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Una News: सस्ते डिपुओं का राशन सेहतमंद नहीं, लोग कर रहे किनारा
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ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले कई मध्य और संपन्न वर्ग के लोग डिपो से नहीं लेते राशन
डिपो से मिलने वाली वस्तुओं की गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरती
लोगों ने कहा, बाजार में ब्रांड और क्वालिटी की विविधता उपलब्ध
बोले, कुछ डिपो होल्डर इस स्थिति का गलत फायदा भी उठा रहे
संवाद न्यूज एजेंसी
घनारी (ऊना)। सहकारी सभाओं के डिपुओं में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता में कमी और दाम में कम अंतर के चलते लोगों का मोह भंग होने लगा है। गरीब लोग मजबूरी में ही इसे खरीद रहे हैं। क्षेत्र के अधिकांश गांवों में कार्यरत सहकारी सभाओं के माध्यम से सरकार पीडीएस, बीपीएल और सामान्य राशन कार्ड धारकों को चावल, आटा, दालें, खाद्य तेल, चीनी आदि वस्तुएं सब्सिडी पर उपलब्ध करवाती है। उपभोक्ताओं का कहना है कि राशन डिपुओं में मिलने वाली खाद्य वस्तुओं की गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरती। सामान के दाम भी बाजार के मूल्य से बहुत ज्यादा अंतर नहीं रखते। बाजार में ब्रांड और गुणवत्ता की विविधता उपलब्ध होती है। कुछ डिपो होल्डर इस स्थिति का गलत फायदा भी उठा रहे हैं। बचे हुए कोटे को प्रवासी मजदूरों को बेचना या होलसेल से सामान खरीदकर नकद में ज्यादा रेट पर ग्राहकों को बेचना आम होता जा रहा है। ऐसे में जहां कुछ जरूरतमंदों को राहत मिल रही, वहीं व्यवस्था में खामियां भी खुलकर सामने आ रही हैं। मध्य और संपन्न वर्ग के लोग तो डिपुओं से कम ही सामान खरीद रहे हैं। डिपुओं की स्थिति को लेकर स्थानीय लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएं इस प्रकार दीं।
मैं डिपो से ही राशन लेती हूं। बीपीएल कार्डधारक हैं। यहां से आटा, दाल, तेल सस्ते मिल जाते हैं, जिससे महीने का खर्च कुछ कंट्रोल में रहता है। क्वालिटी कुछ खास नहीं है, पर इतने दाम में यही मिल सकता है। -रक्षा देवी, गृहिणी।
पहले डिपो से सामान खरीदते थे। अब बाजार से ही खरीद रहे हैं। डिपो में जो आटा मिलता है, उससे रोटियां ठीक नहीं बनती। बच्चों को पसंद नहीं आती। ऊपर से वही दाम देकर कम क्वालिटी क्यों लें। -अजय कुमार, मजदूर
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मेरा परिवार डिपो से सामान नहीं लेता। एक तो दामों का अधिक अंतर नहीं, दूसरा गुणवत्ता का भरोसा नहीं रहता। बाजार और डिपो के रेट लगभग एक समान ही हैं। अगर बाजार में थोड़े ज्यादा पैसे भी लग जाएं तो भी बुरा नहीं है। अपनी मर्ज़ी की क्वालिटी खरीद सकते हैं। -हरीश कुमार, किसान
डिपो का सिस्टम गरीबों के लिए है, लेकिन सरकार को इसके दाम और क्वालिटी पर ध्यान देना चाहिए ताकि सामान्य और मध्य वर्ग भी इससे अधिक से अधिक जुड़ सके। अभी तो अधिकतर लोग बाजार को ही प्राथमिकता देते हैं। -मुकेश मिश्रा, पुजारी
गगरेट में किराये पर रहता हूं। डिपो वाले कई बार हम जैसे लोगों को भी सामान बेचते हैं। थोड़ा ज्यादा पैसे लेते हैं। फिर भी ठीक रहता है क्योंकि बाजार में तो और महंगा है। -प्रवासी मजदूर लाल बाबू
अगर डिपो न हो तो हम जैसे लोगों का गुज़ारा मुश्किल हो जाए। सस्ता राशन ही सहारा है, लेकिन कई बार गड़बड़ी होती है। वज़न कम, सामान देर से मिलना। कई वस्तुओं की आपूर्ति हर माह नहीं होती। इससे रसोई का सारा बजट बिगड़ जाता है। -बल्ली चौधरी, स्थानीय दिहाड़ीदार
डिपुओं में मिलने वाली खाद्य व अन्य वस्तुओं के दाम सरकार की ओर से निर्धारित है। इसमें हम अपने स्तर पर बदलाव नहीं कर सकते। भविष्य में अगर इसको लेकर दिशा निर्देश आते हैं, तो निश्चित तौर पर उन्हें लागू किया जाएगा।
