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Kullu News: कारदार बनीं बेटियां चला रहीं कुल्लू में देव समाज की सत्ता
Wed, 08 Oct 2025 10:56 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू
Updated Wed, 08 Oct 2025 10:56 PM IST
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अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव में आने वाले पांच देवी-देवताओं की कारदार हैं महिलाएं
ठारा पेड़े रोगना, लक्ष्मी नारायण धाउगी, शंगचूल महादेव शांघड़ की हैं कारदार
गौरीशंकर
कुल्लू। देश के कई हिस्सों में महिलाएं मंदिर की चौखट तक नहीं पहुंच पातीं लेकिन कुल्लू की घाटियों में महिलाएं देव सत्ता की विरासत संभाल रही हैं। यहां देवता की कारदारी यानी प्रतिनिधित्व महिलाओं के हाथों में हैं।
दशहरा उत्सव में भाग लेने वाले कई देवी-देवताओं की निर्णय कर्ता महिलाएं हैं। वे न सिर्फ परंपरा निभा रही हैं, बल्कि समाज को नई दिशा भी दे रही हैं।
दशहरा में शिरकत करने वाले पांच देवी-देवताओं में लक्ष्मी नारायण देवता धाउगी सैंज, देवता शंगचूल महादेव शांघड़, ठारा पेड़े रोगना, रोमनु नाग काईस सहित सौर नाग की कारदार महिलाएं हैं। इन देवी-देवताओं से संबंधित फैसले महिला कारदार ही करती हैं। रुमणू नाग राउगी की कारदार देव देई हैं। पहले उनके पिता भाग चंद देवता के कारदार थे। बेटा न होने पर बेटी को ही देव समाज ने कारदार बनाकर देवता से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेने का अधिकार दिया है। देव देई कहती हैं कि उन्हें कारदार के पद पर आठ साल हो गए हैं। समाज ने पूरा साथ दिया है। सर्वसम्मति से फैसले लेने में आसानी होती है।
शंगचूल महादेव शांघड़ की कारदार सुधा शर्मा वर्ष 2019 से कारदार हैं। पहले उनके पिता उत्तम चंद कारदार थे। विरासत में उन्हें कारदारी मिली है। वह इस जिम्मेदारी को पूरे देव नियम से निभाने प्रयास कर रही हैं। हालांकि कई बार देव फैसलों में मुश्किलों का भी सामना करना पड़ लेकिन समाज ने साथ दिया है।
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लक्ष्मी नारायण देवता धाउगी सैंज के कारदार का जिम्मा शारदा देवी संभाल रही हैं। उन्हें इस पद पर कार्य करते 20 से अधिक वर्ष हो गए हैं। पहले उनके पिता दीनानाथ कारदार थे। विरासत में कारदार का पद शारदा देवी को मिला। दो दशक से ज्यादा समय से वह देवता से संबंधित फैसले ले रही हैं।
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यह जिम्मेदारी होती है कारदार के पास
देव समाज से जुड़े लोगों और साहित्यकारों की मानें तो देव समाज में कारदार की भूमिका मुख्य है। देवी-देवताओं को लेकर कोई भी महत्वपूर्ण फैसले, हारियानों और देवलुओं को लेकर भी कारदार ही अहम फैसले लेते हैं। कारदार की भूमिका देव समाज में प्रमुखता से देखी जाती है। साहित्यकार डॉ. सूरत ठाकुर ने कहा कि कारदार एक ही खानदान के होते हैं। यदि किसी खानदान में लड़के नहीं हैं तो वहां लड़कियों को भी कारदार बनाया जाता है।
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ठारा पेड़े रोगना, लक्ष्मी नारायण धाउगी, शंगचूल महादेव शांघड़ की हैं कारदार
गौरीशंकर
कुल्लू। देश के कई हिस्सों में महिलाएं मंदिर की चौखट तक नहीं पहुंच पातीं लेकिन कुल्लू की घाटियों में महिलाएं देव सत्ता की विरासत संभाल रही हैं। यहां देवता की कारदारी यानी प्रतिनिधित्व महिलाओं के हाथों में हैं।
दशहरा उत्सव में भाग लेने वाले कई देवी-देवताओं की निर्णय कर्ता महिलाएं हैं। वे न सिर्फ परंपरा निभा रही हैं, बल्कि समाज को नई दिशा भी दे रही हैं।
दशहरा में शिरकत करने वाले पांच देवी-देवताओं में लक्ष्मी नारायण देवता धाउगी सैंज, देवता शंगचूल महादेव शांघड़, ठारा पेड़े रोगना, रोमनु नाग काईस सहित सौर नाग की कारदार महिलाएं हैं। इन देवी-देवताओं से संबंधित फैसले महिला कारदार ही करती हैं। रुमणू नाग राउगी की कारदार देव देई हैं। पहले उनके पिता भाग चंद देवता के कारदार थे। बेटा न होने पर बेटी को ही देव समाज ने कारदार बनाकर देवता से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेने का अधिकार दिया है। देव देई कहती हैं कि उन्हें कारदार के पद पर आठ साल हो गए हैं। समाज ने पूरा साथ दिया है। सर्वसम्मति से फैसले लेने में आसानी होती है।
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शंगचूल महादेव शांघड़ की कारदार सुधा शर्मा वर्ष 2019 से कारदार हैं। पहले उनके पिता उत्तम चंद कारदार थे। विरासत में उन्हें कारदारी मिली है। वह इस जिम्मेदारी को पूरे देव नियम से निभाने प्रयास कर रही हैं। हालांकि कई बार देव फैसलों में मुश्किलों का भी सामना करना पड़ लेकिन समाज ने साथ दिया है।
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लक्ष्मी नारायण देवता धाउगी सैंज के कारदार का जिम्मा शारदा देवी संभाल रही हैं। उन्हें इस पद पर कार्य करते 20 से अधिक वर्ष हो गए हैं। पहले उनके पिता दीनानाथ कारदार थे। विरासत में कारदार का पद शारदा देवी को मिला। दो दशक से ज्यादा समय से वह देवता से संबंधित फैसले ले रही हैं।
यह जिम्मेदारी होती है कारदार के पास
देव समाज से जुड़े लोगों और साहित्यकारों की मानें तो देव समाज में कारदार की भूमिका मुख्य है। देवी-देवताओं को लेकर कोई भी महत्वपूर्ण फैसले, हारियानों और देवलुओं को लेकर भी कारदार ही अहम फैसले लेते हैं। कारदार की भूमिका देव समाज में प्रमुखता से देखी जाती है। साहित्यकार डॉ. सूरत ठाकुर ने कहा कि कारदार एक ही खानदान के होते हैं। यदि किसी खानदान में लड़के नहीं हैं तो वहां लड़कियों को भी कारदार बनाया जाता है।