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शिव और शक्ति के संगम से होता है सृष्टि का संतुलन : शांडिल्य
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कुनिहार में कथा के दौरान मौजूद लोग। संवाद
शिव तांडव गुफा में शिव महापुराण कथा का बताया सार
संवाद न्यूज एजेंसी
कुनिहार(सोलन)। शिव तांडव गुफा कुनिहार में शिव महापुराण कथा के पांचवें दिन आचार्य बलवंत शांडिल्य ने नारी महिमा, परिवार में स्त्री की भूमिका और शक्ति स्वरूपा माता पार्वती का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने शिव-पार्वती प्रसंगों के माध्यम से बताया कि सृष्टि का संतुलन तभी संभव है, जब शिव और शक्ति का संगम बना रहे।
कथा में माता पार्वती की तपस्या का प्रसंग सुनाते हुए आचार्य ने बताया कि किस प्रकार देवी ने अटूट संकल्प, धैर्य और भक्ति से भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया। यह प्रसंग नारी के आत्मबल, धैर्य और समर्पण का प्रतीक है। उन्होंने समझाया कि नारी केवल गृहस्थ जीवन की आधारशिला ही नहीं, बल्कि संस्कृति, करुणा और संस्कारों की जननी भी है।
कथा में संदेश दिया गया कि जिस घर में स्त्री का सम्मान होता है, वहां स्वयं देवताओं का वास माना जाता है। नारी को देवी का स्वरूप मानकर उसका आदर करना ही सच्ची शिव भक्ति है। आचार्य बलवंत शांडिल्य ने माता अन्नपूर्णा और दुर्गा के स्वरूपों का उल्लेख करते हुए कहा कि नारी में पालन, शक्ति और संरक्षण - तीनों रूप समाहित हैं। कथा का मूल संदेश रहा कि समाज की उन्नति नारी सम्मान और संस्कारों के संरक्षण से ही संभव है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
कुनिहार(सोलन)। शिव तांडव गुफा कुनिहार में शिव महापुराण कथा के पांचवें दिन आचार्य बलवंत शांडिल्य ने नारी महिमा, परिवार में स्त्री की भूमिका और शक्ति स्वरूपा माता पार्वती का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने शिव-पार्वती प्रसंगों के माध्यम से बताया कि सृष्टि का संतुलन तभी संभव है, जब शिव और शक्ति का संगम बना रहे।
कथा में माता पार्वती की तपस्या का प्रसंग सुनाते हुए आचार्य ने बताया कि किस प्रकार देवी ने अटूट संकल्प, धैर्य और भक्ति से भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया। यह प्रसंग नारी के आत्मबल, धैर्य और समर्पण का प्रतीक है। उन्होंने समझाया कि नारी केवल गृहस्थ जीवन की आधारशिला ही नहीं, बल्कि संस्कृति, करुणा और संस्कारों की जननी भी है।
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कथा में संदेश दिया गया कि जिस घर में स्त्री का सम्मान होता है, वहां स्वयं देवताओं का वास माना जाता है। नारी को देवी का स्वरूप मानकर उसका आदर करना ही सच्ची शिव भक्ति है। आचार्य बलवंत शांडिल्य ने माता अन्नपूर्णा और दुर्गा के स्वरूपों का उल्लेख करते हुए कहा कि नारी में पालन, शक्ति और संरक्षण - तीनों रूप समाहित हैं। कथा का मूल संदेश रहा कि समाज की उन्नति नारी सम्मान और संस्कारों के संरक्षण से ही संभव है।
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