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शेर की दहाड़ बिना वन्य प्राणी विहार सूना
Updated Tue, 12 Jun 2018 08:20 PM IST
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शेर की दहाड़ बिना वन्य प्राणी विहार सूना
खटाई में टाइगर का जोड़ा लाने की योजना
तीन दशक में शेरों का पूरा कुनबा हुआ खत्म
योगेंद्र अग्रवाल
ददाहू (सिरमौर)।
वन्य प्राणी विहार रेणुका में सीजेडए की बेरुखी हजारों पर्यटकों पर भारी पड़ रही है। रेणुका के शेर मात्र एक सपना बन कर रह गए हैं। शेरों की मृत्यु के बाद पिछले 3 वर्षों से यहां सैलानी शेरों के खाली पिंजरों को निहारकर लौट रहे हैं। बिना शेरों के पूरा वन्य प्राणी विहार सूना पड़ गया है। जबकि, कुछ समय पहले शेर की दहाड़ पूरी रेणुका घाटी में गूंजकर सबको चौंका देती थी।
तीन दशकों के दौरान शेरों का पूरा कुनबा ही बारी-बारी से दम तोड़ गया। 80 के दशक में अशोक नाम शेर व गीता शेरनी को निहारने दूर-दूर से पर्यटक यहां आया करते थे। उन्हीं का ही यह वंश आगे बढ़कर 29 शेर-शेरनी की संख्या तक पहुंचकर रेणुका की शान को बढ़ा रहा था। इनको बाकायदा नाम लेकर बुलाया जाता था। धीरे-धीरे सभी शेरों ने यहां दम तोड़ दिया। वर्ष 2015 में शेरों के स्वर्गवास के बाद यहां साढ़े तीन साल से वीरानगी का आलम बना हुआ है।
पर्यटक 7 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले सिंह विहार के खाली पिंजरों को निहार कर निराश हो रहे हैं। रेणुकाजी को आज भी शेरों के नाम से ही जाना पहचाना जाता है, जहां कुदरत का भी ऐसा करिश्मा रहा कि एक साथ शेरनियों ने चार-चार शावकों को भी जन्म दिया। अब शेरों का यह भरा पला परिवार एक-एक कर खत्म होता चला गया। उनके स्थान पर न तो दोबारा शेर आए। न ही टाइगर के जोड़ों को रेणुका लाने की योजना रंग लाई। वन्य प्राणी विभाग पिछले 3 वर्षों में टाइगर के जोड़ा लाने की योजना बना रहा है लेकिन सीजेडए की पेचीदा औपचारिकताएं टाइगर के जोड़े की राह में अड़चनें पैदा कर रही हैं। विभाग की यह योजना फाइलों में ही दफन हो कर रह गई।
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उधर, वन्य प्राणी विभाग शिमला के डीएफओ राजेश शर्मा ने बताया कि टाइगर का जोड़ा लाने की अप्रुवल सीजेडए को भेजी जा चुकी है। यहां तक कि टाइगर के पिंजरे का डिजाइन भी सीजेडए को सौंपा जा चुका है। विभाग टाइगर का जोड़ा लाने के लिए पूरी तरह से प्रयासरत है लेकिन सीजेडए हामी नहीं भर रहा है।
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---------योगेंद्र अग्रवाल, हितेश
खटाई में टाइगर का जोड़ा लाने की योजना
तीन दशक में शेरों का पूरा कुनबा हुआ खत्म
योगेंद्र अग्रवाल
ददाहू (सिरमौर)।
वन्य प्राणी विहार रेणुका में सीजेडए की बेरुखी हजारों पर्यटकों पर भारी पड़ रही है। रेणुका के शेर मात्र एक सपना बन कर रह गए हैं। शेरों की मृत्यु के बाद पिछले 3 वर्षों से यहां सैलानी शेरों के खाली पिंजरों को निहारकर लौट रहे हैं। बिना शेरों के पूरा वन्य प्राणी विहार सूना पड़ गया है। जबकि, कुछ समय पहले शेर की दहाड़ पूरी रेणुका घाटी में गूंजकर सबको चौंका देती थी।
तीन दशकों के दौरान शेरों का पूरा कुनबा ही बारी-बारी से दम तोड़ गया। 80 के दशक में अशोक नाम शेर व गीता शेरनी को निहारने दूर-दूर से पर्यटक यहां आया करते थे। उन्हीं का ही यह वंश आगे बढ़कर 29 शेर-शेरनी की संख्या तक पहुंचकर रेणुका की शान को बढ़ा रहा था। इनको बाकायदा नाम लेकर बुलाया जाता था। धीरे-धीरे सभी शेरों ने यहां दम तोड़ दिया। वर्ष 2015 में शेरों के स्वर्गवास के बाद यहां साढ़े तीन साल से वीरानगी का आलम बना हुआ है।
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पर्यटक 7 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले सिंह विहार के खाली पिंजरों को निहार कर निराश हो रहे हैं। रेणुकाजी को आज भी शेरों के नाम से ही जाना पहचाना जाता है, जहां कुदरत का भी ऐसा करिश्मा रहा कि एक साथ शेरनियों ने चार-चार शावकों को भी जन्म दिया। अब शेरों का यह भरा पला परिवार एक-एक कर खत्म होता चला गया। उनके स्थान पर न तो दोबारा शेर आए। न ही टाइगर के जोड़ों को रेणुका लाने की योजना रंग लाई। वन्य प्राणी विभाग पिछले 3 वर्षों में टाइगर के जोड़ा लाने की योजना बना रहा है लेकिन सीजेडए की पेचीदा औपचारिकताएं टाइगर के जोड़े की राह में अड़चनें पैदा कर रही हैं। विभाग की यह योजना फाइलों में ही दफन हो कर रह गई।
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उधर, वन्य प्राणी विभाग शिमला के डीएफओ राजेश शर्मा ने बताया कि टाइगर का जोड़ा लाने की अप्रुवल सीजेडए को भेजी जा चुकी है। यहां तक कि टाइगर के पिंजरे का डिजाइन भी सीजेडए को सौंपा जा चुका है। विभाग टाइगर का जोड़ा लाने के लिए पूरी तरह से प्रयासरत है लेकिन सीजेडए हामी नहीं भर रहा है।
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---------योगेंद्र अग्रवाल, हितेश