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Mandi News: छोटी काशी के बाजारों में हाथोंहाथ बिक रहा लिंगड़
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स्वास्थ्यवर्धक होने के कारण रहती है अधिक मांग
संवाद न्यूज एजेंसी
मंडी। बरसात का मौसम शुरू होते ही छोटी काशी मंडी के बाजारों में प्राकृतिक तौर पर उगने वाला लिंगड़ (सब्जी) पहुंच गया है। मुख्य रूप से यह जंगलों, नदी-नालों और खड्डों के किनारे उगता है। ग्रामीण इसे चुनकर सब्जी के रूप में इस्तेमाल करते हैं। स्वास्थ्यवर्धक होने के कारण इसे बाजारों में भी बेचा जाता है।
शहर के लोग इसे हाथोंहाथ खरीद रहे हैं। इसका आचार भी बनाया जाता है। मंडी सहित यह उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और अन्य पहाड़ी राज्यों में पाया जाता है। ग्रामीण परिवारों के लिए यह आजीविका का साधन भी है।
आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. हितेश के मुताबिक इसमें एंटी ऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होने के साथ ही विटामिन ए और सी भी होता है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। आंखों की रोशनी और त्वचा के लिए भी यह लाभकारी है। लिंगड जून-जुलाई में उगता है और बरसात के बाद सीजन खत्म हो जाता है।
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बरसात में लिंगड़ एकत्रित करने के लिए परिवार के लोग नालों और जंगलों में इसकी तलाश करते हैं। बोरों में भरकर बाजार पहुंचाने पर इसे 50 रुपये किलो की दर से बेचा जाता है। इससे अच्छी आमदनी हो जाती है।
विमला, निवासी सुक्का कून कोटली
लिंगड़ दो तरह का होता है। बारीक डंडी होने पर इसे लिंगड़ी कहते हैं और मोटी वाली डंडी को लिंगड़ कहा जाता है। कई सालों से शहर में प्राकृतिक साग-सब्जी बेचकर अपना और परिवार का गुजर-बसर कर रही हूं।
बेगी देवी, निवासी कटौला
लंबे समय से बल्ह घाटी में ही सब्जी बेचकर गुजारा चल जाता है। कुछ समय से मंडी में अपने खेतों में तैयार कचालू पत्ते, करेला, खीरा और कच्चे आम बेचकर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर रहे हैं।
इंद्र सिंह, निवासी स्टोह बल्ह
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संवाद न्यूज एजेंसी
मंडी। बरसात का मौसम शुरू होते ही छोटी काशी मंडी के बाजारों में प्राकृतिक तौर पर उगने वाला लिंगड़ (सब्जी) पहुंच गया है। मुख्य रूप से यह जंगलों, नदी-नालों और खड्डों के किनारे उगता है। ग्रामीण इसे चुनकर सब्जी के रूप में इस्तेमाल करते हैं। स्वास्थ्यवर्धक होने के कारण इसे बाजारों में भी बेचा जाता है।
शहर के लोग इसे हाथोंहाथ खरीद रहे हैं। इसका आचार भी बनाया जाता है। मंडी सहित यह उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और अन्य पहाड़ी राज्यों में पाया जाता है। ग्रामीण परिवारों के लिए यह आजीविका का साधन भी है।
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आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. हितेश के मुताबिक इसमें एंटी ऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होने के साथ ही विटामिन ए और सी भी होता है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। आंखों की रोशनी और त्वचा के लिए भी यह लाभकारी है। लिंगड जून-जुलाई में उगता है और बरसात के बाद सीजन खत्म हो जाता है।
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बरसात में लिंगड़ एकत्रित करने के लिए परिवार के लोग नालों और जंगलों में इसकी तलाश करते हैं। बोरों में भरकर बाजार पहुंचाने पर इसे 50 रुपये किलो की दर से बेचा जाता है। इससे अच्छी आमदनी हो जाती है।
विमला, निवासी सुक्का कून कोटली
लिंगड़ दो तरह का होता है। बारीक डंडी होने पर इसे लिंगड़ी कहते हैं और मोटी वाली डंडी को लिंगड़ कहा जाता है। कई सालों से शहर में प्राकृतिक साग-सब्जी बेचकर अपना और परिवार का गुजर-बसर कर रही हूं।
बेगी देवी, निवासी कटौला
लंबे समय से बल्ह घाटी में ही सब्जी बेचकर गुजारा चल जाता है। कुछ समय से मंडी में अपने खेतों में तैयार कचालू पत्ते, करेला, खीरा और कच्चे आम बेचकर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर रहे हैं।
इंद्र सिंह, निवासी स्टोह बल्ह