Seat ka Samikaran: 1977 में मुख्यमंत्री बनने के बाद यहीं से MLA बने थे कर्पूरी ठाकुर, ऐसा है फुलपरास का इतिहास
‘सीट का समीकरण’ सीरीज की नौवीं कड़ी में आज हम आपको फुलपरास विधानसभा सीट के बारे में बताएंगे। इस सीट पर सबसे बड़ा चेहरा एक समय पर कर्पूरी ठाकुर हुए थे। यहीं से जीतकर कर वह दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे।
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विस्तार
बिहार में इस साल के अंत में चुनाव होने हैं। सभी पार्टियां चुनाव की तैयारियों में जुट चुकी हैं। इस चुनावी साल में अमर उजाला बिहार और बिहार की राजनीति, उससे जुड़ी घटनाओं और चेहरों के बारे में अलग-अलग सीरीज के जरिए बता रहा है। इसी से जुड़ी ‘सीट का समीकरण’ सीरीज की 9वीं कड़ी में आज हम आपको फुलपरास विधानसभा सीट के बारे में बताएंगे। जननायक कर्पूरी ठाकुर 1977 में मुख्यमंत्री बनने के बाद यहां से विधायक बने थे।
मधुबनी जिले का हिस्सा है फुलपरास सीट
बिहार के 38 जिलों में से एक मधुबनी जिला भी है। यह जिला 5 अनुमंडल और 21 ब्लाक में बंटा हुआ है। मधुबनी जिले में कुल 10 विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें हरलाखी, बेनीपट्टी, खजौली, बाबूबरही, बिस्फी, मधुबनी, राजनगर, झंझारपुर, फुलपरास और लौकहा विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। आज बात फुलपरास विधानसभा सीट की करेंगे। फुलपरास विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र झंझारपुर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा है। इस सीट पर 1952 में पहली बार चुनाव हुए थे।
पहले तीन चुनावों में कांग्रेस का रहा दबदबा
पहले तीन चुनावों की बात करें तो इस सीट पर कांग्रेस को जीत मिली। 1952 में फुलपरास सीट पर कांग्रेस को जीत मिली। तब कांग्रेस के काशीनाथ मिश्र ने सोशलिस्ट पार्टी के देवा नारायण गुरमैता को 6843 वोट से हराया था। 1957 और 1962 के चुनावों में भी फुलपरास सीट कांग्रेस के खाते में गई। दोनों बार कांग्रेस के रसिक लाल यादव ने यहां से जीत दर्ज की। 1957 में उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के योगेंद्र झा को 1,716 वोट से हराया। वहीं, 1962 में सोशलिस्ट पार्टी के धनिक लाल मंडल को केवल 728 वोट से मात दी।
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1967: धनिक लाल मंडल ने लिया पिछली हार का बदला
तीन चुनावों से जीत रही कांग्रेस को 1967 में हार का सामना करना पड़ा था। सीट पर लगातार दो बार जीत दर्ज कर चुके रसिक लाल यादव को 1967 में हार मिली। यादव को संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के धनिक लाल मंडल ने हराया। इसके साथ ही उन्होंने 1962 में मिली 728 वोट की हार का बदला ले लिया।
1969 में एक बार फिर धनिक लाल मंडल जीते। इस बार कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही। दूसरे नंबर पर कांग्रेस के टिकट पर दो बार विधायक रहे और 1969 में निर्दलीय चुनाव लड़ रहे रसिक लाल यादव रहे। कांग्रेस ने उस चुनाव में रसिक लाल का टिकट काटकर सोने लाल चंद को दिया था। चंद को महज 4,621 वोट मिले। वे अपनी जमानत भी नहीं बचा सके और तीसरे नंबर पर रहे। 1972 में फुलपरास सीट पर फिर से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) ने जीत दर्ज की। 1972 के चुनाव में संसोपा के उत्तम लाल यादव ने कांग्रेस के खुशी लाल कामत को 17,647 वोट से हरा दिया।
1977: कर्पूरी ठाकुर उपचुनाव में जीते
1977 में हुए विधानसभा चुनाव में फुलपरास से जनता पार्टी के देवेन्द्र प्रसाद यादव जीत दर्ज की। उन्होंने कांग्रेस के उत्तम लाल यादव को 34,993 वोट के बड़े अंतर से हराया। इस चुनाव में जनता पार्टी को राज्य की 324 सीटों में से 214 सीटों पर जीत मिली। कांग्रेस महज 57 सीट पर सिमट गई।
भारी बहुमत के साथ जीत दर्ज करने वाली जनता पार्टी ने सरकार बनाई। कर्पूरी ठाकुर राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तब वो बिहार के किसी भी सदन का सदस्य नहीं थे। दरअसल 1977 के लोकसभा चुनाव में कर्पूरी ठाकुर समस्तीपुर लोकसभा सीट से जीतकर सांसद बने थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने समस्तीपुर लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया। वहीं, फुलपरास सीट से जीते देवेंद्र प्रसाद यादव ने भी कर्पूरी ठाकुर के लिए सीट खाली कर दी। इसके बाद हुए उपचुनाव फुलपरास सीट से जीतकर कर्पूरी ठाकुर विधानसभा पहुंचे।
