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झारखंड: राज्यों में भाजपा की 'जादुई' छड़ी बेअसर, एक साल में गंवाया 5वां राज्य

Tue, 24 Dec 2019 05:23 AM IST
आसिम खान शरद गुप्ता/हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली
शरद गुप्ता/हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली Published by: आसिम खान Updated Tue, 24 Dec 2019 05:23 AM IST
सार

  • राज्यों में हार का मिथक नहीं तोड़ पा रही भाजपा
  • एक साल में झारखंड के रूप में गंवाया 5वां राज्य
  • फ्री हैंड मिलने के बावजूद अपना कद नहीं बढ़ा पा रहे क्षत्रप
  • राष्ट्रवादी एजेंडे के बावजूद मिल रही हार से सकते में पार्टी

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BJP lost 5th state in one year as Jharkhand, Hemant Soren will next CM in place of Raghubar Das
हेमंत सोरेन और रघुवर दास (फाइल फोटो)

विस्तार

एक के बाद एक बड़ी चुनावी सफलता है हासिल कर चुनावी चाणक्य का खिताब पाने वाले अमित शाह की जादुई छड़ी मानों कहीं खो गई है। खासतौर पर विधानसभा चुनावों में। झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार इसी कड़ी का एक हिस्सा है। झारखंड में भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह, कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा और सभी प्रमुख भाजपा नेताओं की रैलियां आयोजित कीं। अंतिम दो चरणों में प्रधानमंत्री ने जमकर प्रचार किया और अपने नाम पर वोट मांगे। 

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पन्ना प्रमुख, बूथ मैनेजमेंट से लेकर सोशल मीडिया तक का सहारा लिया गया। केंद्र और राज्य की डबल इंजन की सरकारों की उपलब्धियों का जमकर प्रचार किया गया। इसके बावजूद पिछली बार के मुकाबले पार्टी 12 सीटें कम जीती और बहुमत से दूर रह गई। झारखंड वह राज्य है जहां अभी 6 महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में उसे 14 में से 12 सीटों पर विजय मिली थी। अधिकतर लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवारों को 40 से 50 प्रतिशत तक वोट मिले। फिर आखिर कमी कहां रह गई कि उसके प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री दोनों ही जीत से वंचित रह गए।
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क्या भाजपा अति आत्मविश्वास का शिकार हुई? क्या आजसू के साथ गठबंधन न करना उसे महंगा पड़ा? या एक गैर आदिवासी को झारखंड का मुख्यमंत्री बनाने का प्रयोग उल्टा पड़ा? या फिर विधायकों और राज्य सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी पीएम मोदी की लोकप्रियता पर भारी पड़ी? या झामुमो और कांग्रेस का गठबंधन ज्यादा मजबूत साबित हुआ? या फिर पिछले 40 वर्षों से पार्टी के साथ रहे वरिष्ठ नेता सरयू राय का टिकट काटना उसे भारी पड़ा? अगले एक-डेढ़ महीने के अंदर होने वाले दिल्ली चुनाव और उसके बाद होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव से पहले उसे इन सवालों के जवाब ढूंढ लेने पड़ेंगे।
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आखिर इसी रणनीति के सहारे शाह ने 2014 में भाजपा को 282 सीटें दिलाई और पिछले लोकसभा चुनाव में 303 सीटें। इनके अलावा 403 सीटों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा में 2017 में उन्होंने भाजपा के गठबंधन को 325 सीटें दिलाईं। लेकिन उसके बाद शाह के चुनावी कौशल के बावजूद अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा के अलावा भाजपा एक के बाद एक सभी विधानसभा चुनाव हारती चली गई। झारखंड के नतीजे इस मायने में आश्चर्यजनक नहीं कहे जा सकते।

दूसरों के दम पर राज
इस दौरान यदि पार्टी ने बिहार, कर्नाटक, हरियाणा, मिजोरम, मेघालय, मणिपुर, नागालैंड, गोवा आदि राज्यों में सरकार बनाई तो जोड़ तोड़ के दम पर।

