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बिहार के महाकांड: रणवीर सेना से बदला लेने के लिए 34 मासूम उतारे गए मौत के घाट, लेकिन इनका हत्यारा कोई नहीं
Wed, 23 Apr 2025 07:47 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 23 Apr 2025 07:47 AM IST
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सार
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सेनारी नरसंहार। (प्रतीकात्मक)
- फोटो :
AI
विस्तार
बिहार में जातीय हिंसा का लंबा इतिहास रहा है। इसके चलते राज्य में कई नरसंहार हुए। डालेचक-बघौरा, बाड़ा, सेनारी से लेकर बेलछी, बथानी टोला, लक्ष्मणपुर बाथे जैसे नरसंहार शामिल हैं। ‘बिहार के महाकांड’ सीरीज के पांचवें भाग में आज हम आपको ऐसे ही एक नरसंहार के बारे में बताएंगे। इस नरसंहार को बदला नहीं, बल्कि 'बदले का बदला' कहा जाता है। वजह है कि यह हत्याकांड डालेचक-बघौरा के जवाब में किए गए बथानी टोला, लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार का पलटवार था।आइये जानते हैं सेनारी नरसंहार के बारे में, जिसमें बथानी टोला और लक्ष्मणपुर बाथे में हुए हत्याकांड की तरह दो बातें समान थीं। पहली- तीनों में ही लोगों की हत्या हुई थी। दूसरी- तीनों ही नरसंहार को अंजाम किसी ने नहीं दिया। यानी अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया।
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कैसे भड़की सेनारी नरसंहार के लिए चिंगारी, कैसे रची गई साजिश?
सेनारी में नरसंहार की चिंगारी के लिए उच्च जातियों के संगठन रणवीर सेना और नक्सली संगठन- माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के बीच जारी टकराव को जिम्मेदार माना जाता है। दरअसल, एमसीसी की तरफ से उच्च जाति के लोगों की हत्या के बाद रणवीर सेना ने मध्य बिहार से इस संगठन को हमेशा के लिए खत्म करने का लक्ष्य रखा। वहीं, लक्ष्मणपुर बाथे हत्याकांड के बाद एमसीसी ने जवाब देने का लक्ष्य रखा।
सेनारी में नरसंहार की चिंगारी के लिए उच्च जातियों के संगठन रणवीर सेना और नक्सली संगठन- माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के बीच जारी टकराव को जिम्मेदार माना जाता है। दरअसल, एमसीसी की तरफ से उच्च जाति के लोगों की हत्या के बाद रणवीर सेना ने मध्य बिहार से इस संगठन को हमेशा के लिए खत्म करने का लक्ष्य रखा। वहीं, लक्ष्मणपुर बाथे हत्याकांड के बाद एमसीसी ने जवाब देने का लक्ष्य रखा।
कैसे रची गई सेनारी की साजिश?
- माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ने लक्ष्मणपुर बाथे हमले के बाद जहानाबाद में रणवीर सेना समेत उच्च जातियों की सेनाओं पर हमले जारी रखे। शुरुआत में यह हिंसा भीमपुरा, उसरी बाजार के क्षेत्र में हुई, जहां रणवीर सेना के समर्थकों और उससे जुड़ाव रखने वालों को नहीं छोड़ा गया।
- दूसरी तरफ लक्ष्मणपुर बाथे के बाद दलितों का एक बड़ा वर्ग एमसीसी के साथ आने लगा। अलग-अलग स्तर पर उच्च जातियों के लोगों की हत्या की घटना सामने आती रहीं। इनमें बरथुआ गांव में नक्सलियों द्वारा तीन लोगों के मारे जाने की घटना भी सामने आई।
- इस वार-पलटवार ने ही कुछ महीनों बाद जन्म दिया सेनारी हत्याकांड को, जहां 34 भूमिहारों को बेरहमी से मार दिया गया। बताया जाता है कि उस दौर में कुल मिलाकर 45 उच्च जाति के लोगों की अलग-अलग जगहों पर हत्या हुई थी।
सेनारी नरसंहार: जिसमें जारी रही अति-वाम दलों की बर्बरता
पीपल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज की रिपोर्ट के मुताबिक, शंकर बिगहा नरसंहार के पीड़ितों की तरह ही सेनारी नरसंहार के पीड़ित भी निर्दोष थे, उनका रणवीर सेना से कोई जुड़ाव नहीं था। यानी उनकी हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई, क्योंकि वे उच्च जाति के भूमिहार थे।
पीपल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज की रिपोर्ट के मुताबिक, शंकर बिगहा नरसंहार के पीड़ितों की तरह ही सेनारी नरसंहार के पीड़ित भी निर्दोष थे, उनका रणवीर सेना से कोई जुड़ाव नहीं था। यानी उनकी हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई, क्योंकि वे उच्च जाति के भूमिहार थे।
कैसे दिया गया हत्याकांड को अंजाम?
- 18 मार्च 1999 की रात करीब 7.30 से 10 बजे के बीच माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के 1000 से ज्यादा लोग चुपचाप तरीके से सेनारी गांव में पहुंचे। काले कपड़े पहने इन लोगों के हाथों में राइफल, कुल्हाड़ी और धारदार हथियार थे। इन लोगों ने इलाके को घेर लिया और एक बड़ा धड़ा गांव के अंदर घुस गया। इनमें से कई स्थानीय लोग भी थे, जो गांव को अच्छे से जानते थे। इन लोगों ने एक-एक घर को चिह्नित कर घुसपैठ शुरू की।
- एक के बाद एक भूमिहारों के घरों से पुरुषों को बाहर घसीटा गया। महिलाओं और बच्चों को भी बाहर धकेला गया और उनके सामने ही भूमिहार पुरुषों का गला धारदार हथियार से रेतकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। अभियोजन पक्ष ने बाद में कोर्ट में बताया था कि जिन लोगों को मारा गया, उन पर गांव के मंदिर के सामने ही गर्दन और पेट पर कुल्हाड़ी या हंसिया से वार किया गया। यह पूरा घटनाक्रम कुछ घंटों तक जारी रहा।