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रस्सी पर काठी में सवार होकर नौवी बार पार करूंगा आस्था की खाई : सुरत राम
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भले ही दुनिया के लिए अनुष्ठान का नायक हूं , लेकिन मेरे लिए खानदानी परंपरा
संवाद
रोहड़ू। विशेष घास से बने रस्से पर लकड़ी की काठी पर चढ़कर आठ बार आस्था की इस खाई पार करने वाले बेडा सूरत राम के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं है। शुक्रवार को वह दिनभर परिवार के साथ गुनगुनी धूप का मंदिर परिसर में अनुष्ठान में भाग लेते रहे। सूरत राम ने बताया कि इस 70 साल की उम्र में यह उसके जीवन का अंतिम कार्यक्रम रहेगा। भले ही दुनिया के लिए इस अनुष्ठान का नायक हूं , लेकिन मेरे लिए यह खानदानी परंपरा है। भय नाम की कोई चीज नहीं है। देव आस्था के सामने दानव का भी खात्मा हुआ है। इसलिए आस्था से ही इस परंपरा को निभा रहा हूं। रस्सी पर चढ़कर आराम से इस आस्था की खाई पार करूंगा। सूरत राम के दो बेटे हिमाचल पुलिस व तीसरा सेना में सेवाएं दे रहे हैं। सभी परिवार के लोग आज देवता के मंदिर में मौजूद रहे। कहा कि अभी तक आठ बार रस्सी पर चढ़कर आस्था की खाई को अलग-अलग भूंडा में पार कर चुका हूं। अब बच्चे पढ़ लिखकर चाहे जहां भी पहुंचे पर जीवन में अपना फर्ज हमेशा निभाया है। शनिवार को नौंवी बार व दलगांव के इस अनुष्ठान में दूसरी बार रस्सी पर आस्था की खाई को पार करने का मौका मिला है। कहा कि अब उम्र के इस पढ़ाव में अगली बार इस भूमिका में देखना संभव नहीं रहेगा। बच्चे भले की नौकरी पेशा हों पर देवता के जिसके लिए आदेश होंगे वे कैसे परंपरा को निभाएंगे, इस पर अभी कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा इस पंरपरा पर पूरा परिवार गर्व महसूस कर रहा है। इस कार्य को करने से धन प्राप्त करने की मंशा नहीं बल्कि पूर्वजों की परंपरा को निभाने का दायित्व है।
रातभर पानी में भिगोने के लिए रखा बेडा का रस्सा
करीब ढाई महीने से तैयार किया गया रस्सा मंदिर से निकाल कर गांव के समीप बने पानी में भिगोने के लिए रखा गया है। रातभर रस्से की गांव के लोग चौकीदारी करेंगे। सुबह होने पर रस्से को लोग कंधों पर उठाकर आयोजन स्थल तक पहुंचाएंगे। इस दौरान रस्से को जमीन से छूना सही नहीं माना जाता। रस्से को नाले के आरपार बांध कर इसके ऊपर से बेडा को लकड़ी की काठी पर गिराया जाता है। इस अनुष्ठान के बाद रस्से को अगले भूंडा तक मंदिर में संभालकर रखा जाता है।
नहीं पहुंचे मुख्यमंत्री
दलगांव में मुख्यमंत्री की मेहमाननवाजी के लिए ग्रामीणों की ओर से पहले से तैयारियां चल रही थीं। मंदिर के साथ कमेटी की ओर से एक पक्के एक स्टेज तक का निर्माण भी किया गया था। सुबह लोगों को उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री यहां जरूर पहुंचेंगे। हेलिकाॅप्टर को उतारने की रोहड़ू में व्यस्था की गई थी। यहां से दलगांव तक उनको सड़क से पहुंचना था। करीब एक बजे उनका यहां से वापसी का कार्यक्रम था, लेकिन दोपहर बाद पता चला कि उनका कार्यक्रम रद्द हो गया है। इसके बाद उनके समर्थकों में निराशा नजर आई।
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संवाद
रोहड़ू। विशेष घास से बने रस्से पर लकड़ी की काठी पर चढ़कर आठ बार आस्था की इस खाई पार करने वाले बेडा सूरत राम के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं है। शुक्रवार को वह दिनभर परिवार के साथ गुनगुनी धूप का मंदिर परिसर में अनुष्ठान में भाग लेते रहे। सूरत राम ने बताया कि इस 70 साल की उम्र में यह उसके जीवन का अंतिम कार्यक्रम रहेगा। भले ही दुनिया के लिए इस अनुष्ठान का नायक हूं , लेकिन मेरे लिए यह खानदानी परंपरा है। भय नाम की कोई चीज नहीं है। देव आस्था के सामने दानव का भी खात्मा हुआ है। इसलिए आस्था से ही इस परंपरा को निभा रहा हूं। रस्सी पर चढ़कर आराम से इस आस्था की खाई पार करूंगा। सूरत राम के दो बेटे हिमाचल पुलिस व तीसरा सेना में सेवाएं दे रहे हैं। सभी परिवार के लोग आज देवता के मंदिर में मौजूद रहे। कहा कि अभी तक आठ बार रस्सी पर चढ़कर आस्था की खाई को अलग-अलग भूंडा में पार कर चुका हूं। अब बच्चे पढ़ लिखकर चाहे जहां भी पहुंचे पर जीवन में अपना फर्ज हमेशा निभाया है। शनिवार को नौंवी बार व दलगांव के इस अनुष्ठान में दूसरी बार रस्सी पर आस्था की खाई को पार करने का मौका मिला है। कहा कि अब उम्र के इस पढ़ाव में अगली बार इस भूमिका में देखना संभव नहीं रहेगा। बच्चे भले की नौकरी पेशा हों पर देवता के जिसके लिए आदेश होंगे वे कैसे परंपरा को निभाएंगे, इस पर अभी कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा इस पंरपरा पर पूरा परिवार गर्व महसूस कर रहा है। इस कार्य को करने से धन प्राप्त करने की मंशा नहीं बल्कि पूर्वजों की परंपरा को निभाने का दायित्व है।
रातभर पानी में भिगोने के लिए रखा बेडा का रस्सा
करीब ढाई महीने से तैयार किया गया रस्सा मंदिर से निकाल कर गांव के समीप बने पानी में भिगोने के लिए रखा गया है। रातभर रस्से की गांव के लोग चौकीदारी करेंगे। सुबह होने पर रस्से को लोग कंधों पर उठाकर आयोजन स्थल तक पहुंचाएंगे। इस दौरान रस्से को जमीन से छूना सही नहीं माना जाता। रस्से को नाले के आरपार बांध कर इसके ऊपर से बेडा को लकड़ी की काठी पर गिराया जाता है। इस अनुष्ठान के बाद रस्से को अगले भूंडा तक मंदिर में संभालकर रखा जाता है।
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नहीं पहुंचे मुख्यमंत्री
दलगांव में मुख्यमंत्री की मेहमाननवाजी के लिए ग्रामीणों की ओर से पहले से तैयारियां चल रही थीं। मंदिर के साथ कमेटी की ओर से एक पक्के एक स्टेज तक का निर्माण भी किया गया था। सुबह लोगों को उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री यहां जरूर पहुंचेंगे। हेलिकाॅप्टर को उतारने की रोहड़ू में व्यस्था की गई थी। यहां से दलगांव तक उनको सड़क से पहुंचना था। करीब एक बजे उनका यहां से वापसी का कार्यक्रम था, लेकिन दोपहर बाद पता चला कि उनका कार्यक्रम रद्द हो गया है। इसके बाद उनके समर्थकों में निराशा नजर आई।
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