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Una News: बिना जुताई होगी आलू की खेती, जमीन के ऊपर पराली में तैयार होगी फसल
Sat, 28 Feb 2026 06:50 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
Updated Sat, 28 Feb 2026 06:50 AM IST
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बडूही (ऊना)। किसानों के लिए खुशखबरी है। कृषि अनुसंधान उप केंद्र अकरोट के वैज्ञानिकों ने बिना खेत जोते पराली में आलू उगाने की सफल तकनीक विकसित कर एक नई मिसाल पेश की है। इस नवाचार से आलू उत्पादकों को लागत में भारी कमी, श्रम की बचत और बेहतर उत्पादन का लाभ मिलेगा।
कृषि वैज्ञानिकों ने नमी युक्त खेत में आलू के बीजों को सीधे जमीन के ऊपर रखा और लगभग पौने फीट मोटी धान की पराली से ढक दिया। इस तकनीक में न तो खेत की जुताई की जरूरत पड़ती है, न ही मेंढ़-नाली बनाने या आलू पर मिट्टी चढ़ाने की। खास बात यह है कि फसल तैयार होने पर आलू निकालने के लिए खेत खोदना भी नहीं पड़ता। जहां सामान्य तरीके से आलू की फसल में हर 10–12 दिन बाद सिंचाई करनी पड़ती है, वहीं इस तकनीक में केवल तीन बार पानी देने से फसल तैयार हो जाती है। इससे पानी की बचत के साथ-साथ सिंचाई पर होने वाला खर्च भी कम होता है। धान की पराली से मल्चिंग होने के कारण खरपतवार उगने की संभावना बेहद कम रहती है। इसलिए इस विधि में किसी भी प्रकार के खरपतवारनाशी रसायन का छिड़काव नहीं किया गया। इससे उत्पादन लागत घटती है और आलू स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अधिक सुरक्षित व लाभदायक बनता है।
इस तकनीक को उपमंडल अंब के गांव चूरूडू में पूर्व प्रधान एवं प्रगतिशील महिला किसान सुरेश कुमारी ने अपनाया। प्रारंभ में उन्हें संदेह था लेकिन जब फसल तैयार हुई तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। बेहतर उत्पादन और कम लागत ने इस तकनीक की उपयोगिता सिद्ध कर दी।
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सेहत के लिए लाभदायक होगी तैयार फसल
कृषि वैज्ञानिक डॉ. सौरव शर्मा के अनुसार इस विधि से हर किस्म का आलू तैयार किया जा सकता है। विशेष रूप से ‘कुफरी नीलकंठ’ किस्म में एंटीऑक्सीडेंट, कैरोटिन और एंथोसाइनिन जैसे पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो सेहत के लिए लाभदायक हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। शून्य जुताई तकनीक में धान की बची पराली का उपयोग होता है। आमतौर पर किसान पराली जलाने को मजबूर होते हैं, जिससे कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन, वायु प्रदूषण और मृदा जीवों की हानि होती है। इस तकनीक से न केवल पराली जलाने की समस्या का समाधान होगा बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।
इस नवाचार की सफलता को देखते हुए चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के कुलपति डॉ. अशोक कुमार पांडा ने स्वयं चुरूडू में किसान सुरेश कुमारी के खेत का निरीक्षण किया। उनके साथ प्रसार निदेशन डॉ. विनोद शर्मा, आत्मा ऊना की निदेशक डॉ. प्यारो देवी तथा जिला कृषि अधिकारी डॉ. दविंदर कौर भी उपस्थित रहीं।
कुलपति डॉ. अशोक कुमार पांडा का कहना है कि इस तकनीक को व्यापक स्तर पर अपनाने से किसानों की लागत घटेगी, समय और मजदूरी बचेगी तथा उत्पादन बढ़ेगा। बंपर पैदावार के साथ पर्यावरण संरक्षण का यह मॉडल प्रदेश के आलू उत्पादकों के लिए आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।
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कृषि वैज्ञानिकों ने नमी युक्त खेत में आलू के बीजों को सीधे जमीन के ऊपर रखा और लगभग पौने फीट मोटी धान की पराली से ढक दिया। इस तकनीक में न तो खेत की जुताई की जरूरत पड़ती है, न ही मेंढ़-नाली बनाने या आलू पर मिट्टी चढ़ाने की। खास बात यह है कि फसल तैयार होने पर आलू निकालने के लिए खेत खोदना भी नहीं पड़ता। जहां सामान्य तरीके से आलू की फसल में हर 10–12 दिन बाद सिंचाई करनी पड़ती है, वहीं इस तकनीक में केवल तीन बार पानी देने से फसल तैयार हो जाती है। इससे पानी की बचत के साथ-साथ सिंचाई पर होने वाला खर्च भी कम होता है। धान की पराली से मल्चिंग होने के कारण खरपतवार उगने की संभावना बेहद कम रहती है। इसलिए इस विधि में किसी भी प्रकार के खरपतवारनाशी रसायन का छिड़काव नहीं किया गया। इससे उत्पादन लागत घटती है और आलू स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अधिक सुरक्षित व लाभदायक बनता है।
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इस तकनीक को उपमंडल अंब के गांव चूरूडू में पूर्व प्रधान एवं प्रगतिशील महिला किसान सुरेश कुमारी ने अपनाया। प्रारंभ में उन्हें संदेह था लेकिन जब फसल तैयार हुई तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। बेहतर उत्पादन और कम लागत ने इस तकनीक की उपयोगिता सिद्ध कर दी।
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सेहत के लिए लाभदायक होगी तैयार फसल
कृषि वैज्ञानिक डॉ. सौरव शर्मा के अनुसार इस विधि से हर किस्म का आलू तैयार किया जा सकता है। विशेष रूप से ‘कुफरी नीलकंठ’ किस्म में एंटीऑक्सीडेंट, कैरोटिन और एंथोसाइनिन जैसे पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो सेहत के लिए लाभदायक हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। शून्य जुताई तकनीक में धान की बची पराली का उपयोग होता है। आमतौर पर किसान पराली जलाने को मजबूर होते हैं, जिससे कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन, वायु प्रदूषण और मृदा जीवों की हानि होती है। इस तकनीक से न केवल पराली जलाने की समस्या का समाधान होगा बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।
इस नवाचार की सफलता को देखते हुए चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के कुलपति डॉ. अशोक कुमार पांडा ने स्वयं चुरूडू में किसान सुरेश कुमारी के खेत का निरीक्षण किया। उनके साथ प्रसार निदेशन डॉ. विनोद शर्मा, आत्मा ऊना की निदेशक डॉ. प्यारो देवी तथा जिला कृषि अधिकारी डॉ. दविंदर कौर भी उपस्थित रहीं।
कुलपति डॉ. अशोक कुमार पांडा का कहना है कि इस तकनीक को व्यापक स्तर पर अपनाने से किसानों की लागत घटेगी, समय और मजदूरी बचेगी तथा उत्पादन बढ़ेगा। बंपर पैदावार के साथ पर्यावरण संरक्षण का यह मॉडल प्रदेश के आलू उत्पादकों के लिए आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।