राजीव शर्मा, नियंत्रक खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले जिला ऊना।
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डिपो से मिलने वाली वस्तुओं की गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरती
लोगों ने कहा, बाजार में ब्रांड और क्वालिटी की विविधता उपलब्ध
बोले, कुछ डिपो होल्डर इस स्थिति का गलत फायदा भी उठा रहे
संवाद न्यूज एजेंसी
घनारी (ऊना)। सहकारी सभाओं के डिपुओं में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता में कमी और दाम में कम अंतर के चलते लोगों का मोह भंग होने लगा है। गरीब लोग मजबूरी में ही इसे खरीद रहे हैं। क्षेत्र के अधिकांश गांवों में कार्यरत सहकारी सभाओं के माध्यम से सरकार पीडीएस, बीपीएल और सामान्य राशन कार्ड धारकों को चावल, आटा, दालें, खाद्य तेल, चीनी आदि वस्तुएं सब्सिडी पर उपलब्ध करवाती है। उपभोक्ताओं का कहना है कि राशन डिपुओं में मिलने वाली खाद्य वस्तुओं की गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरती। सामान के दाम भी बाजार के मूल्य से बहुत ज्यादा अंतर नहीं रखते। बाजार में ब्रांड और गुणवत्ता की विविधता उपलब्ध होती है। कुछ डिपो होल्डर इस स्थिति का गलत फायदा भी उठा रहे हैं। बचे हुए कोटे को प्रवासी मजदूरों को बेचना या होलसेल से सामान खरीदकर नकद में ज्यादा रेट पर ग्राहकों को बेचना आम होता जा रहा है। ऐसे में जहां कुछ जरूरतमंदों को राहत मिल रही, वहीं व्यवस्था में खामियां भी खुलकर सामने आ रही हैं। मध्य और संपन्न वर्ग के लोग तो डिपुओं से कम ही सामान खरीद रहे हैं। डिपुओं की स्थिति को लेकर स्थानीय लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएं इस प्रकार दीं।
मैं डिपो से ही राशन लेती हूं। बीपीएल कार्डधारक हैं। यहां से आटा, दाल, तेल सस्ते मिल जाते हैं, जिससे महीने का खर्च कुछ कंट्रोल में रहता है। क्वालिटी कुछ खास नहीं है, पर इतने दाम में यही मिल सकता है। -रक्षा देवी, गृहिणी।
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पहले डिपो से सामान खरीदते थे। अब बाजार से ही खरीद रहे हैं। डिपो में जो आटा मिलता है, उससे रोटियां ठीक नहीं बनती। बच्चों को पसंद नहीं आती। ऊपर से वही दाम देकर कम क्वालिटी क्यों लें। -अजय कुमार, मजदूर
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मेरा परिवार डिपो से सामान नहीं लेता। एक तो दामों का अधिक अंतर नहीं, दूसरा गुणवत्ता का भरोसा नहीं रहता। बाजार और डिपो के रेट लगभग एक समान ही हैं। अगर बाजार में थोड़े ज्यादा पैसे भी लग जाएं तो भी बुरा नहीं है। अपनी मर्ज़ी की क्वालिटी खरीद सकते हैं। -हरीश कुमार, किसान
डिपो का सिस्टम गरीबों के लिए है, लेकिन सरकार को इसके दाम और क्वालिटी पर ध्यान देना चाहिए ताकि सामान्य और मध्य वर्ग भी इससे अधिक से अधिक जुड़ सके। अभी तो अधिकतर लोग बाजार को ही प्राथमिकता देते हैं। -मुकेश मिश्रा, पुजारी
गगरेट में किराये पर रहता हूं। डिपो वाले कई बार हम जैसे लोगों को भी सामान बेचते हैं। थोड़ा ज्यादा पैसे लेते हैं। फिर भी ठीक रहता है क्योंकि बाजार में तो और महंगा है। -प्रवासी मजदूर लाल बाबू
अगर डिपो न हो तो हम जैसे लोगों का गुज़ारा मुश्किल हो जाए। सस्ता राशन ही सहारा है, लेकिन कई बार गड़बड़ी होती है। वज़न कम, सामान देर से मिलना। कई वस्तुओं की आपूर्ति हर माह नहीं होती। इससे रसोई का सारा बजट बिगड़ जाता है। -बल्ली चौधरी, स्थानीय दिहाड़ीदार
डिपुओं में मिलने वाली खाद्य व अन्य वस्तुओं के दाम सरकार की ओर से निर्धारित है। इसमें हम अपने स्तर पर बदलाव नहीं कर सकते। भविष्य में अगर इसको लेकर दिशा निर्देश आते हैं, तो निश्चित तौर पर उन्हें लागू किया जाएगा।
राजीव शर्मा, नियंत्रक खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले जिला ऊना।