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जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के खात्मे से घुसपैठियों को नहीं मिल रहे मददगार, घुसपैठ में आई कमी

Wed, 04 Dec 2019 07:00 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 04 Dec 2019 07:00 PM IST
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after abolition of article 370, terrorists are not getting local support
mla hostel srinagar - फोटो : अमर उजाला
जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने के बाद घुसपैठियों यानी आतंकवादियों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। खासतौर पर सीमा पार से घुसपैठ कर जम्मू कश्मीर में आने वाले आतंकी या पहले से घाटी में मौजूद आतंकियों को कोई मददगार नहीं मिल पा रहा है। चूंकि बहुत से ऐसे संदिग्ध व्यक्ति, जिन पर आतंकियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर से मदद देने का आरोप है, वे अब जेल में हैं या दूसरी जगहों पर नजरबंद हैं।
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सुरक्षा बलों की बड़े पैमाने पर तैनाती ने भी आतंकियों के मददगारों को कदम पीछे रखने के लिए मजबूर कर दिया है। यही वजह है कि इस साल जम्मू कश्मीर में वास्तविक घुसपैठ के मामलों की संख्या कम हो रही है। पिछले साल वास्तविक घुसपैठ के 143 मामले सामने आए थे, जबकि इस बार अक्तूबर माह तक इनकी संख्या 114 है।

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आतंकियों को मिलती रही है भरपूर मदद

सुरक्षा बलों एवं जांच एजेंसियों के अधिकारियों के अनुसार, पिछले साल तक घाटी में आतंकियों को आतंरिक मदद भरपूर तरीके से मिलती रही है। ऐसा नहीं है कि उस दौरान सुरक्षा बलों की तैनाती नहीं थी। सुरक्षा बलों की मौजूदगी में आतंकियों को घाटी में प्रवेश करने के बाद उन्हें हथियार मुहैया कराने, परिवहन, आर्थिक मदद और उन्हें छिपने का ठिकाना देना, आदि मदद स्थानीय संगठनों के लोग देते रहे हैं। पिछले दिनों हुए एक सम्मेलन में आतंकवाद-रोधी दस्ते के कई प्रमुखों की भी यही राय थी कि आतंकवादियों को कई जगह से अलग-अलग तरह की मदद मिलती है, लेकिन ऐसे लोगों तक पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियां नहीं पहुंच पाती।

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कानून के कमजोर प्रावधानों से बच जाते थे लोग

कई बार देखने में आता है कि किसी आतंकवाद-रोधी दस्ते के पास यह पुख्ता सूचना होती है कि फलां व्यक्ति गैर-कानूनी गतिविधियों में शामिल है। वह आतंकियों की मदद कर रहा है, इसके बावजूद उन पर हाथ डालना संभव नहीं होता था। कानून के कमजोर प्रावधानों का फायदा उठाकर ऐसे लोग बच निकलते हैं। जम्मू-कश्मीर या देश के दूसरे ऐसे हिस्से जहां आतंकियों या तोड़फोड़ की गतिविधियां हुई हैं, वहां उसके पीछे अवश्य ही कोई न कोई मददगार रहा है। एनआईए जांच में भी यह बात सामने आ चुकी है कि कश्मीर में अलगाववादी और दूसरे संगठन आतंकियों को धन एवं अन्य मदद पहुंचाते हैं। यहां तक कि पाकिस्तानी उच्चायोग भी इस मदद की प्रक्रिया में शामिल है।

आतंकी संगठनों की खुली पोल

पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और जमात-उद-दावा की पोल खुल चुकी है। इन संगठनों को स्थानीय स्तर पर मदद मिल रही है, ये बात सभी जानते हैं। पाकिस्तान और दुबई से पैसा आ रहा है, यह भी किसी से छिपा नहीं है। कुछ माह पहले तक जांच एजेंसियों को इन मददगारों के खिलाफ कार्रवाई करने में कई तरह की कानूनी पेचीदगियों का सामना करना पड़ रहा था। अब नए एंटी टेरर कानून की मदद से जांच एजेंसियां ऐसे लोगों को आतंकी घोषित कर उनके खिलाफ पूर्ण अधिकारों के साथ कार्रवाई करने में सक्षम हो गई हैं।

