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विकलांगता पर हौसले की जीत है पहल
Updated Mon, 16 Apr 2018 06:15 PM IST
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हौसले की जीत है पहल कैंटीन, सामान्य सेवाएं दे रहे छह दिव्यांग
उपायुक्त, एनसीएससी की शुरूआत का असर, कोई दृष्टि से तो कोई पूरी तरह श्रवण बाधित
स्वयं सहायता समूह बदलने लगा धीरे-धीरे तस्वीर
शशिभूषण पुरोहित
ऊना।
...दिव्यांग शब्द सुनकर आपके जहन में क्या तस्वीर बनती है? बेबस और बेसहारा इंसान जिसको दुनिया की सहानुभूति तले जीना पड़ता है। एकदम गलत। जब आप इन छह दिव्यांगों से मिलेंगे तो आपकी धारणा बिल्कुल बदल जाएगी। डीसी ऑफिस ऊना के सहयोग से संचालित पहल कैंटीन में स्वरोजगार के लिए काम कर रहे इन युवाओं ने साबित कर दिखाया है कि विकलांगता केवल दिमाग की उपज है। अगर आपमें कुछ करने का जज्बा हो तो मुश्किलें खुद आसान हो जाती हैं। उपायुक्त विकास लाबरू की पहल से नेशनल कैरियर सर्विस सेंटर (एनसीएसई) की ओर से संचालित यह कैंटीन यहां काम करने वाले दिव्यांगों की धीरे-धीरे तस्वीर और तकदीर बदलने लगी है।
‘अमर उजाला’ ने जब इन युवाओं से बात की तो काम के प्रति इनका जज्बा देखते ही बन रहा था। आईआरडीपी परिवार से संबंधित देश राज की 40 प्रतिशत आंखों की रोशनी नहीं है। उसके हाथों से बने समोसे किसी अच्छे से अच्छे हलवाई को फेल कर सकते हैं। देश राज इस कैंटीन में बतौर कुक पूरा काम संभाल रहा है। दसवीं कक्षा के दौरान पूरी तरह से आंखों की रोशनी खो चुका देहलां निवासी अमन दीप बतौर हेल्पर सर्विस का काम देख रहा है। काम करते हुए कोई यह नहीं कह सकता कि अमन पूरी तरह से दृष्टि बाधित है। वहीं, प्राथमिक कक्षा तक पढ़ा खुरवाईं निवासी पंकज 75 प्रतिशत श्रवण बाधित है। तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ा पंकज कान के नजदीक बहुत ऊंची आवाज करने पर थोड़ा सा सुन पाता है। उसके काम के लिए फुर्ती देखते ही बनती है। बोलने में अक्षम पंकज इशारों में कहता है कि इस कैंटीन से उसकी जिंदगी बदलने लगी है। राजेश कुमार शारीरिक रूप से लगभग 42 प्रतिशत विकलांग है। लिहाजा, कैश काउंटर का पूरा काम राजेश ही देख रहा है। बतौर हेल्पर सेवाएं दे रहे मनोज की माता बीमार रहती हैं और बिस्तर पर हैं। मनोज ने बताया कि इस कैंटीन से वह न केवल अपना बल्कि मां की दवाइयों का खर्च भी निकाल रहा है। तीन भाई बहन में सबसे बड़ा शिव कुमार जन्म से ही विकलांग है। शिव कुमार चाय की सर्विस का काम बड़ी कुशलता से करता है। इन दिव्यांगों ने साबित कर दिखाया है कि किसी भी तरह की शारीरिक कमजोरी आदमी के जज्बे को कम नहीं कर सकती।
डीसी ऑफिस से मिले पूरा आर्डर तो बढ़ेगी आय
यूं तो यह कैंटीन डीसी ऑफिस के सहयोग से ही संचालित है। लेकिन यहां काम कर रहे सदस्यों ने बताया कि अधिकांश बड़ी बैठकों को लेकर चाय का ऑडर उन्हें नहीं मिल पा रहा है। अगर डीसी ऑफिस के साथ जुड़े अन्य कार्यालयों में होने वाली बैठकों के ऑर्डर उन्हें मिलें तो स्वरोजगार में बढ़ोतरी होगी।
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उपायुक्त विकास लाबरू का कहना है कि डीसी ऑफिस की पहल से ही इस कैंटीन को खोला गया है। वह अन्य विभागों को भी कैंटीन की सेवाएं लेने के लिए कहेंगे। उन्होंने कहा कि यह कैंटीन स्वयं में एक आदर्श स्थापित करेगी।
कुफरी में दिया गया प्रशिक्षण : डॉ. पांडेय
नेशनल कैरियर सर्विस सेंटर के उपनिदेशक एवं प्रभारी डॉ बीके पांडेय ने बताया कि कैंटीन में काम करने वाले सभी दिव्यांगजनों को इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट, कैटरिंग एंड न्यूट्रीशन कुफरी शिमला से विशेष प्रशिक्षण दिलाया है। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण के बाद सभी सदस्य किसी भी सामान्य व्यक्ति की तरह काम कर रहे हैं। उन्होंने ऐसे दिव्यांगजनों से सेंटर से संपर्क करने का अनुरोध किया है जो रोजगार की तलाश में हैं।
