिकल्पना की जमीनी हकीकत

Thu, 01 Feb 2018 07:04 PM IST
 अतुल सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली
 अतुल सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 01 Feb 2018 07:04 PM IST
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Budget 2018: PM Modi government's Aam Budget is not truth about idea of living Hypothesis
वित्त मंत्री अरुण जेटली - फोटो : अमर उजाला

एक तरफ राजस्थान के उपचुनाव में तीनों सीटों पर भाजपा की करारी हार तो दूसरी तरफ आम बजट में मध्यवर्ग और नौकरीपेशा को राहत न दिए जाने से लोगों की नाराजगी। एक्साइज ड्यूटी घटने से पेट्रोल डीजल की कीमत पहले 2 रुपये कम करने का ऐलान फिर अगले ही पल सेस बढ़ाने से तेल की कीमतें जस की तस। स्वास्थ्य बीमा के नाम पर 50 करोड़ गरीबों को अस्पताल में भर्ती होने पर 5 लाख तक के मुफ्त इलाज का ऐलान तो दूसरी तरफ देश में गरीबों की जनसंख्या के आंकड़ों को लेकर असमंजस। खेल दिलचस्प है।

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एक आंकड़ा देखिए। देश में गरीबों की जनसंख्या और गरीबी रेखा की सीमा को लेकर सरकार ने पहले सुरेश तेंदुलकर कमेटी बनाई, फिर रंगराजन कमेटी बनी। गरीब दो श्रेणियों में बांटे गए – ग्रामीण और शहरी। तेंदुलकर के हिसाब से शहरी गरीब 1000 रुपये मासिक कमाने वाले और ग्रामीण गरीब 816 रुपये मासिक कमाने वाले थे तो रंगराजन ने शहरी गरीब 1407 रुपये कमाने वाले को और ग्रामीण गरीब 972 रुपये कमाने वाले को माना।
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 रंगराजन ने 2014 की अपनी रिपोर्ट में 30 फीसदी गरीब बताए तो 2012 तक तेंदुलकर की रिपोर्ट में ये 29 फीसदी बताए गए थे। अब तो मोदी राज में गरीबों के लिए इतनी योजनाएं बनीं तो बेशक ये आंकड़े कम हुए होंगे। अगर 2014 को ही मानें तो भी देश में गरीब केवल 36 करोड़ ही हैं लेकिन इस बजट में 50 करोड़ गरीबों को फायदा पहुंचाने का दावा किया जा रहा है।

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किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करने का वादा किया गया

Budget 2018: PM Modi government's Aam Budget is not truth about idea of living Hypothesis
budget 2018 - फोटो : पीटीआई
​एक और तस्वीर देखिए। किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करने का वादा किया गया है। उनकी फसलों का समर्थन मूल्य डेढ़ गुणा करने की बात कही गई है। आलू, प्याज, टमाटर पर खास जोर दिया गया है। तीन साल से देश में आलू सड़ रहा है, प्याज़ सड़कों पर फेंके जाते रहे हैं और टमाटर या तो सड़ जाता है या इसकी कीमत आसमान छूती है। ऐसे में किसानों को उनकी फसलों की उचित कीमत दिलाने के दावे कितने कारगर होंगे। 

पहले किसानों की कर्जमाफी की बात कही गई थी, फिर फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की बात कही गई लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और निकली। अब भी हर साल साढ़े बारह हजार किसान आत्महत्या कर रहे हैं। गुजरात चुनाव के दौरान किसानों की सबसे ज्यादा नाराजगी इन्हीं सवालों पर नजर आई थी। ऐसे में ये घोषणाएं और 2022 के सपने किसानों को कितना लुभाएंगे, ये आने वाले चुनावों के दौरान देखने वाली बात होगी।

सफाई पर गौर कीजिए तो 2 करोड़ नए शौचालय बनाने की बात की गई है। अभी तक जितने शौचालय बने हैं उसकी हालत पर कई रिपोर्ट आ चुकी है। बगैर सैनिटेशन की सही व्यवस्था के सिर्फ ढांचा खड़ाकर देने से जो शौचालय बनाए जाते हैं और उसकी जो दुर्दशा सामने आती है, उससे गांवों में और बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ा है। शायद इसीलिए सरकार ने स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत 50 करोड़ लोगों को फायदा पहुंचाने की बात कही है। 

जाहिर है इसका सीधा फायदा बीमा कंपनियों को होने वाला है। सरकार इसे गरीबों और किसानों का बजट जरूर कह रही है लेकिन तमाम किसान नेता इसे किसान विरोधी मान रहे हैं। दूसरी तरफ 99 शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए 2 लाख करोड़ रुपये देने और 1 करोड़ 10 लाख नए मकान बनाने के वादे भी कम लुभावने नहीं हैं। लेकिन चार सालों में आए ‘अच्छे दिनों’ की जमानी हकीकत देखने के बाद ‘ईज ऑफ लिविंग’ की यह परिकल्पना जल्दी लोगों के गले नहीं उतर रही।
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