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Seat ka Samikaran: पिछले सात चुनाव से दो चेहरों की लड़ाई का केंद्र रही है रुपौली, दोनों का है बाहुबल कनेक्शन

Sun, 13 Jul 2025 07:01 AM IST
संध्या इलेक्शन डेस्क, अमर उजाला
इलेक्शन डेस्क, अमर उजाला Published by: संध्या Updated Sun, 13 Jul 2025 07:01 AM IST
सार

बिहार चुनाव से जुड़ी से खास सीरीज ‘सीट का समीकरण’ में आज रुपौली विधानसभा सीट की बात। बीमा भारती यहां से पांच बार विधायक रह चुकी हैंं। 2024 में उनके पाला बदलने पर हुए उप चुनाव में उन्हें अपने पुरानी प्रतिद्वंदी शंकर सिंह से हार मिली।  

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बिहार चुनाव 2025 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बिहार विधानसभा चुनाव की हलचल तेज है। राज्य में मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण का काम तेजी से चल रहा है। इसे लेकर विवाद भी जारी है। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। राज्य में जारी इस सियासी हलचल के बीच अमर उजाला अलग-अलग सीरीज के जरिए बिहार की सियासत के बारे में बता रहा है। इसी से जुड़ी ‘सीट का समीकरण’ सीरीज की 17वीं कड़ी में आज हम रुपौली विधानसभा सीट की बात करेंगे। इस सीट पर बाहुबली अवधेश मंडल का दबदबा लंबे समय तक रहा। कहा जाता है कि उनके दबदबे के चलते ही उनकी पत्नी बीमा भारती यहां से जीतती रही। कहा तो यहां तक जाता है कि विधायक बीमा भारती बनती थीं और सारे फैसले अवधेश मंडल लेते थे।  आइये जानते हैं रुपौली सीट के बारे में....

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पहले जानते हैं रूपैली सीट के बारे में 

बिहार के 38 जिलोंं में से एक जिला पूर्णिया भी है। इस जिले में कुल सात विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें अमौर, बैसी, कस्बा, बनमनखी (एससी), रूपौली, धमदाहा और पूर्णिया विधानसभा सीट शामिल है। पूर्णिया लोकसभा सीट में छह विधानसभा सीटें आती हैं। रुपौली विधानसभा सीट भी पूर्णिया लोकसभा सीट का हिस्सा है। यह सीट 1952 से अस्तित्व में है। 
 

1952: मोहित लाल पंडित बने रुपौली के पहले विधायक

रुपौली विधनसभा सीट पर सबसे पहले 1952 में चुनाव हुए। इस चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी के मोहित लाल पंडित को जीत मिली। उन्होंने कांग्रेस के बासुदेव प्रसाद को उन्होंने 2,331 वोट से हरा दिया। पहले विधानसभा चुनाव में रुपौली सीट पर सोशलिस्ट पार्टी को जीत मिली, लेकिन 1957 के विधानसभा चुनाव में रुपौली सीट पर कांग्रेस ने अपना परचम लहराया। इस चुनाव में कांग्रेस के ब्रज बिहारी सिंह जीत दर्ज की। ब्रज बिहारी इसके बाद 1962 के चुनाव में रुपौली से जीतकर विधानसभा पहुंचे। 1957 में ब्रज बिहारी सिंह ने निर्दलीय चुनाव लड़ रहे कमलनाथ झा को 5843 वोट से हरा दिया। वहीं, 1962 में उन्होंने स्वतंत्र पार्टी के रामेश्वर प्रसाद सिंह को 15,275 वोट से शिकस्त दी।  

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1967: कम्युनिस्ट पार्टी को मिली जीत 

1967 में इस सीट पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) को जीत मिली थी। इस चुनाव में सीपीआई की छवि नाथ शर्मा ने कांग्रेस के बीबी सिंह 6,063 वोट से हरा दिया। 1967 में चुनाव हारने के बाद इस रुपौली पर फिर से कांग्रेस की वापसी हुई। इसके बाद लगातार दो बार कांग्रेस को यहां से जीत मिली। दोनों बार कांग्रेस के आनंदी प्रसाद सिंह को जीत मिली। 1969 में उन्होंने सीपीआई उम्मीदवार और तत्कालीन विधायक छवि नाथ शर्मा 1,278 वोट से हाराया। 1972 उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के कामेश्वर दास को 3,945 वोट से मात दी। 

1977: जनता पार्टी को मिली जीत 

1977 के विधानसभा चुनाव में जनता लहर में राज्य में जनता पार्टी की सरकार बनी। इस चुनाव में रुपौली सीट पर भी जनता पार्टी को जीत मिली। जनता पार्टी के शालिग्राम सिंह तोमर ने सीपीआई के सरयुग पीडी मंडल को 1,244 वोट से हरा दिया। 1980 के विधानसभा चुनाव में रुपौली सीट से कांग्रेस (आई) को जीत मिली। कांग्रेस (आई) के दिनेश कुमार सिंह ने सीपीआई के सरयुग पीडी मंडल को 1,976 वोट से हरा दिया। 1985 में एक बार फिर कांग्रेस के दिनेश कुमार सिंह को जीत मिली। कांग्रेस के दिनेश कुमार सिंह ने सीपीआई सरयुग मंडल को 2,311 वोट से हरा दिया। 

1990: निर्दलीय सरयुग मंडल को मिली जीत

तीन चुनाव हारे सरयुग मंडल को इस बार रुपौली सीट पर जीत मिल गई। 1990 में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा। मंडल ने भाजपा के जय कृष्ण सिंह को महज 627 वोट से हरा दिया। 1995 के विधानसभा चुनाव में रुपौली सीट से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के बाल किशोर मंडल को जीत मिली। रुपौली सीट पर यह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की दूसरी जीत थी। इससे पहले 1967 के विधानसभा चुनाव में सीपीआई को जीत मिली थी। 1995 के विधानसभा चुनाव में यहां से बाल किशोर मंडल ने समाजवादी पार्टी के राम चंद्र दास को 8946 वोट से हरा दिया। 