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उपायुक्त, एनसीएससी की शुरूआत का असर, कोई दृष्टि से तो कोई पूरी तरह श्रवण बाधित
स्वयं सहायता समूह बदलने लगा धीरे-धीरे तस्वीर
शशिभूषण पुरोहित
ऊना।
...दिव्यांग शब्द सुनकर आपके जहन में क्या तस्वीर बनती है? बेबस और बेसहारा इंसान जिसको दुनिया की सहानुभूति तले जीना पड़ता है। एकदम गलत। जब आप इन छह दिव्यांगों से मिलेंगे तो आपकी धारणा बिल्कुल बदल जाएगी। डीसी ऑफिस ऊना के सहयोग से संचालित पहल कैंटीन में स्वरोजगार के लिए काम कर रहे इन युवाओं ने साबित कर दिखाया है कि विकलांगता केवल दिमाग की उपज है। अगर आपमें कुछ करने का जज्बा हो तो मुश्किलें खुद आसान हो जाती हैं। उपायुक्त विकास लाबरू की पहल से नेशनल कैरियर सर्विस सेंटर (एनसीएसई) की ओर से संचालित यह कैंटीन यहां काम करने वाले दिव्यांगों की धीरे-धीरे तस्वीर और तकदीर बदलने लगी है।
‘अमर उजाला’ ने जब इन युवाओं से बात की तो काम के प्रति इनका जज्बा देखते ही बन रहा था। आईआरडीपी परिवार से संबंधित देश राज की 40 प्रतिशत आंखों की रोशनी नहीं है। उसके हाथों से बने समोसे किसी अच्छे से अच्छे हलवाई को फेल कर सकते हैं। देश राज इस कैंटीन में बतौर कुक पूरा काम संभाल रहा है। दसवीं कक्षा के दौरान पूरी तरह से आंखों की रोशनी खो चुका देहलां निवासी अमन दीप बतौर हेल्पर सर्विस का काम देख रहा है। काम करते हुए कोई यह नहीं कह सकता कि अमन पूरी तरह से दृष्टि बाधित है। वहीं, प्राथमिक कक्षा तक पढ़ा खुरवाईं निवासी पंकज 75 प्रतिशत श्रवण बाधित है। तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ा पंकज कान के नजदीक बहुत ऊंची आवाज करने पर थोड़ा सा सुन पाता है। उसके काम के लिए फुर्ती देखते ही बनती है। बोलने में अक्षम पंकज इशारों में कहता है कि इस कैंटीन से उसकी जिंदगी बदलने लगी है। राजेश कुमार शारीरिक रूप से लगभग 42 प्रतिशत विकलांग है। लिहाजा, कैश काउंटर का पूरा काम राजेश ही देख रहा है। बतौर हेल्पर सेवाएं दे रहे मनोज की माता बीमार रहती हैं और बिस्तर पर हैं। मनोज ने बताया कि इस कैंटीन से वह न केवल अपना बल्कि मां की दवाइयों का खर्च भी निकाल रहा है। तीन भाई बहन में सबसे बड़ा शिव कुमार जन्म से ही विकलांग है। शिव कुमार चाय की सर्विस का काम बड़ी कुशलता से करता है। इन दिव्यांगों ने साबित कर दिखाया है कि किसी भी तरह की शारीरिक कमजोरी आदमी के जज्बे को कम नहीं कर सकती।
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डीसी ऑफिस से मिले पूरा आर्डर तो बढ़ेगी आय
यूं तो यह कैंटीन डीसी ऑफिस के सहयोग से ही संचालित है। लेकिन यहां काम कर रहे सदस्यों ने बताया कि अधिकांश बड़ी बैठकों को लेकर चाय का ऑडर उन्हें नहीं मिल पा रहा है। अगर डीसी ऑफिस के साथ जुड़े अन्य कार्यालयों में होने वाली बैठकों के ऑर्डर उन्हें मिलें तो स्वरोजगार में बढ़ोतरी होगी।
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उपायुक्त विकास लाबरू का कहना है कि डीसी ऑफिस की पहल से ही इस कैंटीन को खोला गया है। वह अन्य विभागों को भी कैंटीन की सेवाएं लेने के लिए कहेंगे। उन्होंने कहा कि यह कैंटीन स्वयं में एक आदर्श स्थापित करेगी।
कुफरी में दिया गया प्रशिक्षण : डॉ. पांडेय
नेशनल कैरियर सर्विस सेंटर के उपनिदेशक एवं प्रभारी डॉ बीके पांडेय ने बताया कि कैंटीन में काम करने वाले सभी दिव्यांगजनों को इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट, कैटरिंग एंड न्यूट्रीशन कुफरी शिमला से विशेष प्रशिक्षण दिलाया है। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण के बाद सभी सदस्य किसी भी सामान्य व्यक्ति की तरह काम कर रहे हैं। उन्होंने ऐसे दिव्यांगजनों से सेंटर से संपर्क करने का अनुरोध किया है जो रोजगार की तलाश में हैं।