कर्पूरी ठाकुर को बिहार की सियासत में सामाजिक न्याय की अलख जगाने वाला नेता माना जाता है। कर्पूरी ठाकुर साधारण नाई परिवार में जन्मे थे। कहा जाता है कि पूरी जिंदगी उन्होंने कांग्रेस विरोधी राजनीति की और अपना सियासी मुकाम हासिल किया। यहां तक कि आपातकाल के दौरान तमाम कोशिशों के बावजूद इंदिरा गांधी उन्हें गिरफ्तार नहीं करवा सकी थीं।

1970 और 1977 में मुख्यमंत्री बने थे कर्पूरी ठाकुर
कर्पूरी ठाकुर 1970 में पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। 22 दिसंबर 1970 को उन्होंने पहली बार राज्य की कमान संभाली थी। उनका पहला कार्यकाल महज 163 दिन का रहा था। 1977 में कर्पूरी ठाकुर दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। अपना यह कार्यकाल भी वह पूरा नहीं कर सके। इसके बाद भी महज दो साल से भी कम समय के कार्यकाल में उन्होंने समाज के दबे-पिछड़ों लोगों के हितों के लिए काम किए।
बिहार में मैट्रिक तक पढ़ाई मुफ्त की दी। वहीं, राज्य के सभी विभागों में हिंदी में काम करने को अनिवार्य बना दिया। उन्होंने अपने कार्यकाल में गरीबों, पिछड़ों और अति पिछड़ों के हक में ऐसे तमाम काम किए, जिससे बिहार की सियासत में आमूलचूल परिवर्तन आ गया। इसके बाद कर्पूरी ठाकुर की राजनीतिक ताकत में जबरदस्त इजाफा हुआ और वो बिहार की सियासत में समाजवाद का बड़ा चेहरा बन गए।
कर्पूरी ठाकुर के शागिर्द हैं लालू-नीतीश
बिहार में समाजवाद की राजनीति कर रहे लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार कर्पूरी ठाकुर के ही शागिर्द हैं। जनता पार्टी के दौर में लालू और नीतीश ने कर्पूरी ठाकुर की उंगली पकड़कर सियासत के गुर सीखे। ऐसे में जब लालू यादव बिहार की सत्ता में आए तो उन्होंने कर्पूरी ठाकुर के कामों को आगे बढ़ाया। वहीं, नीतीश कुमार ने भी अति पिछड़े समुदाय के हक में कई काम किए।
1980: दो जनता पार्टी की लड़ाई में चरण सिंह की पार्टी को मिली जीत
1980 में जनता पार्टी (सेक्युलर) से सुरेंद्र यादव को जीत मिली। उन्होंने जनता पार्टी (जेपी) के कृपा नाथ पाठक को 13725 वोट से हराया। 1985 में मुकाबला दो यादव उम्मीदवारों के बीच देखने को मिला। इस चुनाव में कांग्रेस की हेमलता यादव ने जीत दर्ज की। उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ रहे देवेन्द्र यादव को हराया।
1990 के विधानसभा चुनाव में फुलपरास से जनता दल के राम कुमार यादव ने कांग्रेस के देव नाथ यादव को 5,157 वोट से हरा दिया था। 1995 में कांग्रेस को देव नाथ यादव ने राम कुमार यादव से 1990 में मिली हार का बदला ले लिया। इस चुनाव में उन्होंने जनता दल के राम कुमार यादव को 3,344 वोट से हराया। साल 2000 में फुलपरास सीट पर एक बार फिर मुख्य मुकाबला राम कुमार यादव और देव नाथ यादव के बीच हुआ। इस बार जनता दल (यूनाइटेड) के टिकट पर उतरे राम कुमार यादव को जीत मिली। उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर उतरे देवनाथ यादव को 6,008 वोट से हराया।
2005: समाजवादी पार्टी की जीत
2005 पहली बार फरवरी में और दूसरी बार अक्तूबर में विधानसभा चुनाव हुए थे। फरवरी 2005 में फुलपरास सीट से समाजवादी पार्टी के देवनाथ यादव को जीत मिली। 1995 में कांग्रेस के टिकट पर जीतने वाले देव नाथ यादव एक बार फिर राम कुमार यादव को हराकर विधानसभा पहुंचे। राम कुमार यादव इस चुनाव में राजद के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे। अक्तूबर 2005 में हुए चुनाव में भी समाजवादी पार्टी के देवनाथ यादव को जीत मिली। इस चुनाव में देवनाथ यादव ने जदयू के भारत भूषण मंडल को 4,978 वोट से हराया।

2010: जदयू के दबदबे का दौर
2010 के विधानसभा चुनाव में फुलपरास से जनता दल यूनाइटेड की गुलजार देवी ने राजद के वीरेंद्र कुमार चौधरी ने 12344 वोट से हरा दिया था। 2015 में फिर से मौजूदा विधायक गुलजार देवी ने जीत दर्ज की थी। गुलजार देवी ने भाजपा के राम सुन्दर यादव को 13415 वोट से हरा दिया था। 2020 में जनता दल यूनाइटेड से शीला कुमारी को जीत मिली। शीला कुमारी ने कांग्रेस के कृपानाथ पाठक को 10966 वोट से हरा दिया था।