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Una News: आज भी हाथ से चक्की चला गेहूं पीसती है सेवानिवृत्त शिक्षिका
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आधुनिकता के दौर में पुरानी धरोहरों और परंपराओं की विरासत जिंदा
गगरेट के कई गांवों में आज भी सहेज कर रखी हैं पुरातन काल की वस्तुएं
संवाद न्यूज एजेंसी
घनारी (ऊना)। उपमंडल गगरेट के कई गांवों में आज भी पुरातन काल की वस्तुएं और परंपरागत उपकरण सहेज कर रखे गए हैं। यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं। आधुनिक तकनीकी युग में जहां हर चीज डिजिटल और स्वचालित हो रही है वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में लोग आज भी पारंपरिक उपकरणों का इस्तेमाल कर रहे हैं। हाथ चक्की और पन चक्की यानी घराट, ये दोनों पारंपरिक उपकरण यहां मौजूद हैं। ये गेहूं, मक्की और अन्य अनाज पीसने के काम आते हैं। सेवानिवृत्त शिक्षिका नीलम देवी ने बताया कि हाथ से चक्की चलाने में मेहनत लगती है, लेकिन यह अनाज को बिना गर्म किए पीसती है। इससे पोषण बना रहता है। वहीं, नदियों के पानी से चलने वाले घराटों का उपयोग आज भी कुछ क्षेत्रों में अनाज पीसने के लिए किया जाता है। यह पर्यावरण अनुकूल और ऊर्जा-कुशल उपकरण है। हाथ से चलने वाली मशीन का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं के लिए चारा तैयार करने में किया जाता है। आज के इस दौर में जहां ट्रैक्टर ने अधिकांश खेती पर कब्जा कर लिया है वहीं कुछ किसान अभी भी बैलों से हल जोतकर जैविक खेती को प्रोत्साहित कर रहे हैं। अगर मिट्टी के बर्तनों की बात की जाए तो आधुनिक किचन के बावजूद कई घरों में खाना बनाने और पानी ठंडा रखने के लिए मिट्टी के बर्तनों का उपयोग होता है। कहीं–कहीं आपको कपास से सूत कातने के लिए चरखे का इस्तेमाल भी देखने को मिल जाएगा, जो कभी हमारी आजादी के आंदोलन का प्रतीक था। आज भी इसे कुछ लोग कला और परंपरा के रूप में संजो रहे हैं। इन पारंपरिक वस्तुओं का उपयोग न केवल पर्यावरण के लिए अनुकूल है, बल्कि यह स्वच्छता और स्वास्थ्य को भी बढ़ावा देता है। हाथ से किए जाने वाले कार्यों से शारीरिक व्यायाम होता है, जो जीवनशैली से जुड़े कई रोगों को दूर रखने में सहायक है।
संरक्षण की आवश्यकता
आज के युग में जब पुरानी वस्तुएं लुप्त होती जा रही हैं, इन्हें बचाने और नई पीढ़ी को इनके महत्व के बारे में शिक्षित करने की आवश्यकता है। कई परिवारों ने इन धरोहरों को केवल उपयोग के लिए ही नहीं, बल्कि संग्रहणीय वस्तुओं के रूप में भी संभाल कर रखा है। भारत की ग्रामीण संस्कृति में छुपी इन परंपराओं और धरोहरों का संरक्षण करना हमारी जिम्मेदारी है। ये न केवल हमारे अतीत का सम्मान है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा भी है कि कैसे प्राकृतिक और पारंपरिक तरीकों से जीवन को सरल और स्वास्थ्यप्रद बनाया जा सकता है।
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गगरेट के कई गांवों में आज भी सहेज कर रखी हैं पुरातन काल की वस्तुएं
संवाद न्यूज एजेंसी
घनारी (ऊना)। उपमंडल गगरेट के कई गांवों में आज भी पुरातन काल की वस्तुएं और परंपरागत उपकरण सहेज कर रखे गए हैं। यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं। आधुनिक तकनीकी युग में जहां हर चीज डिजिटल और स्वचालित हो रही है वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में लोग आज भी पारंपरिक उपकरणों का इस्तेमाल कर रहे हैं। हाथ चक्की और पन चक्की यानी घराट, ये दोनों पारंपरिक उपकरण यहां मौजूद हैं। ये गेहूं, मक्की और अन्य अनाज पीसने के काम आते हैं। सेवानिवृत्त शिक्षिका नीलम देवी ने बताया कि हाथ से चक्की चलाने में मेहनत लगती है, लेकिन यह अनाज को बिना गर्म किए पीसती है। इससे पोषण बना रहता है। वहीं, नदियों के पानी से चलने वाले घराटों का उपयोग आज भी कुछ क्षेत्रों में अनाज पीसने के लिए किया जाता है। यह पर्यावरण अनुकूल और ऊर्जा-कुशल उपकरण है। हाथ से चलने वाली मशीन का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं के लिए चारा तैयार करने में किया जाता है। आज के इस दौर में जहां ट्रैक्टर ने अधिकांश खेती पर कब्जा कर लिया है वहीं कुछ किसान अभी भी बैलों से हल जोतकर जैविक खेती को प्रोत्साहित कर रहे हैं। अगर मिट्टी के बर्तनों की बात की जाए तो आधुनिक किचन के बावजूद कई घरों में खाना बनाने और पानी ठंडा रखने के लिए मिट्टी के बर्तनों का उपयोग होता है। कहीं–कहीं आपको कपास से सूत कातने के लिए चरखे का इस्तेमाल भी देखने को मिल जाएगा, जो कभी हमारी आजादी के आंदोलन का प्रतीक था। आज भी इसे कुछ लोग कला और परंपरा के रूप में संजो रहे हैं। इन पारंपरिक वस्तुओं का उपयोग न केवल पर्यावरण के लिए अनुकूल है, बल्कि यह स्वच्छता और स्वास्थ्य को भी बढ़ावा देता है। हाथ से किए जाने वाले कार्यों से शारीरिक व्यायाम होता है, जो जीवनशैली से जुड़े कई रोगों को दूर रखने में सहायक है।
संरक्षण की आवश्यकता
आज के युग में जब पुरानी वस्तुएं लुप्त होती जा रही हैं, इन्हें बचाने और नई पीढ़ी को इनके महत्व के बारे में शिक्षित करने की आवश्यकता है। कई परिवारों ने इन धरोहरों को केवल उपयोग के लिए ही नहीं, बल्कि संग्रहणीय वस्तुओं के रूप में भी संभाल कर रखा है। भारत की ग्रामीण संस्कृति में छुपी इन परंपराओं और धरोहरों का संरक्षण करना हमारी जिम्मेदारी है। ये न केवल हमारे अतीत का सम्मान है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा भी है कि कैसे प्राकृतिक और पारंपरिक तरीकों से जीवन को सरल और स्वास्थ्यप्रद बनाया जा सकता है।
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