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अयोध्या: कपड़ों से लेकर सुरक्षा तक, ये तीन मुस्लिम करते हैं रामलला की 'देखभाल'

Tue, 05 Dec 2017 04:51 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला
टीम डिजिटल/अमर उजाला Updated Tue, 05 Dec 2017 04:51 PM IST
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ayodhya three muslims guards dresses and lights up Ram lala idol
प्रतीकात्मक तस्वीर

राम जन्मभूमि के मसले पर लंबे वक्त से चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम सुनवाई कर दी है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि पिछले लगभग बीस सालों से राम जन्मभूमि मंदिर की देखभाल तीन मुसलमानों के जिम्मे है। 

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इसमें 38 साल के अब्दुल वाहिद, सादिक अली और महबूब शामिल हैं। 38 साल के वाहिद वेल्डिंग का काम काम करते हैं, मंदिर के चारों तरफ लगी तारों की मरम्मत उन्हीं के जिम्मे है। सादिक टेलर हैं, वह रामलला की मूर्ति को पहनाए जाने वाले कपड़े सिलते हैं, वह यह काम मुख्य पुजारी के कहने पर या फिर खुद से दो तीन महीने में कर देते हैं। वहीं महबूब जो कि बिजली का काम करते हैं वह देखते हैं कि रामलला और आसपास का इलाका हमेशा जगमगाता रहे।
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टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक, सादिल अली वहां राम लला के साथ-साथ आसपास के हिंदुओं के भी कपड़े सिल रहे हैं।  पिछले 57 सालों से उनकी दुकान चल रही है, जिस जमीन पर वह दुकान है उसकी हिस्सेदारी हनुमानगढ़ी मंदिर को मिली है। दुकान खोलने के बदले सादिक मंदिर को 70 रुपए किराया देते हैं।

वेल्डिंग का काम करने वाले वाहिद मंदिर की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखते हैं, 2005 में लश्कर ए तय्यबा के आतंकियों द्वारा हुए बम के हमले के बाद से वह ज्यादा सतर्क हो गए हैं।

क्या है विवाद

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विवादित ढांचे को 1992 में गिराया गया था।

विवाद पहली बार 1885 में अदालत पहुंचा था, तब महंत रघुबर दास ने वहां मंदिर बनवाने के लिए याचिका दायर की थी। इसके बाद 1949 में हिंदुओं ने वहां भगवान की मूर्ति रखकर पूजा करनी शुरू की थी, तब से ही विवाद बढ़ गया था।

फिर धीर-धीरे मंदिर निर्माण की मांग तेज होने लगी, जिसके खिलाफ सुन्नी वक्फ बोर्ड भी कोर्ट पहुंचा और उसने मस्जिद पर अपना हक जताया। इसके बाद जिला जज ने विवाद वाली जगह पर लगे ताले को तोड़कर हिंदुओं को पूजा की इजाजत दे दी थी। इस वजह से बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन हुआ था।

फिर भाजपा और विश्व हिंदू परिषद खुलकर मंदिर के समर्थन में आए। भाजपा ने मंदिर को चुनावी मुद्दा बना लिया और लाल कृष्ण आडवाणी ने इसके लिए देशभर में रथयात्रा निकाली। जब रथयात्रा बिहार पहुंची थी तब लालू प्रसाद ने आडवाणी को गिरफ्तार करवा लिया था। जिसके बाद भाजपा समर्थकों का गुस्सा फूट पड़ा था और जिसके बाद भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था।

रथयात्रा के दौरान यूपी के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने कारसेवकों पर गोलियां भी चलवाई थीं।  जिसके बाद उनकी सरकार चली गई और नए चुनाव होने पर कल्याण सिंह के नतृत्व में भाजपा की सरकार बनी।

कल्याण सिंह ने सरकार बनने के बाद विवादित 2.77 एकड़ जमीन को अपने कब्जे में ले लिया था जिसका मुसलमानों ने काफी विरोध किया था। फिर 1992 में भाजपा नेताओं ने मंदिर निर्माण की घोषणा की। बताया जाता है इसके लिए विवादित ढांचे को ढहाने की प्लानिंग बनी। भाजपा नेता विनय कटियार के घर पर यह योजना तैयार हुई।

फिर 6 दिसंबर 1992 को हजारों की संख्या में अयोध्या पहुंचे कार सेवकों ने विहिप और भाजपा नेताओं के नेतृत्व में विवादित ढांचे को ढहा दिया। इस मामले की जांच के लिए केंद्र सरकार ने लिब्रहान आयोग का गठन किया। 

इसके बाद केंद्र सरकार ने यूपी की कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया था। फिर आयोध्या का मामला इलाहाबाद हाइकोर्ट पहुंचा।  लिब्राहन आयोग ने 17 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी। 2010 में हाइकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एतिहासिक फैसला सुनाया, कोर्ट ने जमीन के तीन हिस्से मानते हुए एक हिस्सा राम मंदिर को, दूसरा निर्मोही अखाड़े को और तीसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड को बांटने का फैसला सुनाया। फिर 2011 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने हाइकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।

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