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चिंताजनक: सीवर से नदियों में घुल रही कृत्रिम मिठास, आने वाली पीढ़ियों के लिए अदृश्य तबाही

Sat, 19 Jul 2025 08:16 AM IST
ज्योति भास्कर अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली। Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 19 Jul 2025 08:16 AM IST
सार

सीवर से नदियों में घुल रही कृत्रिम मिठास आने वाली पीढ़ियों के लिए अदृश्य तबाही का सबब बन सकती है। वैज्ञानिकों ने इसे चिंताजनक माना है। जलीय जीवन, जल गुणवत्ता और इंसानी डीएनए को प्रभावित कर रहा है। जानिए इस अदृश्य संकट के बारे में

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Artificial sweeteners getting dissolved in rivers via sewers invisible devastation for future generations
चीनी - फोटो : Freepik.com

विस्तार

शुगर-फ्री उत्पादों में इस्तेमाल होने वाली कृत्रिम मिठास अब केवल स्वाद तक सीमित नहीं रही, बल्कि पृथ्वी के लिए धीमा जहर बनता जा रहा है। एक वैश्विक अध्ययन के मुताबिक, सुक्रालोज और एसेसल्फेम जैसी मिठास दुनिया के कई देशों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स को पार करते हुए सीधे नदियों, झीलों और समुद्री पर्यावरण में पहुंच रही हैं, जाे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अदृश्य संकट खड़ा कर रही है।
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अमेरिका, स्पेन और जर्मनी जैसे देशों में भी चिंता
यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी (यूटीएस) के वैज्ञानिकों द्वारा जर्नल ऑफ हैजर्डस मैटेरियल्स में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक भारत, अमेरिका, स्पेन और जर्मनी जैसे देशों में इन स्वीटनर्स की मौजूदगी बेहद चिंताजनक स्तर तक दर्ज की गई है।
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भारत सहित 24 देशों में किए गए अध्ययन
ये कृत्रिम केमिकल इतने स्थिर हैं कि उन्नततम शोधन प्रणालियां भी इन्हें पूरी तरह साफ करने में विफल रहती हैं। भारत सहित 24 देशों में किए गए इस अध्ययन ने यह भी उजागर किया है कि गर्मियों के मौसम में इनकी मात्रा 30% तक अधिक हो जाती है जो जल संसाधनों पर मौसमी दबाव के साथ मिलकर खतरे को कई गुना बढ़ा देती है।
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मूत्र या मल के जरिए बाहर निकल जाती है और सीवेज प्रणाली में जा रहे स्वीटनर्स
इन स्वीटनर्स की रासायनिक संरचना ऐसी होती है कि यह शरीर में पचती नहीं। खाने या पीने के बाद यह सीधे मूत्र या मल के जरिए बाहर निकल जाती है और सीवेज प्रणाली में पहुंचती है। इनका असर अब जलीय जीवन, जल गुणवत्ता और यहां तक कि इंसानी डीएनए तक को प्रभावित कर रहा है।
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