बीमा भारती का गढ़ बनी सीट

साल 2000 से अब तक हुए सात चुनाव में यह सीट या तो बीमा भारती के पास रही या शंकर सिंह के पास रही। इन दोनों चेहरों की चुनावी अदावत जानने से पहले आपको वो दौर याद करना होगा जब बिहार की सियासत में बाहुलबलियों का बड़े पैमाने पर प्रवेश हो रहा था। पूर्णिया और सीमांचल में भी इस तरह के कई  किस्से हैं। पूर्णिया में 90 के दौर में दो बाहुबली शंकर सिंह और अवधेश मंडल शामिल थे। दोनों बाहुबलियों के बीच कई बार अदातव देखने को मिली। नार्थ बिहार लिबरेशन आर्मी का नेतृत्व शंकर सिंह तो फैजान गिरोह की सरदारी अवधेश मंडल किया करते थे। दोनों ने एक साथ अपनी पत्नियों से साथ राजनीति में कदम रखा। लेकिन पत्नियां केवल मोहरा मात्र थी पीछे से राजनीति उनके पति ही चला रहे थे। बीमा भारती के पति अवधेश मंडल पूर्णिया और आसपास के जिलों में हत्या, रंगदारी, लूट और आर्म्स एक्ट के कई मामलों में आरोपी है। साल 2000 के विधनसभा चुनाव में  बीमा भारती ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज की। उन्होंने समाजवादी पार्टी के मो. अलीमुद्दीन को 6308 वोट से हरा दिया था। इस चुनाव में निर्दलीय उतरे शंकर सिंह 10360 वोट पाकर पांचवें नंबर पर रहे। 

फरवरी 2005: शंकर सिंह को मिली जीत 

फरवरी 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में शंकर सिंह लोकजनशक्ति पार्टी के टिकट पर उतरे। वहीं, बीमा भारती राजद के टिकट पर मैदान में थे। इस लड़ाई में जीत शंकर सिंह को मिली।  शंकर सिंह ने बीमा भारती को 6,113 वोट से हरा दिया।

2005 में बिहार में दो बार चुनाव हुए थे, अक्तूबर 2005 के चुनाव में शंकर सिंह को हार का सामना करना पड़ा था। इस चुनाव में राजद के टिकट पर चुनाव लड़ रहीं बीमा भारती ने लोजपा के शंकर सिंह को 1991 वोट से हरा दिया। 

लगातार चार चुनाव जीतीं बीमा भारती

2005 के बाद 2020 तक बीमा भारती ने इस सीट पर अपनी लगातार चार बार जीत दर्ज की। 2010 के विधानसभा चुनाव बीमा भारती पार्टी बदलकर जदयू में शामिल हो गईं। 2010 का चुनाव उन्होंने जदयू से लड़ा था। उन्होंने लोजपा के शंकर सिंह को फिर से हरा दिया। बीमा भारती ने शंकर सिंह को 37,716 वोटो के भारी अंतर से मात दी। 

2015 के विधानसभा चुनाव में बीमा भारती ने भाजपा के प्रेम प्रकाश मंडल को हराया। इस चुनाव में निर्दलीय उतरे शंकर सिंह तीसरे स्थान पर रहे। उन्हें 34,662 वोट मिले। 2019 में बीमा भारती को नीतीश मंत्रिमंडल में गन्ना उद्योग मंत्री बनाया गया। 2020 में एक बार फिर से बीमा भारती को जीत मिली। बीमा भारती ने एक बार फिर से लोजपा के शंकर सिंह को 19,330 वोट से हरा दिया। 

2024: उपचुनाव में हारी बीमा भारती

2024 में आम चुनाव से पहले बीमा भारती से जदयू से इस्तीफा देकर राजद का दामन थाम लिया। इसके चार दिन बाद ही उन्होंने ऐलान किया कि वह राजद के टिकट पर पूर्णिया से लोकसभा चुनाव लड़ेंगी। पूर्णिया लोकसभा सीट से टिकट की दावेदारी कर रहे पप्पू यादव ने इसका विरोध किया। 2024 का लोकसभा चुनाव बिहार में राजद और कांग्रेस साथ मिलकर लड़ रहे थे। पप्पू यादव से पूर्णिया से चुनाव लड़ने की शर्त पर अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में किया था। लेकिन जब राजद ने बीमा भारती को पूर्णिया लोकसभा से टिकट दिया तो पप्पू यादव ने इस सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का एलान कर दिया। इस चुनाव में पप्पू यादव को जीत मिली। बीमा भारती अपनी जमानत भी नहीं बचा सकीं। 

बीमा भारती के इस्तीफा देने के बाद रूपौली विधानसभा सीट खाली हो गई। इसके बाद जुलाई 2024 में इस सीट पर उपचुनाव हुआ। उपचुनाव में बीमा भारती राजद की तरफ से फिर से चुनाव लड़ने के लिए उतरीं। लेकिन इस बार जनता को बीमा भारती का सीट छोड़कर जाना पसंद नहीं आया और वह चुनाव हार गईं। निर्दलीय चुनाव लड़ रहे शंकर सिंह ने जदयू के कलाधर मंडल को 8,246 वोट से हरा दिया। इस उपचुनाव में बीमा भारती तीसरे नंबर पर रहींं। उन्हें 30,619 वोट मिले। 

 

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