मददगारों पर जमकर हुई कार्रवाई

अधिकारी बताते हैं कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद आतंकियों के मददगारों पर जमकर कार्रवाई हुई है। नए एंटी टेरर कानून की मदद से एनआईए ने भी अब ऐसे लोगों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। ईडी ने ऐसे कई लोगों की संपत्तियां जब्त की हैं, जिन पर आतंकियों को मदद देने का आरोप है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल और एनआईए प्रमुख वाईसी मोदी का कहना था कि आतंकवाद को पूरी तरह खत्म करने के लिए जरूरी है कि पहले उनकी सप्लाई चेन तोड़ी जाए।

आतंकियों के मददगार, जो पर्दे के पीछे रह कर उन्हें हथियार और रुपया-पैसा देते हैं, अब उनकी कमर तोड़ने का वक्त आ गया है। गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) एक्ट के नए प्रावधान अब उन लोगों को कानून के शिकंजे में ला देंगे, जो आतंकियों की मदद करते हुए भी मौजूदा कानून के हल्के प्रावधानों का फायदा उठाकर बचते आ रहे थे। अब इस कानून से आतंकवादी गतिविधियों में अप्रत्यक्ष तौर पर शामिल लोगों को सबक सिखाया जा सकेगा।

विभिन्न एजेंसियों ने इस दिशा में काम शुरू कर दिया है। इसी वजह से अब घाटी में आतंकियों को छिपने का ठिकाना तलाशने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। 2014 में वास्तविक घुसपैठ के मामलों की संख्या 65 थी। 2015 में 36, 2016 में 119, 2017 में 136, 2018 में 143 और 2019 में इनकी संख्या 114 रही है।

आतंकियों से निपटने के लिए नया प्लेटफार्म

आतंकवाद-रोधी दस्ते और स्पेशल टास्क फोर्स अब नए प्लेटफार्म पर काम करेंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का एक सिस्टम तैयार किया जा रहा है, जिसमें देश के किसी भी हिस्से में आतंकियों की छोटी से छोटी सूचना सभी राज्यों के आतंकवाद-रोधी दस्ते या स्पेशल टास्क फोर्स तक पहुंच जाएगी। कौन मददगार है, चाहे वह संभावित ही क्यों न हो, उसका फोटो और फिंगर प्रिंट एक मिनट में सभी के पास होगा। इससे जो भी राज खुलेंगे, वह बिना किसी देरी के सभी एजेंसियों के साथ साझा किया जाएगा।

आतंकियों के मददगारों का पता चलते ही उनके ठिकानों पर एनआईए, ईडी और आईटी जैसी एजेंसियां झापामारी करेंगी। उन लोगों के पास जो भी आर्थिक स्रोत हैं, उसका पता लगाया जाएगा। उसमें हवाला का क्या रोल है, शैल कंपनियां और दूसरे देशों में बैठे उनके आकाओं, इन सभी का पता लगाकर मददगारों की जड़ ही खत्म करने की योजना बन रही है।



खास बात, अब इस तरह की मुहिम में दूतावासों की ज्यादा से ज्यादा मदद ली जाएगी। इसके लिए रॉ और एनटीआरओ जैसे संगठनों की सहभागिता बढ़ाने पर विचार हो रहा है। आतंकियों के पास मौजूद संचार तकनीक का तोड़ निकालने की योजना पर काम शुरू हो चुका है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से आतंकी सूचनाओं का आदान प्रदान इतनी तेजी से होगी कि वारदात को अंजाम देने से पहले ही आतंकी मारे जाएंगे या पकड़े जाएँगे।

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