मौके पर मारा चौका
बिहार में नीतीश कुमार ने यदि राष्ट्रीय जनता दल का साथ न छोड़ा होता तो भाजपा की सरकार नहीं बनती। इसी तरह कर्नाटक में भाजपा को जनता दल सेकुलर और कांग्रेस की फूट का लाभ उठाते हुए सरकार बनाने का मौका मिला। हरियाणा में भी पार्टी बहुमत से दूर रह गई लेकिन दुष्यंत चौटाला के समर्थन से उसने सरकार बनाई।

कम हैं फिर भी दम है
यही हाल मेघालय मणिपुर और नागालैंड में हुआ जहां पार्टी क्रमश: 2, 21 और 12 सीटें जीतने के बावजूद सहयोगी दलों की मदद से सरकार बनाने में कामयाब हुई। इसी तरह गोवा की 40 में से 13 सीटें  जीतने के बावजूद सरकार भाजपा ने बनाई।

भाजपा ने एक साल में गंवाया 5वां राज्य

लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने महाराष्ट्र के बाद झारखंड की सत्ता भी गंवा दी है। हरियाणा में किसी प्रकार सत्ता बचाने में कामयाब रही भाजपा को बीते एक साल में 5 राज्यों (इससे पहले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान) की सत्ता गंवानी पड़ी है। संदेश साफ है। पार्टी राज्यों में हार का मिथक तोडने में कामयाब नहीं हो पा रही। वह भी तब जब पार्टी और मोदी सरकार एक के बाद एक राष्ट्रवादी एजेंडे को अमली जामा पहना रही है। जाहिर है कि झारखंड के निराशाजनक नतीजे के बाद भाजपा में चिंता है।

दिलचस्प तथ्य यह है कि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी जिन तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव हारी, उन्हीं राज्यों में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। इसके बाद जिन दो राज्यों महाराष्ट्र और झारखंड में पार्टी हारी और हरियाणा में किसी तरह सत्ता बचाने में कामयाब रही, उन राज्यों में पार्टी लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन के आसपास भी नहीं पहुंच पाई। वर्तमान झारखंड का ही उदाहरण लें तो पार्टी का वोट प्रतिशत लोकसभा चुनाव के मुकाबले करीब 17 फीसदी लुढ़क गया।
नाकाम साबित हो रहे क्षत्रप

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली जीत के बाद से ही भाजपा और पीएम नरेंद्र मोदी ने राज्यों में भविष्य की राजनीति के लिए नया नेतृत्व उभारने पर जोर दिया। हालांकि परिणाम बताते हैं कि ऐसा कोई भी चेहरा अपने सूबे में अपनी मजबूत छवि बनाने में कामयाब नहीं हो पाया। वह भी तब जब पार्टी आलाकमान ने इन्हें कामकाज के मामले में न सिर्फ लगातार फ्री हैंड दिया, बल्कि विरोधी धड़े की आवाज को रत्ती भर तवज्जे नहीं दी। महाराष्ट्र में पूर्व सीएम देवेंद्र फडणवीस, हरियाणा में वर्तमान सीएम मनोहर लाल और अब झारखंड में सीएम रघुवर दास कोई करिश्मा नहीं दिखा पाए। रघुवर की छवि तो उल्टे पार्टी के लिए बड़ी मुसीबत बन गई।

भाजपा कैंप में चिंता के बादल
झारखंड के चुनाव परिणाम ने भाजपा नेतृत्व को सकते में डाल दिया है। पार्टी को उस समय करारी हार मिली है जब नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी पर देश की सियासत गरम है। पार्टी इस मोर्चे पर बेहद आक्रामक भूमिका निभा रही है। इसके अलावा चुनाव ऐसे समय में हुए जब राम मंदिर पर पक्ष में परिणाम आया। अनुच्छेद 370 को निरसत कर पार्टी और सरकार ने देश को बड़ा संदेश दिया। पार्टी के लिए मुश्किल यह है कि अब उसके सामने पहले दिल्ली, बिहार और उसकेबाद पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव है। इन तीनों ही राज्यों में पार्टी के पास कोई करिश्माई चेहरा नहीं है।

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