{"_id":"5a0ee9a24f1c1b71548bd8e3","slug":"11510926754-sirmour-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"गिरिपार क्षेत्र में आज से शुरू होगा बूढ़ी दिवाली का पर्व","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गिरिपार क्षेत्र में आज से शुरू होगा बूढ़ी दिवाली का पर्व
Updated Fri, 17 Nov 2017 08:04 PM IST
विज्ञापन
दिवाली
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अमर उजाला ब्यूरो
शिलाई (सिरमौर)।
गिरिपार क्षेत्र में दीवाली के ठीक एक माह बाद मनाई जाने वाली बूढ़ी दीवाली की सभी तैयारियां मुकम्मल हो गई हैं। 18 नवंबर से शुरू होने वाले इस त्योहार की तैयारियों में क्षेत्र के लोग एक माह से जुटे हुए थे। क्षेत्र में यह त्योहार 3 से 7 दिनों तक मनाया जाएगा।
बूढ़ी दिवाली का त्योहार गिरिपार क्षेत्र में सदियों से पारंपरिक अंदाज में मनाया जाता है। क्षेत्र के लोग इस दौरान कई तरह के पकवान भी बनाते हैं जिसमें गेहूं को उबालकर व भून कर मुड़ा, धान की चिवड़ा, मैदे व चावलों की शाकुली, भांग, भंगजीरा, अखरोट की गिरी के मिश्रण से बना मूड़ा शामिल हैं। यह सभी पकवान बहुत स्वादिष्ट होते हैं जो कि घर आए मेहमानों को परोसे जाते हैं।
अमावस्या के दिन शुरू होने वाली बूढ़ी दीवाली को कौरव व पांडव पक्ष के लोग अपने गांव के सांझा आंगन में एकत्रित होकर मशालों का जलूस निकालकर गांव से थोड़ी दूर जाकर बलि राजा का पुतला भी जलाते हैं। पांडव पक्ष के लोग रात को 12 बजे से पूर्व मशाल यात्रा निकालते हैं जबकि कौरव पक्ष के लोग रात 3 बजे मशाल यात्रा कर बलि राजा का पुतला जलाते हैं।
विज्ञापन
अमावस्या के दूसरे दिन भीउरी, तीसरे दिन जनदोई, चौथे दिन पडोई, पांचवें दिन बूढ़ी दिवाली का समापन हो जाता है। कहीं-कहीं सात दिन भी यह त्योहार मनाया जाता है। सूखे व्यंजन मूड़े के साथ पहाड़ी व्यंजन तेल पक्की, गुलगुले, उलौले बनाए जाते हैं, जो देसी घी के साथ परोसे जाते हैं। इस दौरान गांव की विवाहिता लड़की उस समय तक अपने मायके नहीं आती है जब तक उसके परिजन मूड़ा लेकर उसके ससुराल नहीं पहुंचते हैं। समस्त गिरिपार क्षेत्र में रासे गीत गाए जाएंगे।
-------------
विज्ञापन
शिलाई (सिरमौर)।
गिरिपार क्षेत्र में दीवाली के ठीक एक माह बाद मनाई जाने वाली बूढ़ी दीवाली की सभी तैयारियां मुकम्मल हो गई हैं। 18 नवंबर से शुरू होने वाले इस त्योहार की तैयारियों में क्षेत्र के लोग एक माह से जुटे हुए थे। क्षेत्र में यह त्योहार 3 से 7 दिनों तक मनाया जाएगा।
बूढ़ी दिवाली का त्योहार गिरिपार क्षेत्र में सदियों से पारंपरिक अंदाज में मनाया जाता है। क्षेत्र के लोग इस दौरान कई तरह के पकवान भी बनाते हैं जिसमें गेहूं को उबालकर व भून कर मुड़ा, धान की चिवड़ा, मैदे व चावलों की शाकुली, भांग, भंगजीरा, अखरोट की गिरी के मिश्रण से बना मूड़ा शामिल हैं। यह सभी पकवान बहुत स्वादिष्ट होते हैं जो कि घर आए मेहमानों को परोसे जाते हैं।
विज्ञापन
अमावस्या के दिन शुरू होने वाली बूढ़ी दीवाली को कौरव व पांडव पक्ष के लोग अपने गांव के सांझा आंगन में एकत्रित होकर मशालों का जलूस निकालकर गांव से थोड़ी दूर जाकर बलि राजा का पुतला भी जलाते हैं। पांडव पक्ष के लोग रात को 12 बजे से पूर्व मशाल यात्रा निकालते हैं जबकि कौरव पक्ष के लोग रात 3 बजे मशाल यात्रा कर बलि राजा का पुतला जलाते हैं।
विज्ञापन
अमावस्या के दूसरे दिन भीउरी, तीसरे दिन जनदोई, चौथे दिन पडोई, पांचवें दिन बूढ़ी दिवाली का समापन हो जाता है। कहीं-कहीं सात दिन भी यह त्योहार मनाया जाता है। सूखे व्यंजन मूड़े के साथ पहाड़ी व्यंजन तेल पक्की, गुलगुले, उलौले बनाए जाते हैं, जो देसी घी के साथ परोसे जाते हैं। इस दौरान गांव की विवाहिता लड़की उस समय तक अपने मायके नहीं आती है जब तक उसके परिजन मूड़ा लेकर उसके ससुराल नहीं पहुंचते हैं। समस्त गिरिपार क्षेत्र में रासे गीत गाए जाएंगे।
-------------