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जर्जर दीवारों के बीच बच्चे सीख रहे अ से आम

Fri, 02 Dec 2016 10:16 PM IST
ब्यूरो, सोलन
ब्यूरो, सोलन Updated Fri, 02 Dec 2016 10:16 PM IST
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The school building not repair in knah
1970 में ग्रामीणों द्वारा श्रमदान करके बनाया गया प्राथमिक स्कूल कनाह अब ढहने की कगार पर है। - फोटो : अमर उजाला

शिक्षा और औद्योगिक हब की डींगे हांककर देश भर में वाहवाही लूटने वाली प्रदेश की सरकारें और जिला प्रशासन सोलन के सरकारी स्कूलों की बदहाली से अनजान है। विश्व मानचित्र पर उभरने का तो नेताओं और अधिकारियों को पता है लेकिन शहर के साथ सटे स्कूलों में नौनिहाल किस कदर अपनी जान जोखिम में डालकर शिक्षा हासिल कर रहे हैं, इसकी जानकारी नहीं है। सोलन से आठ किमी दूर ऐसा ही एक स्कूल सबसे एडवांस जिलों में शुमार सोलन के विकास की कहानी बयां करता है।

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1970 में ग्रामीणों द्वारा श्रमदान करके बनाया गया प्राथमिक स्कूल कनाह अब ढहने की कगार पर है। इतने सालों में सरकार की तरफ स्कूल की मरम्मत के लिए एक पैसा खर्च नहीं हुआ। 100 नौनिहाल इस स्कूल में पढ़ रहे हैं। कमरों की दीवारें झर रही हैं। बिजली के मीटर उखड़ चुके हैं। बच्चेे डर के साये में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। छत टूटकर गिरने वाली हैं और स्कूल में ग्राउंड की कमी के कारण टूटी छत के नीचे बच्चे खेलने को मजबूर हैं।
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ऐलिमेंटरी उपनिदेशक डॉ. चंद्रेश्वर शर्मा ने कहा कि स्कूल की हालत के बारे में उन्हें जानकारी नहीं है। न ही कोई लिखित शिकायत मिली है। ऐसा है तो स्कूल की दशा को सुधारा जाएगा। डीसी डॉ. राकेश कंवर ने कहा कि स्कूल की दशा को सुधारा जाएगा।
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नए भवन का करो निर्माण
स्कूल एसएमसी प्रधान जसवंत सिंह ने कहा कि 46 साल पहले स्थानीय ग्रामीणों ने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के मकसद से खुद ही इस 6 कमरों वाले भवन का निर्माण मिट्टी, लकड़ी और टीन से किया था। इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी शिक्षा विभाग ने इस भवन का विस्तार नहीं किया। न ही स्कूल की इमारत को पक्का करने में कोई दिलचस्पी दिखाई। एसएमसी सदस्य सीमा, पूनम, जितेंद्र और ऊषा समेत सभी अभिभावकों ने स्कूल की मरम्मत की मांग की है। स्कूल भवन को विघटित कर वहां पक्के भवन का निर्माण किया जाए।


विभाग को करवाया है अवगत : सिंह
स्कूल के हेडमास्टर मनोहर सिंह ने स्कूल की खस्ता हालत को माना। कहा कि विभाग को लिखित में स्कूल भवन की खराब हालत के बारे में बताया जा चुका है। भवन की खराब हालत  के चलते शिक्षक बच्चों को खुले में ही पढ़ा रहे हैं। जरूरी होने पर ही कक्षाओं में बच्चों को बिठाया जाता है।

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