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नाहन की डॉ. मोनीषा अग्रवाल से देखा नहीं जाता लावारिस कुत्तों का दर्द
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नाहन में डा मोनीषा अग्रवाल के साथ नसबंदी किए कुत्ते। संवाद
- फोटो : NAHAN
नाहन(सिरमौर)। आज के दौर में जहां कोई अपने सगे रिश्तेदारों की मदद करने के लिए तैयार नहीं है। इसी दौर में नाहन निवासी स्वास्थ्य खंड धगेड़ा में कार्यरत बीएमओ डॉ. मोनीषा अग्रवाल लावारिस कुत्तों की मसीहा बनी हुई हैं।
डॉ. मोनीषा अग्रवाल 13 साल से लावारिस कुत्तों को रोटी देने के साथ-साथ बीमार और चोटिल कुत्तों का उपचार करवा रही हैं। इस काम में कई लोग आपत्ति भी कर रहे हैं लेकिन वह किसी की परवाह किए बिना लावारिस कुत्तों की सेवा में जुटी हैं।
शहर में कहीं भी कुत्ता चोटिल या बीमार हो उसकी सूचना सबसे पहले लोग अब डॉ. मोनीषा अग्रवाल को देते हैं। डॉ. मोनीषा भी उस कुत्ते की सौ प्रतिशत मदद कर रही हैं। शहर के बाहर भी जाकर कुत्ते रेस्क्यू कर रही हैं। लोगों द्वारा इनके सुपुर्द किए कई लावारिस कुत्तों को डॉ. मोनीषा ने अपने घर पर ही आश्रय दिया है। उनकी देखभाल में जब जमा पूंजी खत्म हुई तो पुश्तैनी जेवर तक बेच दिए।
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इस नेक कार्य को पूरा करने में डॉ. मोनीषा अग्रवाल परेशानी भी झेल रही हैं। कुत्तों की मदद करती हैं तो आस-पड़ोस के लोग आपत्ति करते हैं। कई लोग प्रशासन को शिकायत तक कर चुके हैं। इसके बावजूद भी वह इस नेक कार्य से पीछे नहीं हटती। डॉ. मोनीषा अग्रवाल कहती हैं कि हिंदू धर्म में तो जानवरों को भी महत्व दिया गया हैं। शिव भगवान के परिवार में सांप, नंदी बैल, शेर, चूहा, मोर तक साथ रहते हैं। जबकि इनका स्वाभाव विपरीत है।
डॉ. मोनीषा अग्रवाल ने तीन दिन पहले चार लावारिस कुत्तों की नसबंदी करवाई। उनको ठीक होने तक अपने घर में ही आश्रय दिया हुआ है। कालीस्थान मंदिर के पास से ऐसे कुत्ते को रेस्क्यू किया जिसके जख्मों में कीड़े पड़े चुके थे। उसका उपचार करवाया अब वह धीरे-धीरे ठीक हो रहा है। वह कहती है कि लोग बार-बार कहते हैं सड़क का कुत्ता.., जबकि डॉग आवारा नहीं है वह हमारा है..,।
दो साल पहले डॉ. मोनीषा अग्रवाल ने डॉग लवर्स के नाम से व्हाट्सएप समूह भी बनाया। उसमें 80 ऐसे डॉग लवर्स एक मंच में जोड़े, जो ऐसे कुत्तों की देखभाल कर रहे हैं, जिनका इस दुनिया में कोई नहीं। पिछले कुछ अर्से में डॉ. मोनीषा अग्रवाल 150 कुत्तों को गोद (अडॉप्ट) करवा चुकी है।
डॉ. मोनीषा अग्रवाल ने प्रशासन से अपील की है कि कुत्तों के लिए शहर में डॉग शेल्टर खोला जाए और उनकी नसबंदी करवाई जाए। लोगों से भी उन्होंने विदेशी कुत्तों की बजाए शहर के कुत्ते गोद लेने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि विदेशी मानसिकता त्यागें और देसी अपनाए, इसमें खर्चा भी कम है।
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डॉ. मोनीषा अग्रवाल 13 साल से लावारिस कुत्तों को रोटी देने के साथ-साथ बीमार और चोटिल कुत्तों का उपचार करवा रही हैं। इस काम में कई लोग आपत्ति भी कर रहे हैं लेकिन वह किसी की परवाह किए बिना लावारिस कुत्तों की सेवा में जुटी हैं।
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शहर में कहीं भी कुत्ता चोटिल या बीमार हो उसकी सूचना सबसे पहले लोग अब डॉ. मोनीषा अग्रवाल को देते हैं। डॉ. मोनीषा भी उस कुत्ते की सौ प्रतिशत मदद कर रही हैं। शहर के बाहर भी जाकर कुत्ते रेस्क्यू कर रही हैं। लोगों द्वारा इनके सुपुर्द किए कई लावारिस कुत्तों को डॉ. मोनीषा ने अपने घर पर ही आश्रय दिया है। उनकी देखभाल में जब जमा पूंजी खत्म हुई तो पुश्तैनी जेवर तक बेच दिए।
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इस नेक कार्य को पूरा करने में डॉ. मोनीषा अग्रवाल परेशानी भी झेल रही हैं। कुत्तों की मदद करती हैं तो आस-पड़ोस के लोग आपत्ति करते हैं। कई लोग प्रशासन को शिकायत तक कर चुके हैं। इसके बावजूद भी वह इस नेक कार्य से पीछे नहीं हटती। डॉ. मोनीषा अग्रवाल कहती हैं कि हिंदू धर्म में तो जानवरों को भी महत्व दिया गया हैं। शिव भगवान के परिवार में सांप, नंदी बैल, शेर, चूहा, मोर तक साथ रहते हैं। जबकि इनका स्वाभाव विपरीत है।
डॉ. मोनीषा अग्रवाल ने तीन दिन पहले चार लावारिस कुत्तों की नसबंदी करवाई। उनको ठीक होने तक अपने घर में ही आश्रय दिया हुआ है। कालीस्थान मंदिर के पास से ऐसे कुत्ते को रेस्क्यू किया जिसके जख्मों में कीड़े पड़े चुके थे। उसका उपचार करवाया अब वह धीरे-धीरे ठीक हो रहा है। वह कहती है कि लोग बार-बार कहते हैं सड़क का कुत्ता.., जबकि डॉग आवारा नहीं है वह हमारा है..,।
दो साल पहले डॉ. मोनीषा अग्रवाल ने डॉग लवर्स के नाम से व्हाट्सएप समूह भी बनाया। उसमें 80 ऐसे डॉग लवर्स एक मंच में जोड़े, जो ऐसे कुत्तों की देखभाल कर रहे हैं, जिनका इस दुनिया में कोई नहीं। पिछले कुछ अर्से में डॉ. मोनीषा अग्रवाल 150 कुत्तों को गोद (अडॉप्ट) करवा चुकी है।
डॉ. मोनीषा अग्रवाल ने प्रशासन से अपील की है कि कुत्तों के लिए शहर में डॉग शेल्टर खोला जाए और उनकी नसबंदी करवाई जाए। लोगों से भी उन्होंने विदेशी कुत्तों की बजाए शहर के कुत्ते गोद लेने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि विदेशी मानसिकता त्यागें और देसी अपनाए, इसमें खर्चा भी कम है।