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Rampur Bushahar News: लाहौल-स्पीति और किन्नौर के मसालों से आज भी महक रही रसोई

Tue, 19 Nov 2024 11:24 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Tue, 19 Nov 2024 11:24 PM IST
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सदियों से मेले में होती आ रही है मसालों की खरीद-फरोख्त, काला जीरा 25 सौ रुपये किलो, शिलाजीत बिक रहा 250 रुपये प्रति तोला
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संवाद न्यूज एजेंसी
रामपुर बुशहर। अंतरराष्ट्रीय लवी मेला घरों में इस्तेमाल होने वाले हर तरह के सामान की खरीद-फरोख्त के लिए जाना जाता है। 300 साल का इतिहास समेटे इस मेले का आगाज तिब्बत और बुशहर के राजाओं की संधि के साथ शुरू हुआ था, जिसमें पशुओं की खरीद-फरोख्त के अलावा मसालों का व्यापार अहम था। समय के साथ साथ मेले का स्वरूप बदलता गया और मेले में कई बदलाव हुए, लेकिन मेले में बिकने वाले मसालों की महक से आज भी क्षेत्र के लोगाें की रसोई महक रही है। मेले में लाहौल-स्पीति और किन्नौर में मिलने वाले मसालों और जड़ी-बूटियों का आज भी खूब व्यापार होता है। आज भी लोग खासकर मसालों और जड़ी-बूटियों की खरीदारी के लिए मेले में पहुंचते हैं। सदियों से ऊनी वस्त्र, घोड़ों और मसालों का व्यापार रामपुर के लवी मेले का शोभा बढ़ा रहे हैं। मेले में काला जीरा 25 सौ रुपये प्रतिकिलो, शिलाजीत 250 रुपये प्रति तोला, फरना 40 रुपये तोला बिक रहा है।
खास होते हैं लवी मेले में बिकने वाले मसाले

मसालों का व्यापार कर रहीं महिला सुमन, ऊषा और सुनीता ने बताया कि वे वर्षों से लवी मेले में हर साल मसालों का कारोबार करने आ रही हैं। पहले उनके बुजुर्ग मेले में मसालों का कारोबार करते थे। ठियोग, आनी, निरमंड, रामपुर, ननखड़ी और किन्नौर जिले के लोग मसाले खरीदने के लिए यहां आते हैं। मेले में कई तरह के मसाले और दवाओं की खरीदारी लोग एक माह तक करते रहते हैं।
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अब किन्नौर और लाहौल-स्पीति से आते हैं विक्रेता
रामपुर के अंतरराष्ट्रीय लवी मेले में पहले तिब्बत, लाहौल-स्पीति और किन्नौर के लोग मसालों, घोड़ों और अन्य जड़ी-बूटियों का व्यापार करने पहुंचते थे। अब तिब्बत को छोड़कर किन्नौर और लाहौल-स्पीति से ही मसालों के विक्रेता पहुंचते हैं। ये मसाले आज भी कुल्लू, किन्नौर, शिमला और मंडी जिले से मेले में पहुंचने वाले लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं। जनजातीय जिले में पैदा होने वाला काला जीरा, फरन, कड़वी, पतीश, काला नमक और रतनजोत के अलावा शिलाजीत समेत कई प्रकार की जड़ी-बूटियां व्यापारी बेच रहे हैं।
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